क्या US-ईरान शांति समझौते के पीछे फ्रोज़न एसेट्स और अरबों डॉलर का बड़ा खेल छिपा है? क्या होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर ईरान का नियंत्रण और भविष्य की फीस नया वैश्विक विवाद बनेगी? क्या 60 दिन की परमाणु वार्ता के बाद प्रतिबंध हटेंगे या फिर नया टकराव शुरू होगा?मिसाइल प्रोग्राम पर ईरान के सख्त इनकार से क्या शांति डील का सबसे बड़ा रहस्य सामने आया?

तेहरान/वाशिंगटन: अमेरिका और ईरान के बीच डिजिटल रूप से हस्ताक्षरित 'इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन (MoU)' के आधिकारिक तौर पर फाइनल होते ही वैश्विक राजनीति में एक नया और बेहद तनावपूर्ण मोड़ आ गया है। जहाँ एक तरफ इस ऐतिहासिक डील से युद्धविराम लागू हो गया है और होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को खोलने का रास्ता साफ हुआ है, वहीं दूसरी तरफ समझौते की व्याख्या को लेकर दोनों महाशक्तियों के बीच परदे के पीछे एक भीषण कूटनीतिक जंग छिड़ गई है। ईरान ने साफ कर दिया है कि वह शांति के बदले अपनी संप्रभुता से कोई समझौता नहीं करेगा।

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'डिजिटल दस्तखत' का खेल: उल्लंघन करने पर अब चुकानी होगी भारी कीमत!

ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने सरकारी ब्रॉडकास्टर IRIB के जरिए अमेरिका को सीधे शब्दों में चेतावनी दी है। बघाई ने पुष्टि की कि दोनों देशों के राष्ट्रपतियों ने इस ऐतिहासिक दस्तावेज़ पर डिजिटल रूप से साइन कर दिए हैं, जिसके बाद यह अब "आधिकारिक तौर पर फाइनल" है। लेकिन असली सस्पेंस इसके बाद शुरू होता है। बघाई ने कड़े लहजे में कहा कि दोनों राष्ट्राध्यक्षों की मंजूरी के बाद अब इस समझौते के किसी भी उल्लंघन के नतीजे पहले से कहीं ज्यादा गंभीर होंगे और ऐसा करने वाले को "भारी कीमत चुकानी होगी"। तेहरान का यह सख्त रुख साफ करता है कि वह वाशिंगटन की हर चाल पर बारीक नजर रख रहा है।

'परमाणु मुद्दे' पर तेहरान की सोची-समझी रणनीति: पहले युद्ध का खात्मा, फिर बात!

इस पूरे समझौते में सबसे बड़ा चौंकाने वाला पहलू यह रहा कि ईरान ने इस चरण में अपने परमाणु कार्यक्रम पर कोई भी मुख्य समझौता करने से साफ इनकार कर दिया। प्रवक्ता बघाई ने खुलासा किया कि इस्लामिक रिपब्लिक का यह एक समझदारी भरा और सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था कि शुरुआत में परमाणु मुद्दे को ज्यादा तूल न दिया जाए। ईरान की पहली प्राथमिकता युद्ध को खत्म करना और संघर्ष को रोकना था, जिसे उसने सफलतापूर्वक हासिल कर लिया है। अब आने वाले 60 दिनों की अवधि में यूरेनियम संवर्धन (enrichment) को सीमित करने और प्रतिबंधों को हटाने पर बातचीत केंद्रित रहेगी, जहाँ अमेरिका किसी भी कीमत पर ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकने के लिए कड़े नियम थोपने की कोशिश करेगा।

फ्रोज़न एसेट्स और तेल का रेवेन्यू: अमेरिका को हटानी होंगी अपनी सारी बाधाएं

अपनी पंगु हो चुकी अर्थव्यवस्था को दोबारा जिंदा करने के लिए ईरान ने अमेरिका के सामने बेहद कड़क शर्तें रखी हैं। मेहर समाचार एजेंसी के अनुसार, ईरान के केंद्रीय बैंक के साथ गहन चर्चा के बाद दुनिया भर में रुकी हुई ईरानी संपत्ति (Frozen Assets) को जारी करने की प्रक्रिया को अंतिम रूप दे दिया गया है। तेहरान ने साफ कर दिया है कि उसे अपनी इस संपत्ति तक पहुँचने और बिना किसी रोक-टोक के इसका इस्तेमाल करने का पूरा अधिकार है। इसके अलावा, ईरान ने बिना किसी अंतरराष्ट्रीय पाबंदी के अपना तेल बेचने और उससे होने वाली कमाई का स्वतंत्र रूप से इस्तेमाल करने की मांग पर जोर दिया है, जिसके लिए अमेरिका ने मौजूदा बाधाओं को हटाने का लिखित वादा किया है।

होर्मुज़ स्ट्रेट का नया नियम: ‘युद्ध-पूर्व की स्थितियों में वापस नहीं जाएगा यह जलमार्ग’

इस समझौते का सबसे विवादित और सस्पेंस से भरा हिस्सा वैश्विक ऊर्जा गलियारा-होर्मुज़ जलडमरूमध्य-है। ईरान के मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बाघेर घालीबाफ ने सरकारी टेलीविजन पर लाइव आकर दुनिया को चौंका दिया। उन्होंने साफ कहा कि "होर्मुज जलडमरूमध्य अब युद्ध-पूर्व की स्थितियों में वापस नहीं जाएगा।" समझौते के तहत कमर्शियल जहाजों के लिए 60 दिनों की टोल-फ्री अवधि दी गई है, लेकिन उसके बाद ईरान और ओमान मिलकर इस रणनीतिक जलमार्ग का प्रबंधन करेंगे। घालीबाफ ने ऐलान किया कि होर्मुज पर ईरान का संप्रभु अधिकार है और वे इसके बाद वहां से गुजरने वाली सेवाओं के लिए ट्रांजिट शुल्क (फीस) वसूलेंगे। हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही कह चुके हैं कि वह इस रास्ते पर कोई टोल स्वीकार नहीं करेंगे, जिसने भविष्य के लिए एक बड़े टकराव की नींव रख दी है।

मिसाइलों पर नो-नेगोशिएशन: ‘हमारी मिसाइलें सिर्फ दागने के लिए हैं, बातचीत के लिए नहीं!’

समझौते की पहली ही धारा में लेबनान की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने की बात कही गई है, जिसे ईरान ने अपनी एक बड़ी कूटनीतिक जीत बताया है। लेकिन, भविष्य की बातचीत को लेकर ईरान ने अपनी सबसे खतरनाक सैन्य सीमा रेखा खींच दी है। ईरानी अधिकारियों ने साफ कर दिया है कि उनकी रक्षा और सैन्य क्षमताओं को किसी भी टेबल पर चर्चा का हिस्सा नहीं बनाया जाएगा। प्रवक्ता बघाई ने बेहद आक्रामक अंदाज में कहा, "ईरान की मिसाइलें सिर्फ दागने के लिए हैं, बातचीत के लिए नहीं।" तेहरान अपनी रक्षा प्रणाली और मिसाइल प्रोग्राम को लेकर किसी भी देश या प्रक्रिया के साथ कोई बातचीत नहीं करेगा। ऐसे में जिनेवा में होने वाली आगामी बैठक शांति लाएगी या नए विवाद, यह देखना दिलचस्प होगा।