Jallikattu 2026: ये खूनी नहीं, खून खौलाने वाला खेल है-जल्लीकट्टू के बारे में जानें सबकुछ
तमिलनाडु में जल्लीकट्टू 2026 सीजन की शुरुआत हो चुकी है। पोंगल के मौके पर होने वाले इस पारंपरिक खेल का इतिहास क्या है, सुप्रीम कोर्ट ने क्या नियम बनाए हैं और इससे जुड़ी दिलचस्प बातें, आइए जानते हैं।
शेर की तरह दहाड़ते बैल, रोंगटे खड़े कर देगा जल्लीकट्टू 2026!
दक्षिण भारत, खासकर तमिलनाडु में जल्लीकट्टू एक बहुत ही लोकप्रिय और साहसिक खेल है। इस सीजन की शुरुआत 3 जनवरी को तमिलनाडु में आधिकारिक तौर पर हो गई है। यह सिर्फ एक खेल नहीं है, इसके पीछे हजारों साल का इतिहास, संस्कृति और परंपराएं छिपी हैं। पोंगल के त्योहार पर सांडों को काबू करने वाले इस खेल में जीतने वालों को न केवल इनाम मिलता है, बल्कि समाज में बहुत सम्मान भी मिलता है। जैसे भारत के हर राज्य का अपना एक खास खेल है, वैसे ही जल्लीकट्टू तमिलनाडु की एक खास पहचान है।
खून का इतिहास नहीं...यह खून खौला देने वाला खेल है!
जल्लीकट्टू का इतिहास लगभग 2,000 साल पुराना है। इतिहासकारों का मानना है कि इस खेल के निशान सिंधु घाटी सभ्यता में भी मिलते हैं। तमिलनाडु की धरती पर इसका एक खास स्थान है। यह सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि ताकत और साहस का प्रतीक है। इस खेल में हिस्सा लेने वाले को एक तय समय या दूरी तक सांड के कूबड़ को पकड़कर लटके रहना होता है। जो ऐसा कर लेता है, उसे कई तरह के इनाम दिए जाते हैं। इस खेल के लिए पुलिकुलम और कांगेयम जैसी मशहूर नस्लों के सांडों को खास तौर पर पाला जाता है। यह मुख्य रूप से खेती से जुड़ा खेल है, जो जनवरी के मध्य में संक्रांति के समय आयोजित होता है। कहा जाता है कि पहले राज्य के कई इलाकों में दूल्हा चुनने के लिए भी यह प्रतियोगिता होती थी।
तच्चनकुरिची में जल्लीकट्टू का पहला मुकाबला
तमिलनाडु की जल्लीकट्टू परंपरा में पुदुक्कोट्टई जिले के तच्चनकुरिची गांव का एक खास स्थान है। हर साल जल्लीकट्टू सीजन की शुरुआत यहीं से होती है। इस साल भी 3 जनवरी, 2026 को तच्चनकुरिची में पहले जल्लीकट्टू के आयोजन के लिए सरकार ने अनुमति दे दी है। यह राज्य भर में होने वाली प्रतियोगिताओं की शुरुआत है। तमिलनाडु में सबसे ज्यादा 'वाडिवासल' (जहां से सांड मैदान में आते हैं) पुदुक्कोट्टई जिले में हैं। इसीलिए यह जिला संगठित जल्लीकट्टू प्रतियोगिताओं का केंद्र बन गया है।
जल्लीकट्टू के पिछले आंकड़े और सुरक्षा मानक
पिछले आंकड़े इस खेल में हिस्सा लेने वालों की संख्या और खतरों को दिखाते हैं। 2025 में हुई प्रतियोगिताओं में लगभग 600 से ज्यादा सांडों के साथ कई लोगों ने हिस्सा लिया था। इसे देखने के लिए बड़ी संख्या में दर्शक भी आए थे। इस दौरान कई लोग घायल हुए। 2024 में भी 22 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। इन आंकड़ों को देखते हुए सरकार ने सुरक्षा मानकों को और भी सख्त कर दिया है और हादसों को रोकने के लिए कड़े कदम उठा रही है।
जल्लीकट्टू के लिए कानूनी लड़ाई और मौजूदा नियम
खेल के खतरनाक होने की वजह से 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने जल्लीकट्टू पर प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन, इस फैसले का तमिलनाडु के लोगों ने जमकर विरोध किया। अपनी संस्कृति को बचाने के लिए बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। इसके बाद, 2017 में तमिलनाडु सरकार ने पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 में संशोधन करके एक अध्यादेश के जरिए प्रतिबंध हटा दिया। अब जल्लीकट्टू कानूनी तौर पर आयोजित किया जाता है, लेकिन इस पर सरकार की निगरानी रहती है। राज्य पशुपालन विभाग और पशु चिकित्सा अधिकारियों के निर्देशों के तहत मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOPs) का सख्ती से पालन करना होता है। सांडों की स्वास्थ्य जांच, एम्बुलेंस की सुविधा, मेडिकल टीम और दर्शकों के लिए अलग जोन बनाना अनिवार्य है। किसी भी नियम का उल्लंघन होने पर अनुमति रद्द कर दी जाती है।
जल्लीकट्टू के लिए ऑनलाइन आवेदन
जल्लीकट्टू के आयोजन में पारदर्शिता लाने के लिए राज्य सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया है। प्रतियोगिताओं के आयोजन के लिए आवेदन सिर्फ ऑनलाइन पोर्टल के जरिए ही जमा करने का आदेश दिया गया है। हाथ से दिए गए आवेदनों को स्वीकार नहीं किया जा रहा है। इस डिजिटल तरीके से नियमों के पालन को रियल-टाइम में ट्रैक करना आसान हो गया है। जिला प्रशासन मैदान में हालात पर नजर रखता है। यह खेल सिर्फ मनोरंजन नहीं है, बल्कि यह तमिलनाडु के आत्म-सम्मान और ग्रामीण संस्कृति का आईना है। पॉप कल्चर में भी इसकी जगह है। 2019 में आई मलयालम फिल्म 'जल्लीकट्टू' को टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में दिखाया गया था और इसकी काफी तारीफ हुई थी।