राहुल गांधी ने दावा किया कि 10 साल में 152 पेपर लीक हुए, लेकिन किसी दोषी को सजा नहीं मिली। क्या कानून में ऐसा लूपहोल है जिससे आरोपी बच निकलते हैं? जानिए Public Examinations Act, डिफॉल्ट बेल और फास्ट ट्रैक कोर्ट की पूरी कहानी।

नीट पेपर लीक को लेकर जारी विरोध प्रदर्शन के बीच कांग्रेस सांसद और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सरकार पर बड़ा हमला बोला है। प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरने के दूसरे दिन राहुल गांधी ने दावा किया कि पिछले 10 वर्षों में देशभर में 152 पेपर लीक हुए, जिससे करीब 7.5 करोड़ छात्र और उनके परिवार प्रभावित हुए, लेकिन अब तक किसी भी मामले में दोषियों को अंतिम सजा नहीं मिली। इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेपर लीक मामलों की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने का ऐलान किया है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब कानून इतने सख्त हैं, तो आरोपी बच कैसे जाते हैं?

राहुल गांधी का दावा और सरकार का जवाब

राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि बार-बार पेपर लीक होने के बावजूद दोषियों को सजा नहीं मिल रही है। उनका आरोप है कि इससे छात्रों का भविष्य लगातार प्रभावित हो रहा है। दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की कि पेपर लीक मामलों में तेजी से सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए जाएंगे, ताकि दोषियों को जल्द और कड़ी सजा मिल सके।

देश में पहले से Public Examinations (Prevention of Unfair Means) Act, 2024 लागू है। इसके तहत पेपर लीक, सॉल्वर गैंग, प्रश्नपत्र की खरीद-फरोख्त और परीक्षा प्रणाली में हैकिंग जैसे अपराधों पर 3 से 10 साल तक की सजा और भारी जुर्माने का प्रावधान है। कई राज्यों ने भी अपने अलग कानून बनाए हैं।

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आखिर कानून का सबसे बड़ा लूपहोल क्या है?

कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक सबसे बड़ी चुनौती जांच और चार्जशीट दाखिल करने में लगने वाला समय है। यदि गिरफ्तारी के बाद तय कानूनी समय-सीमा के भीतर चार्जशीट दाखिल नहीं होती, तो आरोपी वैधानिक (डिफॉल्ट) जमानत पाने का अधिकार हासिल कर लेता है।

पेपर लीक जैसे मामलों में डिजिटल साक्ष्य, कई राज्यों में फैली जांच, फोरेंसिक रिपोर्ट और बड़ी संख्या में गवाहों के कारण जांच लंबी चलती है। ऐसे में कई बार चार्जशीट समय पर दाखिल नहीं हो पाती और आरोपी जमानत पर बाहर आ जाते हैं। यही कारण है कि गिरफ्तारी होने के बावजूद अंतिम सजा तक पहुंचने में वर्षों लग जाते हैं।

फास्ट ट्रैक कोर्ट से क्या बदलेगी तस्वीर?

सरकार का मानना है कि फास्ट ट्रैक कोर्ट बनने से पेपर लीक मामलों की सुनवाई तेजी से होगी। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि केवल अदालतों की संख्या बढ़ाने से समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी। यदि जांच एजेंसियां समय पर मजबूत चार्जशीट दाखिल करें और डिजिटल साक्ष्य जल्दी जुटाएं, तभी दोषियों को शीघ्र सजा मिल सकेगी।

यानी पेपर लीक पर सख्त कानून पहले से मौजूद हैं, लेकिन प्रभावी जांच, समयबद्ध अभियोजन और तेज न्यायिक प्रक्रिया ही यह तय करेगी कि भविष्य में ऐसे मामलों में दोषियों को वास्तव में जल्द सजा मिल पाएगी या नहीं।

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