लखनऊ समेत यूपी में लगे विवादित पोस्टरों ने बढ़ाई अखिलेश यादव की मुश्किलें। 'माफिया के अखिलेश' वाले नारों से गरमाई राजनीति। जानिए चुनाव से पहले कैसे सेट हो रहा है नया नैरेटिव और क्या है पूरा मामला।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में नारों और पोस्टरों का इतिहास हमेशा से बेहद दिलचस्प और निर्णायक रहा है। सूबे की राजधानी लखनऊ समेत यूपी के कई बड़े शहरों में रातों-रात लगे कुछ विवादित पोस्टरों ने राज्य के सियासी पारे को अचानक सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है। इन पोस्टरों में सीधे तौर पर समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव पर निशाना साधा गया है। लोकसभा चुनावों के बाद जहां राजनीतिक दल अगले सियासी समीकरण साधने में जुटे हैं, वहीं इन पोस्टरों ने राज्य में एक बार फिर कानून-व्यवस्था और माफिया राज के पुराने जख्मों को कुरेदकर बहस का नया रुख तय कर दिया है।
क्या लिखा है इन विवादित पोस्टरों में?
सड़कों और चौराहों पर लगे इन पोस्टरों में बहुत ही आक्रामक भाषा का इस्तेमाल किया गया है। एक पोस्टर पर बड़े अक्षरों में लिखा है, ‘आजम, अतीक और मुख्तार… यही चलाते थे सरकार’। वहीं इसी कड़ी के एक दूसरे पोस्टर पर लिखा गया है, ‘माफिया के अखिलेश, अखिलेश के माफिया’।
ये पोस्टर किसने और किस मकसद से लगवाए हैं, इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हो पाई है। किसी भी संगठन या व्यक्ति ने अभी तक इसकी जिम्मेदारी नहीं ली है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस बात को लेकर कोई शक नहीं है कि इसका सीधा फायदा उठाने और नैरेटिव सेट करने की कोशिश कौन कर रहा है।
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केशव प्रसाद मौर्य का वो चुनावी नारा और अतीत का कनेक्शन
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन पोस्टरों की पटकथा नई नहीं है। साल 2024 के लोकसभा चुनावों से ठीक पहले उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव को घेरने के लिए ठीक इसी रणनीति का इस्तेमाल किया था। उन्होंने सार्वजनिक मंचों से एक नारा दिया था, जो खूब वायरल हुआ था— ‘अखिलेश के तीन यार, आजम अतीक और मुख्तार’।
देखा जाए तो इन तीन नामों में से पूर्वांचल के दो सबसे बड़े माफिया डॉन अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी की मौत हो चुकी है, जबकि समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता आजम खान फिलहाल विभिन्न मामलों में जेल में बंद हैं। इन तीनों चेहरों को सपा सरकार के कथित 'जंगलराज' का प्रतीक बताकर बीजेपी लगातार हमलावर रही है।
आगामी चुनावों को लेकर नैरेटिव सेट करने की तैयारी
उत्तर प्रदेश में जब भी कोई चुनाव नजदीक आता है, तो कानून-व्यवस्था और अपराधियों को संरक्षण देने का मुद्दा सबसे ऊपर आ जाता है। माना जा रहा है कि इन पोस्टरों को आगामी विधानसभा चुनावों और सूबे के राजनीतिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए ही बेहद सुनियोजित तरीके से लगाया गया है।
बीजेपी ने बीते चुनावों में भी समाजवादी पार्टी पर माफिया कनेक्शन का आरोप लगाकर इसका बड़ा सियासी फायदा उठाया था। एक बार फिर उसी पुराने और परखे हुए 'एंटी-माफिया कार्ड' को खेल दिया गया है ताकि जनता के बीच समाजवादी पार्टी की छवि को लेकर पुरानी यादों को ताजा रखा जा सके।
नारों की सियासत में हमेशा से माहिर रही है बीजेपी
उत्तर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास पर नजर रखने वाले वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि साल 2017 के विधानसभा चुनावों के दौरान भी बीजेपी के कुछ बेहद धारदार नारे सोशल मीडिया और चुनावी रैलियों में गूंजे थे। उस वक्त 'समाजवादी पार्टी गुंडों, अपराधियों और माफिया की मां है' और 'जिस गाड़ी में एसपी का झंडा, उसमें बैठा गुंडा' जैसे नारों ने जमीन पर बहुत बड़ा असर डाला था।
इन नारों के जरिए बीजेपी सपा के खिलाफ एक मजबूत और आक्रामक नैरेटिव सेट करने में सफल रही थी, जिसका नतीजा 2017 के चुनावी नतीजों में साफ देखने को मिला था। अब लखनऊ की सड़कों पर दिखे ये ताजा पोस्टर इस बात का साफ संकेत हैं कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में आने वाले दिनों में माफिया और कानून-व्यवस्था का मुद्दा एक बार फिर सबसे बड़ा चुनावी हथियार बनने जा रहा है।
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