ईरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य में सर्विस फ़ीस और दोस्ताना देशों को विशेष सुविधा की घोषणा की, जिससे वैश्विक तेल व्यापार, ऊर्जा कीमतें और अमेरिका-ईरान तनाव फिर सुर्खियों में हैं।

बीजिंग/तेहरान: वैश्विक अर्थव्यवस्था की सबसे संवेदनशील नस माने जाने वाले होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर एक ऐसी सनसनीखेज खबर आई है, जिसने पूरी दुनिया के बाजारों और कूटनीतिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। हालिया भीषण युद्ध की समाप्ति के बाद जहां दुनिया राहत की सांस ले रही थी, वहीं अब ईरान ने इस रणनीतिक जलमार्ग पर अपना नया दांव खेल दिया है। चीन में ईरान के राजदूत ने शनिवार को बीजिंग में आयोजित 'वर्ल्ड पीस फोरम' में एक ऐसा ऐलान किया, जिसने वाशिंगटन से लेकर यूरोपीय देशों तक हड़कंप मचा दिया है। ईरान अब इस जलमार्ग से गुजरने वाले हर एक कमर्शियल जहाज से नई 'सर्विस फीस' वसूलने की पुख्ता योजना बना रहा है। इस फैसले ने समुद्र की लहरों पर एक बार फिर से भारी सस्पेंस और अनिश्चितता का माहौल पैदा कर दिया है।

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60 दिनों की मोहलत और वाशिंगटन की तल्खी: क्या फिर छिड़ेगी जंग?

रहस्य और भू-राजनीतिक तनाव तब और गहरा गया जब यह बात सामने आई कि ईरान और अमेरिका के बीच हुए हालिया शुरुआती समझौते के तहत कमर्शियल जहाजों को सिर्फ 60 दिनों तक बिना किसी शुल्क के गुजरने की इजाजत दी गई थी। लेकिन सवाल यह है कि इस 60 दिनों की अस्थायी अवधि के खत्म होने के बाद क्या होगा? ईरान के राजदूत अब्दोलरेज़ा रहमानी फ़ज़ली ने बीजिंग से सीधे शब्दों में साफ कर दिया, "एक ऐसे देश के तौर पर जिसके क्षेत्रीय जलक्षेत्र का हिस्सा होर्मुज़ है, हम निश्चित रूप से सर्विस फीस लेंगे।" दूसरी तरफ, वाशिंगटन ने ईरान के इस 'सर्विस फीस' या टैक्स वसूलने के विचार को सिरे से खारिज कर दिया है। अमेरिका की यह तल्खी साफ इशारा कर रही है कि खाड़ी देशों में शांति का यह दौर किसी बड़े तूफान से पहले का सन्नाटा भी हो सकता है।

'टोल' नहीं, 'सुरक्षा का सौदा': ईरान की नई चाल का इनसाइड सच

ईरान इस वसूली को अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत जायज ठहराने के लिए एक बेहद शातिर कानूनी और कूटनीतिक ढाल तैयार कर रहा है। राजदूत फ़ज़ली ने जोर देकर कहा कि इन शुल्कों को एक सामान्य "टोल टैक्स" के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। इसके बजाय, ईरान इसे "सुरक्षा और प्रबंधन सेवाओं" का नाम दे रहा है। ईरान के प्रस्तावित प्लान के मुताबिक, इस फीस के बदले जहाजों को जलमार्ग से सुरक्षित गुजरने की गारंटी, भारी समुद्री ट्रैफिक की आधुनिक निगरानी और बड़े जहाजों से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान से निपटने की सेवाएं दी जाएंगी। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ईरान इस पूरे ट्रैफिक और फीस सिस्टम को मैनेज करने के लिए ओमान के साथ एक सीक्रेट नई व्यवस्था पर तेजी से काम कर रहा है, जिससे पश्चिमी देशों की टेंशन दोगुनी हो गई है।

दोस्तों के लिए 'खास' सुविधा: कूटनीति के खेल में कौन होगा मालामाल?

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प और रहस्यमयी मोड़ तब आया जब ईरानी राजदूत ने दोस्ती और दुश्मनी का नया समीकरण दुनिया के सामने रखा। उन्होंने खुले मंच से वादा किया, "हम निश्चित रूप से उन देशों के लिए 'खास' रियायत और सुविधाओं पर विचार करेंगे जो हमारे दोस्त थे और मुश्किल समय (युद्ध के दौरान) में हमारे साथ मजबूती से खड़े रहे।" ईरान का यह बयान सीधे तौर पर चीन और उसके सहयोगी देशों की तरफ इशारा माना जा रहा है। कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि इस 'खास' सुविधा के जरिए ईरान वैश्विक व्यापार में अपने मित्र देशों को भारी आर्थिक फायदा पहुंचा सकता है, जबकि विरोधी देशों के जहाजों के लिए इस रास्ते को एक महंगा और जटिल दुःस्वप्न बना सकता है।

दांव पर दुनिया की धड़कन: क्या फिर आसमान छुएगा कच्चा तेल?

होर्मुज़ जलडमरूमध्य कोई साधारण जलमार्ग नहीं है; यह वैश्विक अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा है, जहां से दुनिया का लगभग पांचवां हिस्सा कच्चा तेल ($20\%$) और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) का निर्यात होता है। हालिया संघर्ष के दौरान जब ईरान ने इस रास्ते को बंद किया था, तो पूरी दुनिया में हाहाकार मच गया था और ऊर्जा की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई थीं। हालांकि लड़ाई रोकने के लिए अमेरिका के साथ शुरुआती समझौते के बाद इस रास्ते को खोला गया है और स्थायी समाधान के लिए दोनों पक्षों के बीच बातचीत अभी भी जारी है, लेकिन ईरान का यह नया 'सर्विस फीस' का दांव और दोस्ताना देशों को विशेष रियायत देने की रणनीति वैश्विक ऊर्जा बाजार को एक बार फिर बारूद के ढेर पर लाकर खड़ा कर सकती है। दुनिया भर के व्यापारियों की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि 60 दिनों की डेडलाइन खत्म होने के बाद अमेरिका इस पर क्या जवाबी कार्रवाई करता है।