DUSU Election Result 2026: दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव के नतीजे आ रहे हैं। जानिए कैसे नॉर्थ कैंपस के इस चुनाव ने अरुण जेटली से Gen-Z तक सियासत को बदला है।

Delhi University Election Result 2026: दिल्ली यूनिवर्सिटी में छात्रसंघ चुनाव 2026 के नतीजों के लिए वोटों की गिनती जारी है। नॉर्थ कैंपस के यूनिवर्सिटी स्पोर्ट्स स्टेडियम स्थित मल्टीपर्पज हॉल में चार बड़े पदों प्रेसिडेंट, वाइस प्रेसिडेंट, सेक्रेटरी और ज्वाइंट सेक्रेटरी के लिए वोट गिने जा रहे हैं। इस बार 40.46% छात्रों ने वोट डाला, जो पिछले तीन साल में सबसे ज्यादा है। लेकिन DUSU का चुनाव सिर्फ चार पदों का मुकाबला नहीं है। पिछले कई दशकों में DU का छात्रसंघ चुनाव देश के बड़े छात्र आंदोलनों और राजनीतिक घटनाओं से जुड़ा रहा है। यही वजह है कि हर साल इसके नतीजों को लेकर कैंपस के बाहर भी दिलचस्पी रहती है।

1973 में बदला DU चुनाव का पूरा सिस्टम

DUSU की कहानी समझने के लिए 1970 के दशक में जाना होगा। उस समय छात्र सीधे DUSU के केंद्रीय पदों के लिए वोट नहीं करते थे। पहले कॉलेजों से काउंसलर चुने जाते थे और फिर वही केंद्रीय पदाधिकारियों का चुनाव करते थे। 1972-73 में छात्रों ने इस सिस्टम के खिलाफ आंदोलन शुरू किया। करीब 50 दिन तक चले इस आंदोलन के बाद चुनाव का तरीका बदला और 1973 में पहली बार DUSU के केंद्रीय पदों के लिए सीधे चुनाव हुए। इसी दौर में अरुण जेटली भी DU की छात्र राजनीति में सक्रिय थे। 1973 के पहले सीधे चुनाव में ABVP ने चारों केंद्रीय सीटें जीती थीं और जेटली वाइस प्रेसिडेंट बने। अगले साल वे DUSU प्रेसिडेंट चुने गए।

DUSU और Emergency का कनेक्शन

1970 के दशक में DU की छात्र राजनीति का असर कैंपस से बाहर भी दिखा। जेटली उस दौर में छात्र नेता के तौर पर सक्रिय थे। 1975 में इमरजेंसी लागू होने के बाद उन्होंने इसके खिलाफ प्रदर्शन किया और गिरफ्तार किए गए। वे करीब 19 महीने जेल में रहे। इस दौर ने DUSU की छात्र राजनीति को देश में चल रहे बड़े राजनीतिक विरोध से जोड़ दिया। आगे चलकर DU के कई छात्र नेताओं ने राष्ट्रीय राजनीति में भी अपनी जगह बनाई।

मंडल आंदोलन के दौरान रद्द हुआ था चुनाव

1990 में मंडल कमीशन (Mandal Commission) की सिफारिशों को लागू करने के फैसले के बाद देशभर में बड़े छात्र प्रदर्शन हुए। दिल्ली भी इस आंदोलन का बड़ा केंद्र बना और DU कैंपस भी इससे अछूता नहीं रहा। विरोध और तनाव के बीच 1991 का DUSU चुनाव रद्द कर दिया गया। यह DUSU के इतिहास में एक बड़ा मोड़ था। यानी DUSU का चुनाव कई बार सिर्फ छात्र प्रतिनिधि चुनने तक सीमित नहीं रहा। देश में चल रहे बड़े छात्र आंदोलनों का असर भी कैंपस की राजनीति पर दिखाई देता रहा।

2017 के बाद विवादों का नया दौर

समय के साथ DUSU चुनाव के मुद्दे भी बदलते गए। 2017 से 2019 के बीच चुनावों में झड़प, उम्मीदवारों की योग्यता, वोटिंग मशीन और कानूनी विवाद जैसे मामले चर्चा में रहे। 2017 का चुनाव रामजस कॉलेज (Ramjas College) विवाद के बीच हुआ था। JNU के छात्रों उमर खालिद और शेहला राशिद को एक कार्यक्रम में बुलाए जाने को लेकर विरोध हुआ और इसके बाद कैंपस में तनाव बढ़ गया। बाद के सालों में चुनाव प्रचार के तरीके और नियमों को लेकर भी सवाल उठते रहे। 2024 में प्रॉपर्टी डिफेसमेंट और 2025 में जीत के जुलूसों पर पाबंदी जैसे मुद्दे सामने आए। इस साल दिल्ली हाई कोर्ट ने भी चुनाव के बाद विजय जुलूस निकालने पर रोक लगाई है और 140 उम्मीदवारों को चुनाव नियमों के उल्लंघन को लेकर नोटिस जारी किए हैं।

दिल्ली यूनिवर्सिटी चुनाव 2026 में क्या बदला?

इस साल DUSU चुनाव में सोशल मीडिया की भूमिका काफी साफ दिखी। इंस्टाग्राम और दूसरे सोशल प्लेटफॉर्म पर उम्मीदवारों की मौजूदगी, फ्रीबीज और कैंपस से जुड़े मुद्दे प्रचार का हिस्सा रहे। छात्रों के लिए हॉस्टल, कैंपस इंफ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षा जैसे मुद्दे भी अहम रहे। इस बार वोटिंग 40.46% रही, जो 2024 के 29.7% और 2025 के 39.45% से ज्यादा है। मतदान 52 केंद्रों पर हुआ था। वहीं, इस साल की काउंटिंग में ABVP और NSUI के बीच मुकाबला काफी दिलचस्प बना हुआ है। चार केंद्रीय पदों के लिए दोनों संगठनों ने अपने उम्मीदवार उतारे हैं। काउंटिंग के शुरुआती राउंड में बढ़त भी बदलती रही है, जिससे मुकाबले पर नजर बनी हुई है।