G7 समिट में ट्रंप की लिस्ट से ज़ेलेंस्की क्यों गायब-क्या यूक्रेन को जानबूझकर किनारे किया जा रहा है? भारत, UAE और अरब नेताओं से बैठकें, लेकिन यूक्रेन को क्यों नहीं मिला द्विपक्षीय स्थान? रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच क्या G7 एजेंडा मध्य पूर्व की ओर शिफ्ट हो चुका है? क्या अमेरिका-यूरोप के बीच यूक्रेन समर्थन को लेकर गंभीर कूटनीतिक दरार उभर रही है?

पेरिस/नई दिल्ली: पेरिस/नई दिल्ली: फ्रांस की धरती पर दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्कों के संगठन 'G7' का महामंच सज चुका है। पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि युद्ध की आग में झुलस रही वैश्विक राजनीति को इस समिट से क्या नया मोड़ मिलेगा। लेकिन इस बीच, फ्रांस से निकलकर आई एक कूटनीतिक खबर ने पूरी दुनिया के रणनीतिकारों को सकते में डाल दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हाई-प्रोफाइल द्विपक्षीय (Bilateral) मुलाकातों की जो सूची सामने आई है, उसने यूक्रेन के खेमे में हड़कंप मचा दिया है। इस लिस्ट में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम तो पूरे सम्मान के साथ शामिल है, लेकिन पश्चिमी देशों के 'पोस्टर बॉय' बन चुके यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर ज़ेलेंस्की का नाम रहस्यमयी ढंग से गायब है।

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कूटनीति का सबसे बड़ा झटका: जब बाइडेन का यार, ट्रंप की लिस्ट से हुआ बाहर

पिछले कई सालों से G7 और अन्य वैश्विक मंचों पर जो ज़ेलेंस्की हमेशा अमेरिकी राष्ट्रपतियों के बगल में खड़े दिखाई देते थे, इस बार ट्रंप प्रशासन ने उन्हें एक बड़ा 'कोल्ड शोल्डर' (नजरअंदाज़गी) दिया है। अमेरिकी प्रशासन के एक बेहद वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर पुष्टि की है कि 15 से 17 जून तक चलने वाले इस शिखर सम्मेलन के दौरान डोनाल्ड ट्रंप कई राष्ट्राध्यक्षों के साथ वन-टू-वन (आमने-सामने) क्लोज-डोर मीटिंग करेंगे।

इस विशेषाधिकार वाली सूची में भारत के पीएम नरेंद्र मोदी, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के अलावा कतर, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और मिस्र के दिग्गज नेता शामिल हैं। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि फ्रांस में मौजूदगी के बावजूद, ज़ेलेंस्की के साथ ट्रंप की कोई भी अलग से द्विपक्षीय बैठक तय नहीं की गई है। इस फैसले ने इस बात पर मुहर लगा दी है कि व्हाइट हाउस में सत्ता परिवर्तन के बाद अब वॉशिंगटन की प्राथमिकताएं पूरी तरह बदल चुकी हैं।

पर्दे के पीछे का सस्पेंस: क्या यूक्रेन युद्ध का 'द एंड' तय कर चुके हैं ट्रंप?

आखिर इस कूटनीतिक बेरुखी के पीछे की असली वजह क्या है? क्या पर्दे के पीछे रूस और अमेरिका के बीच कोई गुप्त डील हो चुकी है, या फिर ट्रंप ने यूक्रेन को अपने हाल पर छोड़ने का मन बना लिया है? ब्रिटिश अखबार 'द गार्डियन' के मुताबिक, एक अमेरिकी अधिकारी ने संकेत दिए हैं कि युद्ध के मैदान में रूस की सैन्य बढ़त अब "लगभग थम सी गई है" और अमेरिकी प्रशासन अब इस संघर्ष को और लंबा खींचने के मूड में बिल्कुल नहीं है। अधिकारी ने स्पष्ट शब्दों में कहा, "हम चाहते हैं कि यह युद्ध जल्द से जल्द खत्म हो।" विशेषज्ञों का मानना है कि अलग से बैठक न करके ट्रंप ने ज़ेलेंस्की को एक कड़ा संदेश दिया है कि अमेरिका अब यूक्रेन को असीमित और बिना शर्त सैन्य व वित्तीय मदद देने की नीति को पूरी तरह रोक चुका है। अब इस जंग और शांति वार्ता का सारा बोझ यूरोप के कंधों पर डाला जा रहा है, जिससे यूरोपीय देश बेहद असहज महसूस कर रहे हैं।

वर्किंग सेशन का दिखावा: सिर्फ 'भीड़' का हिस्सा बनकर रह जाएंगे ज़ेलेंस्की?

