Nidal Hasan Execution: अमेरिका में 13 लोगों की हत्या के दोषी निदाल हसन की फांसी LIVE दिखाने की योजना पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दोबारा विचार कर रहे हैं। पहले समर्थन, अब विरोध के बीच पीछे हटने के संकेत। क्या अमेरिका में फांसी का पहला लाइव प्रसारण टल जाएगा?

अमेरिका में 13 लोगों की हत्या के दोषी पूर्व आर्मी मेजर निदाल हसन की फांसी अब सिर्फ सजा का मामला नहीं, बल्कि एक बड़ी राजनीतिक और नैतिक बहस बन गई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पहले फांसी का लाइव प्रसारण दिखाने का समर्थन किया था, लेकिन अब उनके रुख में बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। सवाल है कि क्या अमेरिका में पहली बार किसी व्यक्ति की फांसी का सीधा प्रसारण देखने को मिलेगा या ट्रंप इस योजना को रोक देंगे?

फांसी LIVE दिखाने के फैसले पर क्यों घिरे ट्रंप?

Axios की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप ने अपने करीबी लोगों से बातचीत में संकेत दिया है कि 3 दिसंबर को प्रस्तावित फांसी की लाइव स्ट्रीमिंग शायद नहीं हो। इस विचार को लेकर अमेरिकी सांसदों के दोनों दलों और व्हाइट हाउस के भीतर-बाहर मौजूद सलाहकारों ने विरोध जताया है।

अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने गुरुवार को कहा था कि फांसी का प्रसारण किया जा सकता है, ताकि लोग गंभीर अपराधों के परिणाम समझ सकें। हालांकि, इस प्रस्ताव की अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना हुई। ट्रंप ने शुरुआत में इसका समर्थन किया था, लेकिन बाद में कहा कि अंतिम फैसला वही करेंगे।

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ट्रंप के सामने क्या हैं दो विकल्प?

ट्रंप का तर्क रहा है कि ऐसी सजा का सार्वजनिक प्रसारण दूसरे लोगों को गंभीर अपराध करने से रोक सकता है। हालांकि, इस कदम को लेकर नैतिक सवाल भी उठ रहे हैं। आलोचकों की चिंता है कि फांसी का लाइव प्रसारण न्यायिक सजा को सार्वजनिक तमाशे में बदल सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रशासन के एक अधिकारी को भी लगता है कि ट्रंप लाइव प्रसारण की मंजूरी नहीं देंगे। हालांकि, इस बारे में अंतिम निर्णय राष्ट्रपति को ही लेना है।

कौन है निदाल हसन, जिसने फोर्ट हुड में की थी गोलीबारी?

निदाल हसन अमेरिकी सेना का पूर्व मेजर है। 5 नवंबर 2009 को टेक्सास के फोर्ट हुड सैन्य ठिकाने पर उसकी गोलीबारी में 13 लोगों की मौत हुई थी, जिनमें एक गर्भवती महिला भी शामिल थी। इस हमले में 32 लोग घायल हुए थे। उस समय सैनिक मेडिकल जांच के लिए कतार में खड़े थे।

बाद में अमेरिकी सीनेट की एक रिपोर्ट ने सेना की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए थे। रिपोर्ट के मुताबिक, राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दों पर सावधानी बरतने के कारण अधिकारियों को हसन के बढ़ते कट्टरपंथी विचारों का समय रहते पता नहीं चल पाया था।

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