बेंगलुरु में एक CEO ने बताया कि कैसे एक फ्रेशर कर्मचारी को ऑफिस आने-जाने में रोज़ ₹350 खर्च करने पड़ रहे हैं। यह पहली सैलरी पर एक बड़ा बोझ है। उन्होंने चेतावनी दी कि इस वजह से युवा शहर छोड़कर रिमोट जॉब्स की तलाश कर सकते हैं।
बेंगलुरु को भारत के सबसे ज़्यादा ट्रैफिक वाले शहरों में गिना जाता है। खराब सड़कें और ट्रांसपोर्ट के अधूरे इंतज़ाम की वजह से यहां कहीं भी आने-जाने में घंटों लग जाते हैं। पुरानी पीढ़ी ने तो जैसे-तैसे इस ट्रैफिक के साथ जीना सीख लिया, लेकिन नई पीढ़ी इससे परेशान है। बेंगलुरु में नौकरी करने आ रहे युवाओं को यहां रहने में कितनी मुश्किल हो रही है, इस पर एक कंपनी के CEO ने खुद एक पोस्ट लिखा है। इसके बाद सोशल मीडिया पर यह मामला चर्चा का विषय बन गया है। बेंगलुरु की एक कंपनी के CEO संकेत सेठ ने अपने एक फ्रेशर कर्मचारी का अनुभव शेयर किया, जिसने बताया कि उसे सिर्फ ऑफिस आने-जाने में ही रोज़ 350 रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं। सेठ ने यह किस्सा अपने लिंक्डइन पर तब शेयर किया, जब उनकी कंपनी ने 2024 में वापस 'वर्क फ्रॉम ऑफिस' शुरू किया।
एक दिन का किराया 350 रुपये!
यह लड़का लालबाग के पास रहता था, जबकि ऑफिस HSR लेआउट में था। बेंगलुरु की सड़कों और ट्रैफिक जाम के हालात को देखते हुए उसके माता-पिता ने उसे स्कूटर चलाने की इजाज़त नहीं दी। पब्लिक ट्रांसपोर्ट से सफ़र करने पर उसे एक तरफ से ही करीब दो घंटे लग जाते थे। इस दौरान कई बार गाड़ियां बदलनी पड़ती थीं और लास्ट माइल कनेक्टिविटी (जैसे बस स्टॉप से ऑफिस तक) का खर्च अलग था। आखिर में, पब्लिक ट्रांसपोर्ट के साथ ऑटो का इस्तेमाल करने पर उसका रोज़ का खर्च करीब 350 रुपये तक पहुंच गया।
'छोटी-छोटी खुशियों के तो हकदार हैं'
संकेत ने बताया कि एक ऐसे युवा के लिए, जिसे पहली सैलरी मिल रही हो, उसके लिए हर महीने 7,000 से 8,000 रुपये सिर्फ ऑफिस आने-जाने पर खर्च करना एक बहुत बड़ा बोझ है। उन्होंने कहा, "एक 22 साल के लड़के को यह नहीं सोचना पड़ना चाहिए कि वह काम पर जाने का खर्च उठा भी सकता है या नहीं।" उन्होंने आगे लिखा कि पहली सैलरी इंसान को आज़ादी का एहसास दिलाती है। युवाओं को पहली बार 1,000 रुपये बचाने जैसी छोटी-छोटी खुशियां मिलनी चाहिए।
'नई पीढ़ी शहर छोड़ देगी'
संकेत ने कंपनियों को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर बेंगलुरु में रहना इसी तरह महंगा होता रहा, तो युवा या तो रिमोट जॉब ढूंढेंगे, या ऐसी कंपनियों से बचेंगे जहां ऑफिस आना ज़रूरी है, या फिर वे किसी दूसरे शहर चले जाएंगे। उन्होंने कहा, "हर साल हज़ारों 21-23 साल के युवा बड़े सपनों के साथ बेंगलुरु आते हैं। उनकी एनर्जी, उनके आइडिया और रिस्क लेने की हिम्मत ही इस शहर की असली ताकत है।"
लोगों ने दी मिली-जुली प्रतिक्रिया
इस पोस्ट पर लोगों ने मिली-जुली प्रतिक्रियाएं दी हैं। कुछ लोगों ने माना कि बेंगलुरु में रहना वाकई एक बड़ी समस्या है। वहीं, कुछ ने सलाह दी कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट का ज़्यादा इस्तेमाल करना चाहिए। कई यूज़र्स ने यह भी कहा कि 25,000 से 30,000 रुपये की सैलरी पाने वाले फ्रेशर्स के पास किराया, खाना और आने-जाने का खर्च निकालने के बाद बचाने के लिए कुछ नहीं बचता।
