क्या हमीरपुर में बेतवा नदी पर बन रहे पुल का भारी-भरकम स्लैब वाकई सिर्फ 70-80 किमी/घंटा की रफ्तार वाली आंधी और बारिश के कारण ताश के पत्तों की तरह भरभराकर गिर गया? क्या निर्माण स्थल पर उनके सोने के लिए सुरक्षा मानकों की अनदेखी की गई थी? क्या SDRF और जेसीबी (JCB) की टीमें समय रहते उन्हें इस कंक्रीट के खौफनाक जाल से जिंदा बाहर निकाल पाएंगी?
Hamirpur Bridge Collapse: उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले से एक बेहद दर्दनाक और रूह कँपा देने वाला वाकया सामने आया है। यहां बेतवा नदी पर बन रहे एक बड़े निर्माणाधीन पुल का भारी-भरकम स्लैब अचानक ताश के पत्तों की तरह भरभराकर गिर गया। यह भयानक हादसा शुक्रवार तड़के करीब 2 से 3 बजे के बीच हुआ, जब पूरा इलाका गहरी नींद में सोया हुआ था। इस दिल दहला देने वाली घटना में अब तक 6 मज़दूरों की मौत की अधिकारिक पुष्टि हो चुकी है, जबकि कई अन्य ज़िंदगियाँ अब भी मलबे के नीचे दबी हुई हैं। घटना के बाद से ही पूरे इलाके में कोहराम मचा हुआ है।

आधी रात का सन्नाटा और अचानक आया 'मौत का बवंडर'
चश्मदीदों और स्थानीय प्रशासन के मुताबिक, शुक्रवार की रात सब कुछ सामान्य था। बेतवा नदी के तट पर चल रहे इस पुल निर्माण कार्य से जुड़े मज़दूर दिनभर की कड़ी मेहनत के बाद पुल के निचले हिस्से में ही आराम कर रहे थे। तभी अचानक मौसम ने खौफनाक करवट ली। मौसम विभाग की मानें तो आधी रात के बाद हमीरपुर और आसपास के इलाकों में 70 से 80 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से विनाशकारी आंधी चली और मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। कोई कुछ समझ पाता या अपनी जान बचाने के लिए भाग पाता, उससे पहले ही कंक्रीट का एक विशालकाय स्लैब सीधे सोते हुए मज़दूरों पर काल बनकर गिर गया। चीखने-चिल्लाने का मौका भी नहीं मिला और पलक झपकते ही कई ज़िंदगियाँ मलबे के ढेर में दफ़्न हो गईं।
मलबे के नीचे सांसों की जंग: आधी रात से जारी है खौफनाक रेस्क्यू ऑपरेशन
हादसे की खबर मिलते ही अपर पुलिस अधीक्षक (ASP) और जिले के आला अधिकारी भारी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुँचे। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए तुरंत स्टेट डिजास्टर रिस्पांस फोर्स (SDRF) को बुलाया गया। तड़के सुबह से ही मलबे को हटाने के लिए कई जेसीबी (JCB) मशीनें लगातार काम कर रही हैं। कंक्रीट और सरियों के उस खौफनाक मलबे के नीचे से अब तक 6 शवों को बाहर निकाला जा चुका है। अधिकारियों का कहना है कि कम से कम 6 और मज़दूरों के अभी भी मलबे के नीचे दबे होने की गंभीर आशंका है। जैसे-जैसे समय बीत रहा है, मलबे के नीचे दबे लोगों की सांसों की जंग और भी चुनौतीपूर्ण होती जा रही है। अपनों को तलाशते परिजनों की चीखें बेतवा नदी के किनारों पर गूँज रही हैं।
कुदरत का कहर या लापरवाही का बड़ा खेल? उठ रहे हैं गंभीर सवाल
इस दर्दनाक हादसे ने निर्माण कार्य की गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। जहाँ एक तरफ प्रत्यक्षदर्शी और स्थानीय लोग इसे तेज आंधी और आसमानी आफ़त का नतीजा बता रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ विशेषज्ञों का मानना है कि केवल आंधी-बारिश से एक बड़े पुल का निर्माणाधीन स्लैब इस तरह पूरी तरह ज़मींदोज़ नहीं हो सकता।
क्या इस पुल के निर्माण में घटिया सामग्री का इस्तेमाल किया जा रहा था?
क्या मौसम के इस बदले मिजाज़ के बीच मज़दूरों की सुरक्षा को लेकर कोई लापरवाही बरती गई? फिलहाल प्रशासन का पूरा ध्यान मलबे में फंसे लोगों को सकुशल बाहर निकालने पर है, लेकिन अधिकारियों ने साफ किया है कि रेस्क्यू पूरा होने के बाद इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय तकनीकी जाँच कराई जाएगी और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।


