क्या 60 दिनों में अमेरिका-ईरान की ऐतिहासिक डील मध्य पूर्व का पूरा समीकरण बदल देगी? क्या होरमुज़ जलडमरूमध्य खुलने से वैश्विक तेल व्यापार और अर्थव्यवस्था में बड़ा उलटफेर होगा? क्या 300 अरब डॉलर का पुनर्निर्माण फंड ईरान को नई आर्थिक ताकत बना देगा? क्या परमाणु हथियार छोड़ने और प्रतिबंध हटने के बाद दुनिया एक नए भू-राजनीतिक युग में प्रवेश करने जा रही है?

वाशिंगटन/तेहरान: पिछले कई दिनों से जिस रहस्यमयी समझौते को लेकर पूरी दुनिया में अटकलों का बाज़ार गर्म था, आखिरकार उससे पर्दा उठ गया है। सप्ताहांत में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के बीच परदे के पीछे जो खिचड़ी पकी थी, उसका पूरा खाका अब दुनिया के सामने आ चुका है। भारी जन दबाव के बाद अमेरिकी अधिकारियों ने एक आपातकालीन कॉन्फ्रेंस कॉल पर इस ऐतिहासिक दस्तावेज़ की एक-एक शर्त पढ़कर सुनाई, जिसके बाद वैश्विक राजनीति में एक नया भूचाल आ गया है।

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'इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन': क्या यह शांति है या किसी बड़े तूफ़ान से पहले की शांति?

इस बेहद संवेदनशील दस्तावेज़ का औपचारिक नाम "संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के इस्लामी गणराज्य के बीच इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन" रखा गया है। इस समझौते पर आने वाले शुक्रवार को आधिकारिक तौर पर हस्ताक्षर किए जाने हैं। लेकिन सेंसपेन्स यहीं खत्म नहीं होता। हस्ताक्षर के ठीक बाद दोनों देशों के पास अंतिम समझौते की शर्तों को तय करने के लिए सिर्फ 60 दिनों की डेडलाइन होगी। दिलचस्प बात यह है कि जहां अमेरिका ने इस महाडील का पूरा कच्चा चिट्ठा खोल दिया है, वहीं ईरान की तरफ से अभी भी एक रहस्यमयी चुप्पी छाई हुई है। तेहरान ने अब तक अपने पत्तों का खुलासा नहीं किया है।

60 दिनों का काउंटडाउन: लेबनान से लेकर हर मोर्चे पर सीज़फ़ायर का फरमान!

इस समझौते का सबसे चौंकाने वाला और तात्कालिक असर युद्ध के मैदानों पर दिखने वाला है। मसौदे में साफ़ तौर पर लिखा गया है कि दोनों देश "लेबनान सहित सभी मोर्चों पर सैन्य अभियानों को तुरंत और स्थायी रूप से समाप्त करने" के लिए मजबूर होंगे। बंद कमरों में तय हुई इस शर्त ने मिडिल ईस्ट के युद्धग्रस्त इलाकों में अचानक बंदूकों को शांत होने पर मजबूर कर दिया है। अगर अगले 60 दिनों के भीतर दोनों पक्ष अंतिम नतीजे पर नहीं पहुँचते, तो यह पूरी मेहनत पानी में मिल जाएगी, जिससे यह 60 दिन पूरी दुनिया के लिए किसी सस्पेंस थ्रिलर से कम नहीं होने वाले हैं।

होर्मुज स्ट्रेट का रहस्य: हटेगी नौसैनिक नाकेबंदी, पीछे हटेंगी अमेरिकी सेनाएं!

वैश्विक व्यापार की जीवनरेखा कहे जाने वाले 'स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़' (होरमुज़ जलडमरूमध्य) को लेकर एक ऐसा दांव खेला गया है जिसकी उम्मीद किसी ने नहीं की थी। समझौते के तहत, अमेरिका अगले 30 दिनों के भीतर ईरान की पूरी नौसैनिक नाकेबंदी हटाने के लिए राजी हो गया है। जंग से पहले जहाजों की जैसी बेखौफ आवाजाही थी, उसे फिर से बहाल किया जाएगा। सबसे बड़ा ट्विस्ट यह है कि अंतिम समझौता होने के ठीक 30 दिनों के भीतर अमेरिका ईरान के चारों तरफ फैले रणनीतिक क्षेत्रों से अपनी विशाल सेना को हमेशा के लिए हटा लेगा। बदले में ईरान ने वादा किया है कि वह अगले 60 दिनों तक बिना किसी टैक्स या शुल्क के सभी कमर्शियल जहाजों को सुरक्षित रास्ता देगा।

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परमाणु हथियारों पर पूर्ण विराम: यूरेनियम के खात्मे का वो 'सीक्रेट' ऑपरेशन

इस पूरी डील का सबसे संवेदनशील हिस्सा ईरान का परमाणु कार्यक्रम है। पश्चिमी देशों की रातों की नींद उड़ाने वाले इस मुद्दे पर ईरान आखिरकार झुक गया है। मसौदे के अनुसार, ईरान इस बात पर पूरी तरह सहमत हो गया है कि वह कभी भी परमाणु हथियार नहीं बनाएगा। यही नहीं, ईरान के पास जो पहले से संवर्धित परमाणु सामग्री मौजूद है, उसे नष्ट करने के लिए एक सीक्रेट ऑपरेशन चलाया जाएगा, जिसे इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (IAEA) की सख्त निगरानी में "साइट पर सम्मिश्रण (blending on site)" के जरिए अंजाम दिया जाएगा।

300 अरब डॉलर का पुनर्निर्माण फंड और प्रतिबंधों की विदाई: क्या बदलेगी ईरान की किस्मत?

इस समझौते को अमलीजामा पहनाने के लिए अमेरिका ने ईरान के सामने जो सबसे बड़ा लालच रखा है, वह है आर्थिक पैकेज। अमेरिका अपने क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ मिलकर ईरान के कायाकल्प और विकास के लिए $300 अरब (300 बिलियन डॉलर) का एक विशाल फंड तैयार करने जा रहा है। इसके साथ ही, ईरान की अर्थव्यवस्था को पंगु बनाने वाले सभी अमेरिकी प्रतिबंधों को हमेशा के लिए हटा लिया जाएगा। प्रतिबंध कब और किस चरण में हटेंगे, इसका अंतिम टाइमटेबल 60 दिनों की बातचीत के बाद तय होगा। अब दुनिया की निगाहें शुक्रवार को होने वाले हस्ताक्षरों पर टिकी हैं कि क्या यह डील सच में नया इतिहास लिखेगी या बीच में ही बिखर जाएगी!