नर्मदापुरम में BJP पार्षद वंदना चुटीले ने अवैध टेलीकॉम टॉवर लगवाकर परिवार की जमीन हड़प ली। RTI के गलत जवाब और नायब तहसीलदार द्वारा रिकॉर्ड गायब कराए जाने से पीड़ित परिवार वर्षों से न्याय के लिए संघर्ष कर रहा है। पढ़िए पूरा मामला और परिवार की कहानी।

BJP Leader Illegal Land Grab: एक इंजीनियर परिवार के लिए न्याय का रास्ता अब पहेली बनता जा रहा है। इस पीड़ित परिवारको अब समझ ही नहीं आ रहा है कि आखिर न्याय के लिए वह जाए तो जाए कहां? क्योकि उसे न्याय दिलाने वाले ही आंकठ भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं। मामला मध्य प्रदेश से जुड़ा हुआ है। इसमें भी सबसे बड़ी हैरानी की बात यह है कि जिस प्रदेश का मुखिया ही यादव हो वहीं का एक यादव परिवार न्याय के लिए दर-दर की ठोकरे खा रहा है और सत्ता से जुड़ी महिला पार्षद उसकी पुश्तैनी जमीन पर कब्जा जमाए बैठीं हैं। सबसे ज्यादा चौंकाने वाला पहलू तहसील और कलेक्ट्रेट प्रशासन का है, जो लिखा पढ़ी में भी झूठ बोलने को इस तरह अमादा है कि पीड़ित परिवार को सच साबित करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है। जानिए कैसे एक आम परिवार भ्रष्टाचार और राजनीतिक दबाव के खिलाफ लड़ रहा है।

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क्या और कब का है प्रकरण?

पीड़ित दुलारे यादव के अनुसार नर्मदापुरम BJP पार्षद वंदना चुटीले ने उसकी भूमि पर अवैध अतिक्रमण कर टेलीकॉम टॉवर लगवा दिया। जिसकी शिकायत को लेकर पीड़ित दुलारे यादव पिछले एक साल से नगरपालिका, तहसील, कलेक्ट्रट, जनसुनबाई, SDM और CM-हेल्पलाइन तक अपील कर चुका है। उसके पास रजिस्ट्री की कॉपी, खसरा और समस्त दस्ताबेज होने के बाबजूद टेलीकॉम टॉवर नहीं हटवा पा रहा है. पिछले एक साल से सिर्फ पेशी पर पेशी लगाई जा रहीं हैं। 

नजूल और नामांतरण: क्या संवैधानिक हक़ भी अब पेशियों के पीछे छुप गया है?

पीड़ित पक्ष के अनुसार, यह जमीन उनके पिता नंदकिशोर यादव के नाम पर थी, जिनका देहांत हो चुका है। अब उनके वंशज कानूनी प्रक्रिया पूरी करके नामांतरण करवाना चाहते थे, लेकिन राजनीतिक दबाव और सरकारी अधिकारियों की लापरवाही ने उनके रास्ते में दीवार खड़ी कर दी गई है। नजूल कार्यालय ने 8 महीने तक पेशी लगवाई और फौरी तौर पर आवेदन निरस्त कर दिया, बिना सूचना के। क्या हमारे संवैधानिक हक़ भी अधिकारियों की मेज पर दबे रहते हैं? तहसील और कलेक्ट्रट ने RTI और शिकायतों के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की, जबकि नायब तहसीलदार ने रिकॉर्ड गायब कर दिए।

क्या यही वजह है कि आम लोग शहरों में पढ़-लिखकर नौकरी करते हैं?

पीड़ित पक्ष का कहना है कि उन्होंने जीवन भर पढ़ाई की, मेहनत की, और अब भी उनका हक़ छीना जा रहा है। दूसरी तरफ, “पांचवीं फेल नेता” ने बिना किसी कानूनी बाधा के टॉवर खड़ा कर दिया। क्या यही है हमारे देश में आम नागरिक की सुरक्षा?

तहसील और रिकॉर्ड की हुई छेड़छाड़: क्या अधिकारी भी दबाव में हैं?

तहसील नर्मदापुरम में 3 मार्च 2025 से प्रकरण लंबित था। नायब तहसीलदार हंसकुमार ओनकर ने 5 दिसंबर 2025 को मामले को निरस्त कर दिया और आर्डर शीट से कई पेशी रिकॉर्ड हटा दिए। जबकि पीड़ित पक्ष के पास 12 अगस्त, 26 अगस्त, 19 और 28 नवंबर की नोटिस की प्रतियाँ हैं। क्या यह सिर्फ लापरवाही थी या राजनीतिक दबाव में रिकॉर्ड छुपाया गया?

RTI और जनसुनवाई: क्या शिकायतों का कोई मोल नहीं?

पीड़ित पक्ष ने 17 अप्रैल 2025 को RTI लगाई, नगर पालिका और कलेक्ट्रट को लिखित शिकायत दी, और CM हेल्पलाइन पर चार बार शिकायत दर्ज कराई। बावजूद इसके, न तो टॉवर हटाया गया और न ही किसी प्रकार की ठोस कार्रवाई हुई। 6 मई को कलेक्ट्रट ने तो लिखा कि “कोई मोबाइल टॉवर ही नहीं है”, जबकि टॉवर स्पष्ट दिखाई दे रहा था। क्या यही लोकतंत्र का सच है कि न्याय पाने के लिए आम नागरिक को महीनों इंतजार करना पड़ता है?

पुलिस और कानून: क्या न्याय प्रणाली भी मजबूर है?

जब टॉवर निर्माण शुरू हुआ, तो पुलिस ने FIR दर्ज करने से मना कर दिया और कहा “यह राजस्व का मामला है।” पीड़ित पक्ष के पास सभी रजिस्ट्री, खसरा और दस्तावेज हैं। फिर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। क्या यही है हमारी सुरक्षा और कानून की शक्ति?

क्या आम इंसान की मेहनत और हक़ सुरक्षित हैं?

1976 में खरीदी गई पुश्तैनी भूमि पर अवैध कब्जा और सरकारी लापरवाही ने एक आम परिवार को साल भर संघर्षरत बना दिया है। राजनीतिक दबाव और भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत ने सवाल खड़े कर दिए हैं-क्या भारत में आम इंसान का हक़ सुरक्षित है, या केवल पढ़ा-लिखा होना ही न्याय पाने के लिए पर्याप्त नहीं है?