नॉर्वे की फूलों की दुकान बंद होने के बाद भी ग्राहकों को खरीदारी करने की सुविधा कैसे देती है? वीडियो में आदित्य ने स्कैंडिनेवियाई समाज की किस खास बात पर जोर दिया? सोशल मीडिया पर इस वीडियो को देखकर लोगों के बीच किस मुद्दे पर बहस शुरू हुई?
नॉर्वे में रहने वाले एक भारतीय शख्स आदित्य ने एक वीडियो पोस्ट किया है, जिसे देखकर इंटरनेट पर ईमानदारी और नागरिक ज़िम्मेदारी पर बड़ी बहस छिड़ गई है। आदित्य ने इंस्टाग्राम पर यह वीडियो शेयर किया है, जिसमें एक फूलों की दुकान दिखाई दे रही है। दुकान शाम को बंद हो चुकी है, लेकिन ढेर सारे फूल और पौधे बाहर ही रखे हुए हैं, जहां से कोई भी गुज़रने वाला उन्हें देख सकता है। लेकिन फूलों से ज़्यादा हैरानी की बात यह थी कि उनकी निगरानी के लिए वहां कोई भी मौजूद नहीं था। यह दुकान भरोसे के एक सीधे-सादे सिद्धांत पर चलती है।

आदित्य वीडियो में बताते हैं कि दुकान बंद होने के बाद अगर किसी को फूल खरीदने हैं, तो वे अपनी पसंद के फूल चुन सकते हैं और दुकान के दरवाज़े पर दी गई जानकारी के हिसाब से पेमेंट कर सकते हैं। वीडियो में वह कहते हैं, "चलिए मैं आपको भरोसे के बारे में कुछ बताता हूं। स्कैंडिनेविया में इंसान, इंसान पर कैसे भरोसा करता है।"
वह देर रात दुकान के बाहर खड़े होकर दिखाते हैं कि वहां कोई कर्मचारी नहीं है और न ही चोरी रोकने का कोई इंतज़ाम। वह कहते हैं, "दुकान बंद है, लेकिन उनके सारे फूल बाहर रखे हैं।" वह आगे बताते हैं कि ग्राहकों पर भरोसा किया जाता है कि वे खुद ही पेमेंट कर देंगे। "वे आप पर भरोसा करते हैं कि आप इसे उठाएंगे और इसके लिए पैसे देंगे।"
वायरल वीडियो देखें
लोगों ने क्या कहा?
"नॉर्वे में इंसानी भरोसा" टाइटल वाले इस वीडियो ने लोगों का दिल जीत लिया और भरोसे पर आधारित सिस्टम को लेकर दुनियाभर में एक चर्चा शुरू हो गई। कुछ यूज़र्स ने इस सिस्टम की तारीफ की, तो वहीं कुछ ने सवाल उठाया कि क्या ऐसा मॉडल उन देशों में काम कर सकता है जहां चोरी और बेईमानी का डर ज़्यादा होता है। एक यूज़र ने पूछा, "जिन जगहों पर भरोसा खत्म हो चुका है, वहां इसे कैसे बढ़ावा दिया जा सकता है?" एक अन्य यूज़र ने बताया कि स्वीडन में भी ऐसा ही होता है।
इस वीडियो को देखकर कई भारतीयों को अपने देश की घटनाएं याद आ गईं। पिछले कुछ सालों में ऐसे कई वीडियो सामने आए हैं, जहां शहरों को सुंदर बनाने के लिए लगाए गए गमले और सजावटी पौधे रातों-रात गायब हो गए। ऐसी घटनाओं के बाद अक्सर एक नागरिक के तौर पर हमारी ज़िम्मेदारियों पर बहस छिड़ जाती है।
