बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान नॉनवेज खाने को लेकर विवाद बढ़ गया है। बागेश्वर धाम के धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की अपील के बाद बंगाली हिंदुओं ने परंपरा, खान-पान और धार्मिक विविधता को लेकर सवाल उठाए। जानिए पूरा विवाद।

दुर्गा पूजा बंगाल में सिर्फ पूजा नहीं, बल्कि आस्था, खान-पान और संस्कृति का ऐसा मेल है जिसे पीढ़ियों से लोग अपने तरीके से निभाते आए हैं। लेकिन इस बार पूजा शुरू होने से पहले ही मछली-मांस को लेकर ऐसी बहस छिड़ गई है, जिसने धार्मिक आस्था से आगे बढ़कर बंगाली पहचान का सवाल खड़ा कर दिया है।

बागेश्वर धाम के प्रमुख धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने 6 सितंबर को हावड़ा के लिलुआ में हनुमंत कथा के दौरान बंगाल के हिंदुओं से अपील की कि नवरात्रि में दुर्गा प्रतिमा के आसपास नॉनवेज खाना न बेचा जाए। उन्होंने कहा कि लोग प्रतिमा स्थापित न भी करें, तब भी इस बात का ध्यान रखें।

यह बयान विश्व हिंदू परिषद (VHP) की उस हालिया सलाह के कुछ दिन बाद आया, जिसमें दुर्गा पूजा पंडालों के आसपास नॉनवेज भोजन से दूरी रखने की बात कही गई थी। VHP ने बाद में साफ किया कि उसका उद्देश्य नॉनवेज पर पूरी तरह रोक लगाना नहीं है और न ही वह बंगाल के लोगों के खान-पान को तय करना चाहती है।

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विवाद इतना बड़ा क्यों हो गया?

असल विवाद मांस या मछली बेचने से ज्यादा बंगाल की अपनी धार्मिक परंपरा को लेकर है। बंगाल में दुर्गा पूजा की परंपराएं हर परिवार, समुदाय और स्थान पर एक जैसी नहीं हैं। कई जगह शाकाहारी भोग चढ़ाया जाता है, तो कुछ परंपराओं में मछली और मांस का भी धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व रहा है। यही वजह है कि पूर्व राज्यपाल तथागत रॉय समेत कई लोगों ने शास्त्री की अपील पर सवाल उठाए। उनका तर्क है कि हिंदू परंपराओं की खूबसूरती उनकी विविधता में है और हर क्षेत्र की पूजा पद्धति अलग हो सकती है।

BJP के लिए भी क्यों अहम है यह विवाद?

पश्चिम बंगाल में BJP की सरकार बनने के बाद यह पहली दुर्गा पूजा है। चुनाव से पहले पार्टी पर आरोप लगते रहे थे कि वह बंगाल की स्थानीय संस्कृति और खान-पान पर बाहरी नजरिया थोप सकती है। इसी धारणा को तोड़ने के लिए चुनाव प्रचार के दौरान BJP नेताओं ने मछली-भात तक को बंगाली संस्कृति से जोड़कर पेश किया था। ऐसे में शास्त्री का बयान पार्टी के लिए भी असहज स्थिति पैदा करता दिख रहा है।

प्रदेश BJP अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य ने शास्त्री को सम्मानित संत बताते हुए उनके बयान को व्यक्तिगत राय बताया। उन्होंने कहा कि बंगाली अपनी परंपरा के अनुसार खाते हैं—अष्टमी पर पूरी और नवमी पर मटन तक बंगाल की सामाजिक-सांस्कृतिक तस्वीर का हिस्सा है।

असली सवाल क्या है?

बंगाल में सालाना हजारों दुर्गा पूजा आयोजित होती हैं। इसलिए यह विवाद सिर्फ पंडाल के पास मांस बेचने का नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या पूरे देश में हिंदू त्योहार मनाने का एक ही तरीका होना चाहिए, या स्थानीय परंपराओं को उनकी विविधता के साथ जगह मिलनी चाहिए? फिलहाल सोशल मीडिया पर बहस, तंज और मीम्स का दौर जारी है। लेकिन इस विवाद ने एक बात साफ कर दी है, बंगाल में दुर्गा पूजा के साथ जुड़ी मछली-मांस की बहस सिर्फ खाने की पसंद नहीं, बल्कि संस्कृति और पहचान से भी जुड़ी हुई है।

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