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44 के सचिन पायलट से इतनी खुन्नस क्यों रखते हैं 73 के अशोक गहलोत?, जानें सबसे बड़े सवाल का जवाब

पूरे देश में चर्चा होने लगी है कि अब अशोक गहलोत कांग्रेस अध्यक्ष बनेंगे तो राजस्थान का सीएम कौन होगा। वहीं सालों से मुख्यमंत्री बनने का सपना देख रहे सचिन पायलट को इस बार भी गहलोत गुट सत्ता नहीं देना चाहता है। उन्होंने साफ तौर पर विरोध कर दिया है। इसलिए दोनों नेताओं को सोनिया गांधी ने दिल्ली बुलाया है।
 

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First Published Sep 26, 2022, 4:37 PM IST

जयपुर. राजस्थान में मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए चल रहे दंगल के बीच क्या आपने कभी सोचा है कि सचिन पायलट का नाम आते ही मुख्यमंत्री अशोक गहलोत क्यों तिलमिला जाते हैं..? क्यों मुख्यमंत्री गहलोत. सचिन पायलट से इतनी खुन्नस खाते हैं...?  सचिन, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को फूटी आंख भी क्यों नहीं सुहाते हैं...? इन सब सवालों के जवाब इस खबर को पढ़ने के बाद आपको पक्का ही मिल जाएंगे....।

कम उम्र में सचिन पायलट का बढ़ा ज्यादा सियासी कद
यह किस्सा सरकार बनने के पहले से ही शुरू हो गया था।  सचिन पायलट 25 साल की उम्र में सांसद , उसके बाद केंद्रीय मंत्री, उसके बाद राजस्थान कांग्रेस प्रदेश कमेटी के अध्यक्ष रह चुके थे । उम्र सिर्फ 40 साल थी जब वे डिप्टी सीएम राजस्थान सरकार में बने थे ।  इतने बड़े पदों पर रहने के बाद अब उनका सपना मुख्यमंत्री की कुर्सी का था।  लेकिन यह सपना अभी तक पूरा नहीं हो सका है। 

यहां से शुरू हुआ दोनों में विवाद...सार्वजनिक मंचों से दोनों एक-दूसरे की करने लगे बेइज्जती
दरअसल, जब सरकार बनी ही थी उस समय से ही सचिन पायलट के तेवर देखकर सीएम अशोक गहलोत ने उनसे दूरी बनाना शुरू कर दिया था । लेकिन उनके बैकग्राउंड को देखते हुए और आलाकमान के निर्देशों के बाद उन्हें उप मुख्यमंत्री बनाया गया । यहां तक सब सही था।  लेकिन उसके बाद जब मंत्रिमंडल का गठन और विस्तार हुआ तो सचिन पायलट के दिए गए नामों को मंत्री बनाने पर सीएम अशोक गहलोत ने सिरे से खारिज कर दिया। मामला दिल्ली तक पहुंचा आलाकमान के कहने पर अशोक गहलोत ने सिर्फ दो नेताओं को मंत्री पद दिया।  यहीं से दोनों पक्षों में विवाद शुरू हो गया।  सार्वजनिक मंचों से दोनों दिग्गज नेता बिना नाम लिए एक दूसरे की बेइज्जती करने लगे । 

दोनों में विवाद का फयाद बीजेपी ने लिया
इस फूट की सुगबुगाहट भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को लगी तो ,उन्होंने सरकार ही गिराने की तैयारी कर ली ।बताया जाता है कि  केंद्र में भाजपा के सबसे बड़े नेता के कहने पर ही राजस्थान में ऑपरेशन लोटस चलाया गया।  सचिन पायलट को पूर्व सीएम वसुंधरा राजे समेत अन्य नेताओं ने सीएम बनने तक के सपने दिखा दिए । यह सब साल 2020 में हो रहा था ।  लेकिन इसकी सूचना सीएम अशोक गहलोत तक पहुंच गई । उन्होंने अपने नेताओं से बातचीत करना शुरू कर दिया अपने नजदीकी नेताओं को बड़ी जिम्मेदारियां सौंपी। 

गहलोत ने कर दी थी विधायकों की बाड़ाबंदी
 जब पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट की दखल ज्यादा बढ़ने लगी और दिल्ली के भाजपा नेताओं का अचानक आना-जाना राजस्थान में शुरू हो गया तो सीएम गहलोत ने अपने नेताओं को लेकर जयपुर के दिल्ली रोड पर एक रिसॉर्ट में उनकी बाड़ा बंदी कर दी कई । दिनों तक नेताओं को इस रिसोर्ट से बाहर नहीं आने दिया गया । सभी के फोन जब्त कर लिए गए । यहां तक कि सरकारी मशीनरी को भी इस काम में लेना शुरू कर दिया गया । उसके बाद में तो सचिन पायलट और ना ही भाजपा का कोई नेता सरकार गिराने की कोशिश कर सका।

सचिन पायलट पर लगा पार्टी से दगाबाजी का आरोप
 गहलोत ने सरकार बचा ली और साथ ही दिल्ली तक यह संदेश पहुंचा दिया कि सचिन पायलट ने दगाबाजी की है।  क्योंकि सचिन पायलट के पिता राजेश पायलट दिल्ली मैं गांधी परिवार के बेहद करीबी रहे ,इसलिए राहुल गांधी भी सचिन पायलट के करीबी रहे । मामला जब खुलकर सामने आया तो सचिन पायलट ने पूर्व उपमुख्यमंत्री का पद त्याग दिया। 

कोरोना के कहर में भी आमने-सामने दोनों नेता
 यह सब कुछ यहीं शांत नहीं हुआ।  कुछ दिन सरकार चली फिर अचानक कोरोना वायरस आया।  वायरस ने सरकार के डेढ़ से 2 साल खींच दिए और सरकार बचाए रखी । लेकिन अब कोरोना के जाने के बाद सार्वजनिक मंचों से दोनों नेताओं ने एक दूसरे के ऊपर आरोप प्रत्यारोप लगाना फिर शुरू कर दिया । अब जब मुख्यमंत्री के दिल्ली जाने की चर्चा होने लगी तो सचिन पायलट कुर्सी के नजदीक आने की कोशिश करने लगे । उनके समर्थित नेताओं ने उन्हें कुर्सी तक पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।  लेकिन अचानक मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने ऐसा दांव खेला कि इस दांव में अब दिल्ली जयपुर सब एक हो गए हैं ।

दोनों को सोनिया गांधी ने बुलाया दिल्ली
अब सोनिया गांधी को ही कोई बड़ा फैसला लेना है । कांग्रेस के दिग्गज नेताओं का कहना है कि सचिन पायलट और अशोक गहलोत को अलग करने के लिए ही यह सारा घटनाक्रम रचा गया , लेकिन उसके बावजूद भी गहलोत इसे भी पचा गए । अब देखना होगा कि आलाकमान क्या नया फैसला लेता है और राजस्थान में राजनीति का ऊंट किस करवट बैठता है.....?

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