What is BNSS Section 126 and 170 Arrest Rules: BNSS की धारा 126 और 170 क्या हैं? क्या पुलिस आपको बिना वारंट गिरफ्तार कर सकती है? जानें गिरफ्तारी के नियम, पुलिस के अधिकार और आपके कानूनी हक।
BNSS Section 126 and 170 Explained: दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान Cockroach Janta Party (CJP) के नेताओं आशुतोष रांका और सौरव दास के खिलाफ कार्रवाई के बाद भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126 और 170 चर्चा में हैं। इन धाराओं के तहत पुलिस और मजिस्ट्रेट शांति भंग होने की आशंका को देखते हुए कदम उठा सकते हैं। लेकिन क्या सिर्फ प्रदर्शन करने या विरोध जताने से किसी को गिरफ्तार किया जा सकता है? पुलिस को कार्रवाई के लिए किन बातों का ध्यान रखना होता है और हिरासत में लिए गए व्यक्ति के पास क्या अधिकार होते हैं? आइए आसान भाषा में समझते हैं।
BNSS की धारा 126 क्या है?
BNSS की धारा 126 शांति बनाए रखने के लिए जमानत बांड या बंधपत्र भरवाने की प्रक्रिया से जुड़ी है। अगर कार्यकारी मजिस्ट्रेट को जानकारी मिलती है कि किसी व्यक्ति से शांति भंग होने या सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ने की आशंका है, तो वह उससे जवाब मांग सकता है कि उसे शांति बनाए रखने के लिए बांड भरने का आदेश क्यों न दिया जाए। इस बांड की अवधि अधिकतम एक साल हो सकती है। हालांकि, यह कार्रवाई अपने आप नहीं होती। मजिस्ट्रेट के पास आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त आधार होना जरूरी है। संबंधित व्यक्ति को अपनी बात रखने का मौका भी दिया जाता है।
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धारा 170 के तहत पुलिस कब कर सकती है गिरफ्तारी?
BNSS की धारा 170 पुलिस को संज्ञेय अपराध होने से रोकने के लिए कुछ परिस्थितियों में बिना वारंट गिरफ्तारी की अनुमति देती है। इसके लिए पुलिस अधिकारी को संज्ञेय अपराध करने की योजना की जानकारी होनी चाहिए और उसे यह भी लगना चाहिए कि गिरफ्तारी के बिना उस अपराध को रोकना संभव नहीं है। इस धारा के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को सामान्य तौर पर गिरफ्तारी के समय से 24 घंटे से ज्यादा हिरासत में नहीं रखा जा सकता। हालांकि, किसी दूसरे कानूनी प्रावधान के तहत आगे की हिरासत अधिकृत होने पर स्थिति अलग हो सकती है। यानी 24 घंटे की सीमा का मतलब यह नहीं है कि हर परिस्थिति में व्यक्ति को बिना किसी दूसरी कानूनी प्रक्रिया के रिहा करना ही होगा।
धारा 126 और 170 में क्या है अंतर?
दोनों धाराओं का उद्देश्य अलग है। धारा 126 के तहत कार्यकारी मजिस्ट्रेट शांति बनाए रखने के लिए बांड भरने की प्रक्रिया शुरू कर सकता है, जबकि धारा 170 के तहत पुलिस किसी संज्ञेय अपराध को रोकने के लिए जरूरी शर्तें पूरी होने पर गिरफ्तारी कर सकती है। दिल्ली में CJP नेताओं के मामले में इन दोनों धाराओं का इस्तेमाल चर्चा में आया है। अक्टूबर 2026 में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से जुड़े मामलों ने यह सवाल भी उठाया है कि शांति बनाए रखने के नाम पर पुलिस की कार्रवाई किन कानूनी सीमाओं के भीतर होनी चाहिए।
गिरफ्तारी होने पर आपके क्या अधिकार हैं?
- अगर पुलिस आपको हिरासत में लेती है, तो कुछ जरूरी कानूनी सुरक्षा आपके पास रहती हैं।
- गिरफ्तारी की वजह जानने का अधिकार: आपको गिरफ्तारी के आधार और लागू कानूनी प्रावधानों की जानकारी दी जानी चाहिए।
- वकील से सलाह लेने का अधिकार: आप अपनी पसंद के वकील से कानूनी मदद ले सकते हैं।
- परिवार को सूचना: गिरफ्तारी और हिरासत की जानकारी किसी रिश्तेदार या आपके बताए व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए कानूनी प्रावधान हैं।
- 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेशी: गिरफ्तारी के बाद यात्रा में लगने वाले जरूरी समय को छोड़कर, सामान्य नियम के तहत व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होता है। आगे की हिरासत के लिए कानून के मुताबिक अनुमति जरूरी है।
- कानूनी कार्रवाई को चुनौती देने का अधिकार: अगर आपको लगता है कि गिरफ्तारी या हिरासत नियमों के खिलाफ है, तो आप वकील के जरिए अदालत का रुख कर सकते हैं।
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क्या शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने पर भी हो सकती है गिरफ्तारी?
शांतिपूर्ण विरोध करना और कानून के मुताबिक सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना, दोनों अहम हैं। केवल किसी प्रदर्शन में शामिल होने को धारा 170 के तहत गिरफ्तारी का अपने आप पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता। इस धारा में संज्ञेय अपराध की योजना की जानकारी और उसे रोकने के लिए गिरफ्तारी की जरूरत जैसी शर्तें हैं। इसी तरह, धारा 126 के तहत भी शांति भंग होने की आशंका के संबंध में पर्याप्त आधार होना जरूरी है। किसी मामले में पुलिस की कार्रवाई सही थी या नहीं, इसका फैसला उपलब्ध तथ्यों और लागू कानून के आधार पर ही किया जा सकता है।
नोट: यहां दी गई जानकारी कानूनी प्रावधानों की सामान्य जानकारी देती है। किसी खास मामले में अपने अधिकारों और उपलब्ध उपायों को समझने के लिए वकील से सलाह लेना बेहतर है।