हालांकि, दुनिया के सामने इस कूटनीतिक कड़वाहट को छिपाने के लिए एक रास्ता निकाला गया है। अमेरिकी प्रशासन के अनुसार, ट्रंप और ज़ेलेंस्की सीधे तौर पर तो नहीं, लेकिन मंगलवार को होने वाले G7 के एक 'वर्किंग सेशन' (कार्य सत्र) में एक ही टेबल पर बैठेंगे। इस सत्र का मुख्य एजेंडा ही यूक्रेन संकट होगा। लेकिन कूटनीति के जानकार जानते हैं कि एक बहुपक्षीय वर्किंग सेशन में भाग लेने और बंद कमरे में दो देशों के राष्ट्राध्यक्षों की द्विपक्षीय बातचीत होने में जमीन-आसमान का फर्क होता है। ज़ेलेंस्की के बार-बार अनुरोध के बावजूद कि यूरोप और अमेरिका को शांति वार्ताओं में उन्हें मुख्य भूमिका देनी चाहिए, इस बार उन्हें काफी हद तक साइडलाइन (किनारे) कर दिया गया है।

ज़ेलेंस्की की ‘उपस्थिति’ लेकिन ‘अनदेखी’ की स्थिति क्यों?

हालांकि ज़ेलेंस्की समिट के वर्किंग सेशंस में भाग लेंगे, लेकिन ट्रंप के साथ किसी अलग द्विपक्षीय बैठक का न होना एक असामान्य कूटनीतिक संकेत माना जा रहा है। यह स्थिति उस समय और भी महत्वपूर्ण हो जाती है जब यूरोपीय देश लगातार यूक्रेन को समर्थन देने की बात कर रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, ट्रंप और ज़ेलेंस्की एक साझा वर्किंग सेशन में जरूर शामिल होंगे, जहां यूक्रेन युद्ध और सुरक्षा स्थिति पर चर्चा होगी, लेकिन अलग बैठक की अनुपस्थिति को रणनीतिक दूरी के रूप में देखा जा रहा है।

बदल गया वर्ल्ड ऑर्डर: यूक्रेन को छोड़ मिडिल ईस्ट और होर्मुज पर टिकी नजरें

G7 समिट के इस बदले हुए रुख से साफ है कि अब दुनिया का ध्यान यूक्रेन और रूस के दलदल से निकलकर 'मिडिल ईस्ट' (मध्य पूर्व) की बारूद की ढेर की तरफ शिफ्ट हो गया है। इस बार समिट का मुख्य एजेंडा ईरान के साथ संभावित युद्ध की स्थिति, मध्य पूर्व में जारी तनाव और दुनिया के सबसे संवेदनशील व्यापारिक मार्ग 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) की सुरक्षा पर केंद्रित रहने वाला है।

ट्रंप- मोदी की बैठक पर टिकी निगाह

दूसरी तरफ, ट्रंप और पीएम मोदी की होने वाली महा-बैठक पर पूरी दुनिया की नजरें हैं। जहां एक तरफ अमेरिका ने यूक्रेन से अपना हाथ खींचा है, वहीं भारत के साथ वह ऊर्जा सहयोग, बड़े व्यापारिक समझौतों, H-1B वीजा नीतियों और क्षेत्रीय सुरक्षा पर गहरी साझेदारी को आगे बढ़ा रहा है। यह महामुलाकात साबित करती है कि आने वाले नए 'वर्ल्ड ऑर्डर' में भारत की भूमिका कितनी निर्णायक होने वाली है, जबकि यूक्रेन के लिए आगे की राह बेहद अंधकारमय नजर आ रही है।

युद्ध, ऊर्जा और मध्य पूर्व: G7 का बदला हुआ एजेंडा

इस बार G7 समिट का केंद्र बिंदु यूक्रेन नहीं बल्कि मध्य पूर्व संकट, ईरान से जुड़े तनाव और होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा बनता दिख रहा है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि रूस-यूक्रेन युद्ध की गति "लगभग स्थिर" हो चुकी है, जिससे चर्चा का फोकस अन्य वैश्विक संकटों पर स्थानांतरित हो गया है। यूरोपीय नेता जहां यूक्रेन के लिए समर्थन बनाए रखने की वकालत कर रहे हैं, वहीं अमेरिका की सैन्य सहायता में कमी ने स्थिति को और जटिल बना दिया है।

वैश्विक संदेश क्या है-एकता या विभाजन?

G7 समिट में ट्रंप की बैठक सूची और प्राथमिकताओं से यह सवाल उठ रहा है कि क्या पश्चिमी देशों की एकजुटता कमजोर पड़ रही है। एक तरफ मोदी और खाड़ी देशों के नेताओं के साथ सक्रिय संवाद, और दूसरी तरफ ज़ेलेंस्की के साथ अलग बैठक की अनुपस्थिति-यह कूटनीतिक संकेत आने वाले वैश्विक समीकरणों में बड़े बदलाव की ओर इशारा करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह समिट सिर्फ नीतियों का नहीं, बल्कि शक्ति-संतुलन के नए दौर की शुरुआत भी साबित हो सकता है।