सुप्रीम कोर्ट ने पीलीभीत के 40 साल पुराने मकान मालिक-किरायेदार केस में अहम फैसला सुनाते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया। कोर्ट ने माना कि समय बीतने से मकान मालिक की जरूरत कम नहीं होती। जानिए पूरा डिटेल।

Supreme Court Verdict: अदालतों में मुकदमों के दशकों तक खिंचने से अक्सर लोग हताश हो जाते हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के एक ताजा फैसले ने मकान मालिकों को बड़ी राहत दी है। उत्तर प्रदेश के पीलीभीत से जुड़े करीब 40 साल पुराने मकान मालिक-किरायेदार विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि कानूनी प्रक्रिया में लंबी देरी होने से मकान मालिक की वास्तविक और जायज जरूरत खत्म नहीं हो जाती। उत्तर प्रदेश के पीलीभीत से जुड़े इस मामले में कोर्ट ने बेदखली का आदेश बहाल करते हुए किरायेदार को 30 दिन के भीतर मकान खाली करने का निर्देश दिया है।

Supreme Court Decision: इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश रद्द, निचली अदालत का फैसला बहाल

जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मार्च 2025 वाले उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें किरायेदार को राहत दी गई थी।

  • 30 दिनों की मोहलत: शीर्ष अदालत ने पुरानी बेदखली के आदेश को बहाल करते हुए किरायेदार को निर्देश दिया कि वह 30 दिनों के भीतर मकान मालिक को संपत्ति का शांतिपूर्ण कब्जा सौंप दे।
  • बकाया किराए का भुगतान: इसके साथ ही किरायेदार को इसी समय सीमा के भीतर पूरा बकाया और वर्तमान किराया भी चुकाने का आदेश दिया गया है।

Pilibhit Property Dispute: 1984 से चल रहा था मालिकाना हक का कानूनी दांव-पेच

इस मामले की शुरुआत जुलाई 1984 में हुई थी जब मकान मालिक ने पीलीभीत की यह प्रॉपर्टी खरीदी थी।

  • कानूनी नोटिस: मकान मालिक ने 'यूपी शहरी भवन अधिनियम, 1972' के तहत नोटिस भेजकर 3 साल में दुकान खाली करने को कहा था।
  • बेटे के क्लिनिक की जरूरत: 2010 में दाखिल बेदखली याचिका में मकान मालिक ने स्पष्ट किया कि उन्हें अपने न्यूरोसर्जन बेटे के लिए मेडिकल क्लिनिक खोलना है।
  • प्रक्रिया में देरी: 2012 में सक्षम प्राधिकारी ने मकान मालिक के पक्ष में फैसला सुनाया था, लेकिन मामला सालों तक अपीलों में अटका रहा।

Genuine Need Principle: "अदालती देरी से खत्म नहीं होती जायज जरूरत"

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान बेहद तल्ख टिप्पणी की। पीठ ने कहा कि पिछले 40 सालों से जगह खाली न होने के कारण मकान मालिक का बेटा अपना क्लिनिक शुरू ही नहीं कर पाया।

  • न्याय का उपहास: कोर्ट ने माना कि दशकों तक चलने वाली तकनीकी और कानूनी बाधाओं के कारण मकान मालिक को बार-बार नए सिरे से प्रक्रिया शुरू करने को कहना "न्याय का मजाक उड़ाने" जैसा होगा।
  • सच्ची जरूरत का सम्मान: पीठ ने साफ किया कि समय बीत जाने से शुरुआती जरूरत बेमानी नहीं हो जाती, बल्कि कब्जा वापस मिलने से ही असली न्याय पूरा होगा।