Balochistan crisis: बलूचिस्तान में कथित F-16 एयरस्ट्राइक और नागरिकों की मौत के आरोपों ने पाकिस्तान को घेर दिया है। बलूच नेताओं ने ट्रंप प्रशासन से पाकिस्तान की सैन्य मदद और F-16 के स्पेयर पार्ट्स पर रोक लगाने की मांग की है।
बलूचिस्तान में एक बार फिर पाकिस्तान की सैन्य कार्रवाई और कथित नागरिक हताहतों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल उठने लगे हैं। बलूच संगठनों का आरोप है कि पाकिस्तान की सेना ने अमेरिकी मूल के F-16 लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल करते हुए बलूचिस्तान में एयरस्ट्राइक की, जिसमें महिलाएं और बच्चे समेत करीब 30 नागरिकों के मारे जाने का दावा किया गया है। हालांकि, इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हो सकी है और पाकिस्तान की ओर से इस दावे की पुष्टि नहीं मिली है। हालिया रिपोर्टों में सुराब इलाके में सैन्य अभियान और अलग-अलग घटनाओं में मौतों की जानकारी सामने आई है।
F-16 के इस्तेमाल पर क्यों उठ रहे सवाल?
बलूच नेताओं का सबसे बड़ा सवाल अमेरिकी F-16 विमानों को लेकर है। उनका दावा है कि अमेरिका ने पाकिस्तान को आतंकवाद विरोधी अभियानों और रक्षा जरूरतों के लिए जो सैन्य क्षमता उपलब्ध कराई, उसका इस्तेमाल अब बलूच नागरिकों के खिलाफ किया जा रहा है। बलूच नेतृत्व ने अमेरिका से पाकिस्तान को मिलने वाली सैन्य सहायता की समीक्षा करने और F-16 बेड़े के लिए स्पेयर पार्ट्स, इंजन सपोर्ट, मरम्मत तथा तकनीकी सहायता पर रोक लगाने की मांग की है।
यहां यह समझना जरूरी है कि F-16 अमेरिकी मूल का विमान है, लेकिन किसी अभियान में उसके इस्तेमाल का आरोप अपने आप में यह साबित नहीं करता कि अमेरिका उस कार्रवाई में शामिल था। ऐसे दावों की स्वतंत्र जांच और आधिकारिक पुष्टि जरूरी है।
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ट्रंप प्रशासन से बलूच नेताओं की सीधी अपील
बलूच नेता मीर यार बलूच लंबे समय से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और वाशिंगटन से पाकिस्तान की नीति पर पुनर्विचार की मांग करते रहे हैं। उन्होंने पहले भी ट्रंप प्रशासन से पाकिस्तान की सुरक्षा भूमिका और कथित मानवाधिकार उल्लंघनों की समीक्षा करने की अपील की थी।
अब बलूच नेतृत्व की मांग और ज्यादा सख्त बताई जा रही है। इसमें पाकिस्तान को दी जाने वाली रक्षा सहायता और वित्तीय सहयोग की समीक्षा, F-16 के लिए अमेरिकी तकनीकी समर्थन रोकने तथा कथित मानवाधिकार उल्लंघनों के लिए पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जवाबदेह बनाने की मांग शामिल है।
बलूच नेताओं की ओर से पाकिस्तान को आतंकवाद प्रायोजक देश घोषित करने और कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाने की मांग भी की गई है। हालांकि, यह एक राजनीतिक मांग है और इसे अमेरिका की मौजूदा आधिकारिक नीति या निर्णय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
बलूचिस्तान में संघर्ष की पुरानी कहानी
बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है और लंबे समय से वहां अलगाववादी संगठनों, पाकिस्तानी सुरक्षा बलों और स्थानीय राजनीतिक समूहों के बीच संघर्ष चलता रहा है। पाकिस्तान सरकार सशस्त्र बलूच संगठनों को सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा मानती है, जबकि बलूच अधिकार कार्यकर्ता सुरक्षा अभियानों के दौरान नागरिकों के अधिकारों और कथित जबरन गायब किए जाने जैसे मुद्दे उठाते रहे हैं।
इसी वजह से किसी भी सैन्य कार्रवाई के बाद सामने आने वाले आंकड़ों को लेकर सावधानी जरूरी है। हालिया सुराब घटनाक्रम में भी अलग-अलग पक्षों से अलग-अलग दावे सामने आए हैं। Associated Press के मुताबिक 12 अगस्त को पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने बलूचिस्तान में एक अभियान चलाया था, जिसमें सेना ने 10 आतंकियों के मारे जाने की बात कही; उसी दिन सुराब जिले में एक कार बम विस्फोट में नागरिकों और विस्फोट की तैयारी कर रहे लोगों की मौत की भी रिपोर्ट आई।
अब अमेरिका पर क्यों टिकी हैं नजरें?
बलूच नेतृत्व की रणनीति अब सिर्फ पाकिस्तान पर आरोप लगाने तक सीमित नहीं है। उसका जोर अमेरिका और दूसरे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दबाव बनाने पर है। इससे पहले भी मीर यार बलूच ने ट्रंप को पत्र लिखकर बलूचिस्तान के राजनीतिक भविष्य और कथित मानवाधिकार उल्लंघनों का मुद्दा उठाया था।
लेकिन सवाल यह है कि क्या ट्रंप प्रशासन पाकिस्तान के साथ अपने रणनीतिक और सुरक्षा संबंधों को मानवाधिकारों के मुद्दे पर बदलने के लिए तैयार होगा? फिलहाल ऐसा कोई स्पष्ट आधिकारिक संकेत सामने नहीं आया है कि अमेरिका ने इन आरोपों के बाद पाकिस्तान की सैन्य सहायता या F-16 सपोर्ट को रोकने का फैसला किया है।
यही वजह है कि बलूचिस्तान में कथित एयरस्ट्राइक के बाद असली लड़ाई सिर्फ जमीन पर नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के स्तर पर भी दिखाई दे रही है। अगर नागरिकों की मौत के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होती है, तो वाशिंगटन पर यह सवाल और गंभीर हो सकता है कि अमेरिकी मूल की सैन्य तकनीक के इस्तेमाल को लेकर उसकी जिम्मेदारी और निगरानी की नीति क्या होनी चाहिए।
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