अमेरिका-ईरान तनाव के बीच सस्ता कच्चा तेल पाने के लिए भारतीय रिफाइनरियों ने रणनीति बदल दी है। IOC, रिलायंस समेत कंपनियां अब Hormuz से तेल लाने के लिए खुद टैंकर किराए पर ले रही हैं। इराकी तेल पर 37 डॉलर तक की छूट और बढ़ी आवाजाही बनी वजह।
India Oil Strategy: अमेरिका और ईरान के बीच लंबे तनाव के बाद अब भारत की सरकारी और निजी तेल रिफाइनरियों ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। मार्च के महीने से जब होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) का यह संकरा रास्ता लगभग बंद सा हो गया था, तब भारतीय कंपनियों ने जोखिम से बचने के लिए अपने जहाज भेजने बंद कर दिए थे। वे सारा जोखिम विदेशी ट्रेडर्स और खाड़ी देशों के उत्पादकों पर छोड़ देती थीं, जिसके कारण उन्हें भारी प्रीमियम और अतिरिक्त लागत चुकानी पड़ती थी। लेकिन अब हालात सुधरने के साथ ही भारतीय रिफाइनरियों ने खुद टैंकर किराए पर लेने शुरू कर दिए हैं।
Strait of Hormuz: रिफाइनरियों ने क्यों बदला तरीका?
पहले भारतीय कंपनियां खाड़ी के उत्पादकों और ट्रेडिंग कंपनियों के जरिए तेल मंगाती थीं। इस मॉडल में होर्मुज से जुड़े शिपिंग जोखिम का बड़ा हिस्सा सप्लायर या ट्रेडर उठाता था। इसके बदले भारतीय रिफाइनरियों को ज्यादा माल ढुलाई और प्रीमियम देना पड़ता था। अब इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOC), रिलायंस इंडस्ट्रीज, भारत पेट्रोलियम और HPCL-मित्तल एनर्जी ने इराकी कच्चे तेल के कुछ सौदे FOB आधार पर किए हैं। यानी जहाज की व्यवस्था से लेकर तेल को मंजिल तक पहुंचाने की जिम्मेदारी खरीदार की होती है।
एफओबी (FOB) सौदों के जरिए परिवहन लागत पर नियंत्रण
हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इंडियन ऑयल, रिलायंस इंडस्ट्रीज, भारत पेट्रोलियम और एचपीसीएल-मित्तल एनर्जी जैसी बड़ी कंपनियों ने 'फ्री-ऑन-बोर्ड' (FOB) यानी एफओबी शर्तों के तहत इराकी कच्चा तेल खरीदना शुरू कर दिया है। इस डील के तहत खरीदार को खुद जहाजों की व्यवस्था करनी होती है और कार्गो को सुरक्षित मंजिल तक पहुंचाना होता है। इस कदम से कंपनियां अपनी ट्रांसपोर्टेशन लागत पर बेहतर नियंत्रण रख पा रही हैं। हालांकि, इसके लिए सही टैंकरों को ढूंढना और उन्हें बुक करना अभी भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है, जिसके लिए लगातार टेंडर जारी किए जा रहे हैं।
नाविकों के नियमों में ढील और भारी डिस्काउंट बना वजह
इस रणनीति बदलाव के पीछे दो मुख्य वजहें और भी हैं। पहला यह कि अगस्त में डायरेक्टरेट जनरल ऑफ़ शिपिंग ने अपनी एडवाइजरी में ढील दी थी। पहले भारतीय क्रू वाले जहाजों को इस रूट पर भेजने पर रोक थी, लेकिन अब नाविकों की सहमति से रास्ता खोल दिया गया है। दूसरा कारण इराक की सरकारी कंपनी SOMO द्वारा अक्टूबर के अनुबंधों पर दिया जा रहा भारी डिस्काउंट है, जो क्षेत्रीय बेंचमार्क पर 37 डॉलर प्रति बैरल तक की छूट दे रहा है। इसके अलावा, जेपी मॉर्गन की रिपोर्ट बताती है कि अमेरिका के दबाव के चलते भारत अब रूसी तेल खरीदने में थोड़ी हिचकिचाहट दिखा रहा है।
सितंबर में होर्मुज रूट से बढ़ा आयात
Kpler के आंकड़ों के अनुसार, सितंबर महीने में होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते भारत आने वाले कच्चे तेल की मात्रा बढ़कर औसतन 1.3 मिलियन बैरल प्रतिदिन पहुंच गई है। युद्ध शुरू होने यानी फरवरी के बाद से यह सबसे ऊंचा स्तर दर्ज किया गया है। मध्य पूर्व से भारत कुल मिलाकर प्रतिदिन लगभग 2.8 मिलियन बैरल कच्चा तेल आयात करता है। जानकारों का मानना है कि भारतीय रिफाइनरियों का यह नया कदम न केवल उनकी सप्लाई चेन को मजबूत करेगा, बल्कि उन्हें वैश्विक बाजार में सस्ता तेल हासिल करने में भी बड़ी मदद देगा।


