POK में अलग राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री-झंडा आखिर स्वायत्तता है या राजनीतिक दिखावा? क्या पाकिस्तान ने “आजाद कश्मीर” के नाम पर नियंत्रण छिपाने की साज़िश रची है? अगर असली सत्ता इस्लामाबाद/रावलपिंडी के पास है, तो स्थानीय संस्थाएँ कितनी वास्तविक हैं? क्या विरोध-प्रदर्शन और दमन यह साबित करते हैं कि POK में लोकतंत्र सिर्फ नाममात्र है?

PoK Political System Analysis: पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में हाल ही में भड़की भीषण हिंसा, खून-खराबे और 'जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी' (JAAC) के नेतृत्व में हुए विद्रोह ने इस्लामाबाद की रातों की नींद उड़ा दी है। इस अशांति के बीच दुनिया का ध्यान एक ऐसे बुनियादी और रहस्यमयी सवाल पर गया है जो दशकों से अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के पर्दों के पीछे छिपा हुआ था। सवाल यह है कि अगर PoK पर पाकिस्तान का ही पूरा कंट्रोल है, तो वहां अलग राष्ट्रपति, अलग प्रधानमंत्री, अपनी विधानसभा और अलग झंडा क्यों है? क्या यह सचमुच कश्मीरियों की आज़ादी है या फिर रावलपिंडी के सैन्य मुख्यालय (जीएचक्यू) में बुना गया एक ऐसा खौफनाक चक्रव्यूह है, जिसका मकसद सिर्फ दुनिया की आंखों में धूल झोंकना है? आइए, इस राजनीतिक प्रपंच के पीछे की कड़वी और सनसनीखेज हकीकत से पर्दा उठाते हैं।

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अगस्त 1947 का वो धोखा: क्यों प्रांत नहीं बन पाया PoK?

इस सस्पेंस को समझने के लिए हमें इतिहास के पन्नों को पलटकर अगस्त 1947 के दौर में जाना होगा। विभाजन के समय जब महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ कानूनी तौर पर 'इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन' (विलय पत्र) पर हस्ताक्षर कर दिए, तो पूरा जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग बन गया। लेकिन कबाली भेष में आई पाकिस्तानी सेना ने कश्मीर के एक हिस्से पर अवैध कब्जा कर लिया। पाकिस्तान चाहता तो पंजाब, सिंध या बलूचिस्तान की तरह PoK को भी अपना एक प्रांत घोषित कर सकता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। इसके पीछे एक बहुत ही सोची-समझी और चालाक कूटनीतिक चाल थी।

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एक्सपर्ट्स और भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) सैयद अता हसनैन के मुताबिक: "पाकिस्तान को डर था कि अगर उसने PoK या गिलगित-बाल्टिस्तान को अपना वैध प्रांत घोषित कर दिया, तो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पूरे जम्मू-कश्मीर पर उसका दावा कानूनी रूप से हमेशा के लिए कमजोर हो जाएगा।" इसीलिए, दुनिया के सामने खुद को 'दूध का धुला' साबित करने और संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर विवाद को जिंदा रखने के लिए पाकिस्तान ने इस क्षेत्र को "आज़ाद जम्मू और कश्मीर" का फर्जी नाम दिया और इसे एक स्वतंत्र राज्य जैसा मुखौटा पहना दिया।

स्वायत्तता का नाटक: कागजों पर 'शासक', हकीकत में 'गुलाम'

कागज़ों और फाइलों पर तो PoK में लोकतंत्र का एक शानदार नाटक देखने को मिलता है। वहां के लोग वोट डालकर अपने विधायक चुनते हैं, वहां एक प्रधानमंत्री होता है जो सरकार चलाता है, और एक राष्ट्रपति होता है जो संवैधानिक प्रमुख होता है। वहां अपनी अदालतें हैं, अपनी नौकरशाही है और एक अलग झंडा भी है जो पाकिस्तान के राष्ट्रीय ध्वज के साथ फहराया जाता है। लेकिन इस पूरी व्यवस्था का रिमोट कंट्रोल मुज़फ़्फ़राबाद (PoK की राजधानी) में नहीं, बल्कि इस्लामाबाद और रावलपिंडी के हुक्मरानों के हाथ में होता है।

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विवाद की जड़: POK में अलग संस्थाएं क्यों मौजूद हैं?

