Delimitation Bill: संसद के मानसून सत्र से पहले परिसीमन (Delimitation) बिल पर डीएमके का रुख चर्चा में है। पार्टी ने दक्षिण भारत के हित, लोकसभा सीटों में 50% बढ़ोतरी और महिला आरक्षण को लेकर अपनी शर्तें रखी हैं।

Delimitation Bill 2026: संसद के मानसून सत्र से पहले हुई सर्वदलीय बैठक में परिसीमन (Delimitation) का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गया है। इस बार सबसे ज्यादा ध्यान डीएमके के रुख पर रहा। पार्टी ने साफ किया है कि सरकार की ओर से अभी तक कोई औपचारिक प्रस्ताव सामने नहीं आया है, इसलिए अंतिम फैसला जल्दबाजी में नहीं लिया जाएगा। हालांकि, पार्टी ने कुछ अहम शर्तों के साथ अपने रुख के संकेत जरूर दिए हैं।

परिसीमन पर क्या है DMK का नया रुख?

सर्वदलीय बैठक के बाद आरएसपी सांसद एन.के. प्रेमचंद्रन ने दावा किया कि डीएमके ने परिसीमन विधेयक का समर्थन किया है। हालांकि, डीएमके सांसद तिरुची शिवा ने इस दावे को स्पष्ट करते हुए कहा कि सरकार ने अभी तक कोई ठोस प्रस्ताव पेश नहीं किया है। उनके मुताबिक, पार्टी सरकार से पहले पूरी स्पष्टता चाहती है। डीएमके का कहना है कि महिला आरक्षण को मौजूदा लोकसभा सीटों के आधार पर तुरंत लागू किया जा सकता है और इसे परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ने की आवश्यकता नहीं है।

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दक्षिण भारत और लोकसभा सीटों पर रखीं अहम शर्तें

सूत्रों के अनुसार, डीएमके ने स्पष्ट किया है कि नए परिसीमन से दक्षिण भारतीय राज्यों की राजनीतिक हिस्सेदारी प्रभावित नहीं होनी चाहिए। यदि ऐसा होने की आशंका है, तो परिसीमन को अगले 25 वर्षों तक स्थगित करने पर भी विचार किया जाना चाहिए। पार्टी यह भी चाहती है कि प्रस्तावित विधेयक में लोकसभा सीटों में 50 प्रतिशत बढ़ोतरी का स्पष्ट प्रावधान शामिल किया जाए। डीएमके का मानना है कि यदि यह प्रावधान विधेयक का हिस्सा बनता है, तो वह सकारात्मक रुख अपना सकती है।

सरकार ने अभी नहीं रखा बिल, लेकिन बढ़ी राजनीतिक हलचल

फिलहाल केंद्र सरकार ने मानसून सत्र के लिए जारी विधायी सूची में परिसीमन विधेयक को शामिल नहीं किया है। हालांकि, सरकारी सूत्रों का कहना है कि उचित समय पर सरकार के पास विधेयक पारित कराने के लिए पर्याप्त समर्थन होगा। राजनीतिक विश्लेषकों की नजर इस बात पर भी है कि पिछले कुछ महीनों में डीएमके का रुख पहले की तुलना में नरम दिखाई दिया है। तमिलनाडु की राजनीति और कांग्रेस से बढ़ती दूरी के बीच पार्टी अब इस मुद्दे पर अपना फैसला राज्य के हितों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को ध्यान में रखकर लेने के संकेत दे रही है। आने वाले दिनों में सरकार के आधिकारिक प्रस्ताव के बाद इस विषय पर तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है।

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