Republic Day 2026: संविधान के 5 अधिकार जिनका इस्तेमाल न करने पर अपना ही नुकसान करते हैं लोग
Republic Day 2026: गणतंत्र दिवस 2026 पर जानिए वे 5 संवैधानिक अधिकार, जिन्हें भारतीय अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। सूचना का अधिकार, गिरफ्तारी से सुरक्षा, अदालत जाने का हक और समानता जैसे अधिकार न इस्तेमाल करने से नागरिकों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है।

भारतीय क्यों नहीं इस्तेमाल करते अपने सबसे ताकतवर अधिकार?
26 जनवरी 1950 को भारत ने खुद को एक संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित करते हुए संविधान को अपनाया था। इसी संविधान ने हर नागरिक को कई मौलिक अधिकार दिए, ताकि सत्ता और जनता के बीच संतुलन बना रहे। लेकिन संवैधानिक विशेषज्ञों की मानें तो आज करोड़ों भारतीय अपने ही अधिकारों का इस्तेमाल नहीं करते और इसका खामियाजा उन्हें कानूनी, आर्थिक और सामाजिक स्तर पर भुगतना पड़ता है।
गणतंत्र दिवस 2026 पर यह समझना जरूरी है कि कौन-से संवैधानिक अधिकार सबसे ज्यादा नजरअंदाज किए जा रहे हैं और उन्हें न अपनाने से देश और नागरिक दोनों को क्या नुकसान हो रहा है।
1. सूचना का अधिकार: सवाल पूछने से डर क्यों?
संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) से निकला सूचना का अधिकार यानी आरटीआई नागरिकों को यह ताकत देता है कि वे सरकारी विभागों, सार्वजनिक संस्थानों और सरकारी धन से चलने वाली एजेंसियों से जानकारी मांग सकें। इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोग इसका उपयोग नहीं करते।
इसके पीछे कारण हैं, आरटीआई प्रक्रिया की जानकारी का अभाव, अधिकारियों से डर और यह गलतफहमी कि आरटीआई डालना बेहद मुश्किल है। जबकि सच्चाई यह है कि आरटीआई ने भ्रष्टाचार, सरकारी देरी, अवैध नियुक्तियों और जनता के पैसे के दुरुपयोग जैसे मामलों को उजागर किया है। जब नागरिक सवाल नहीं पूछते, तो पारदर्शिता कमजोर पड़ जाती है।
2. संवैधानिक उपचार का अधिकार: अदालत तक जाने से हिचक
संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अनुच्छेद 32 को संविधान की “आत्मा” कहा था। यह अधिकार नागरिकों को यह मौका देता है कि अगर उनके मौलिक अधिकारों का हनन हो, तो वे सीधे सुप्रीम कोर्ट जा सकें। इसी तरह अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट भी नागरिकों की रक्षा करते हैं।
लेकिन लंबी कानूनी प्रक्रिया का डर, खर्च और कानूनी जानकारी की कमी के चलते लोग अदालत जाने से बचते हैं। नतीजा यह होता है कि अवैध गिरफ्तारियां, गलत प्रशासनिक फैसले और अधिकारों का उल्लंघन बिना चुनौती के चलता रहता है।
3. मनमानी गिरफ्तारी के खिलाफ अधिकार: जानकारी के अभाव में चुप्पी
अनुच्छेद 22 गिरफ्तार व्यक्ति को कई अहम सुरक्षा देता है—गिरफ्तारी का कारण जानने का अधिकार, वकील से मिलने का अधिकार और 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए जाने की गारंटी।
हकीकत यह है कि गिरफ्तारी के वक्त घबराहट और जानकारी की कमी के कारण खासकर कमजोर वर्गों के लोग इन अधिकारों की मांग नहीं कर पाते। कानूनी जानकारों का कहना है कि अगर नागरिक अपने अधिकार जानते और उन्हें उसी वक्त सामने रखते, तो अवैध हिरासत और पुलिसिया ज्यादतियों पर काफी हद तक रोक लग सकती है।
4. कानून के सामने बराबरी: ताकतवर भी जवाबदेह हैं
संविधान का अनुच्छेद 14 कहता है कि कानून की नजर में हर नागरिक बराबर है, चाहे उसकी सामाजिक स्थिति, संपत्ति, जाति या राजनीतिक पहुंच कुछ भी हो। इसके बावजूद आम धारणा यह बन गई है कि रसूखदार लोग कानून से ऊपर हैं।
जबकि अदालतें बार-बार साफ कर चुकी हैं कि किसी भी तरह की मनमानी या भेदभावपूर्ण कार्रवाई अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। समस्या कानून में नहीं, बल्कि उसे चुनौती न देने की मानसिकता में है।
5. शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार: डर की वजह से खामोशी
संविधान नागरिकों को अपनी बात कहने और शांतिपूर्ण तरीके से इकट्ठा होकर विरोध करने का अधिकार देता है। इसके बावजूद पुलिस कार्रवाई के डर और कानूनी जानकारी की कमी के कारण लोग या तो चुप रहते हैं या फिर गलत तरीके से विरोध कर बैठते हैं।
इतिहास गवाह है कि शांतिपूर्ण आंदोलनों ने नीतियों को बदला है और सत्ता को जवाबदेह बनाया है। जब यह अधिकार दब जाता है, तो लोकतंत्र भी कमजोर होता है।
गणतंत्र दिवस 2026: अधिकारों का इस्तेमाल ही असली सम्मान
गणतंत्र दिवस केवल झंडा फहराने या परेड देखने का दिन नहीं है। यह उस बदलाव की याद दिलाता है, जब भारत के लोग शासित प्रजा से संवैधानिक नागरिक बने। संविधान में लिखे अधिकार तभी ताकतवर होते हैं, जब नागरिक उन्हें जानते और इस्तेमाल करते हैं।
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