इस दिखावे की हकीकत को आप इन तीन कड़वे तथ्यों से समझ सकते हैं:

  • इस्लामाबाद के अफसरों का राज: PoK के मंत्रालयों और नौकरशाही में जितने भी ऊंचे और प्रशासनिक पद हैं, उन पर असली शक्तियां पाकिस्तान से डेपुटेशन पर भेजे गए सिविल और मिलिट्री अफसरों के पास होती हैं। स्थानीय मंत्रियों के पास फाइल पर दस्तखत करने के अलावा कोई औकात नहीं होती।
  • 'कश्मीर काउंसिल' का चाबुक: ऐतिहासिक रूप से PoK की वित्तीय और प्रशासनिक कमान 'कश्मीर काउंसिल' के हाथ में रही है, जिसका चेयरमैन खुद पाकिस्तान का प्रधानमंत्री होता है। यानी बिना इस्लामाबाद की मर्जी के PoK में एक पत्ता भी नहीं हिल सकता।
  • अनुच्छेद 370 से सतही तुलना: कई लोग इसकी तुलना भारत के पूर्व अनुच्छेद 370 से करते हैं। लेकिन भारत का अनुच्छेद 370 एक संप्रभु देश के संविधान का हिस्सा था, जबकि PoK का 1974 का अंतरिम संविधान सिर्फ पाकिस्तान का एक प्रशासनिक टूल है, जिसका इस्तेमाल वह अपनी कठपुतली सरकार चलाने के लिए करता है।

'वैचारिक वफादारी' का टेस्ट और 4 लाख शरणार्थियों का खेल

इस तथाकथित 'आज़ाद' मुल्क का सबसे बड़ा और चौंकाने वाला विरोधाभास इसकी चुनावी प्रक्रिया और नेताओं द्वारा ली जाने वाली शपथ में छिपा है। पाकिस्तान के अन्य प्रांतों (जैसे पंजाब या केपीके) में चुनाव लड़ने के लिए किसी 'वैचारिक वफादारी' की जरूरत नहीं होती, लेकिन PoK का नियम बेहद क्रूर है। वहां किसी भी नेता, जज या संवैधानिक पद पर बैठने वाले व्यक्ति को चुनाव लड़ने से पहले यह कसम खानी पड़ती है कि वह कश्मीर के पाकिस्तान में विलय का समर्थन करता है। अगर कोई कश्मीरी यह कह दे कि वह पाकिस्तान के साथ नहीं रहना चाहता, तो उसे चुनाव लड़ने या सरकारी नौकरी पाने का कोई अधिकार नहीं है। यह शर्त हर उस आवाज को कुचल देती है जो सचमुच आज़ादी चाहती है।

दिखावे की स्वायत्तता या राजनीतिक संतुलन?

इसके अलावा, इस्लामाबाद ने PoK की विधानसभा में 'शरणार्थियों' के नाम पर कुछ सीटें आरक्षित कर रखी हैं। इन सीटों पर वोटिंग PoK के लोग नहीं करते, बल्कि पाकिस्तान के विभिन्न शहरों (जैसे कराची, लाहौर) में रहने वाले लगभग 4.34 लाख लोग करते हैं। जानकारों का कहना है कि इन सीटों का इस्तेमाल पाकिस्तान का सत्ता-तंत्र मुज़फ़्फ़राबाद में अपनी मनपसंद कठपुतली सरकार बनाने और चुनावी नतीजों को प्रभावित करने के लिए करता है।

मुखौटा उतरा, अब बगावत की बारी!

दशकों से चला आ रहा पाकिस्तान का यह प्रपंच अब पूरी तरह बेनकाब हो चुका है। महंगाई, आटे का अकाल और बिजली की भारी किल्लत से जूझ रहे PoK के आम नागरिकों को अब समझ आ चुका है कि राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और झंडे का यह तमाशा सिर्फ उनके शोषण को छिपाने का एक जरिया था। हालिया विरोध प्रदर्शनों में जब पाकिस्तानी रेंजरों की गोलियों से कम से कम 27 कश्मीरियों की मौत हुई, तो यह साफ हो गया कि पाकिस्तान के लिए PoK की जमीन तो उसकी जागीर है, लेकिन वहां के लोग सिर्फ गुलाम हैं। भले ही PoK के प्रधानमंत्री फैसल मुमताज़ राठौर प्रदर्शनकारियों से बातचीत की भीख मांग रहे हों, लेकिन कश्मीरी अवाम अब जान चुकी है कि उनके असली शोषक रावलपिंडी के सैन्य बैरकों में बैठे हैं। आज़ादी का यह मुखौटा अब पूरी तरह से तार-तार हो चुका है।