Mahalaxmi Vrat Katha: इस बार महालक्ष्मी व्रत 14 सितंबर, रविवार को किया जाएगा। हाथी पूजन और हाथी अष्टमी के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इस व्रत में हाथी पर बैठे देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है। 

Mahalaxmi Vrat Katha In Hindi: धर्म ग्रंथों के अनुसार, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से लेकर आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि तक महालक्ष्मी व्रत किया जाता है। 16 दिनों तक चलने वाले इस व्रत का समापन इस बार 14 सितंबर, रविवार को होगा। इस दिन हाथी पर बैठी देवी लक्ष्मी की पूजा का विधान है। इसलिए इस व्रत को हाथी अष्टमी और हाथी पूजन के नाम से भी जाना जाता है। इस व्रत का पूरा फल पाने के लिए इसकी कथा सुनना भी जरूरी है। आगे जानिए महालक्ष्मी व्रत की कथा…

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महालक्ष्मी व्रत की कथा

प्राचीन काल में मंगलार्ण नाम का एक चक्रवर्ती राजा हुआ करता था। उसकी पत्नी का नाम पद्मावती था। राजा के साथ तवल्लक नाम का एक धर्मपरायण ब्राह्मण हमेशा साथ रहता था। एक दिन जब राजा शिकार करने जंगल में गए तो उन्हें बहुत प्यास लगी। पानी की खोज करते-करते तवल्लक एक तालाब के पास पहुंच गए। यहां उन्होंने देखा कि बहुत सारी महिलाएं देवी महालक्ष्मी की पूजा कर रही हैं।

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तवल्लक ने जब इस व्रत के बारे में उन महिलाओं से पूछा तो उन्होंने बताया कि वे महालक्ष्मी नाम का एक महान व्रत कर रही हैं जो सभी इच्छाएं पूरी करने वाला है। तवल्लक ने महालक्ष्मी व्रत करने का निश्चय किया और हाथ में सूत्र (पवित्र धागा) बांध कर राजा के पास पानी लेकर पहुंचे।राजा ने जब तवल्लक के हाथ में पवित्र धागा देखा तो उसके बारे में पूछा।
तवल्लक ने पूरी बात राजा को बता दी। राजा ने भी महालक्ष्मी व्रत करने के निश्चय किया और हाथ में पवित्र धागा बांध लिया। रानी पद्मावती ने जब राजा के हाथ में व्रत का ये धागा देखा तो उसके बारे में पूछा। राजा ने रानी को पूरी बात बता दी। अज्ञानता के कारण रानी ने राजा के हाथ से वह सूत्र तोड़कर अग्नि में डाल दिया। राजा ने क्रोधित होकर रानी का त्याग कर उसे वन में भेज दिया।
महालक्ष्मी का अपमान करने के कारण रानी वन में इधर-उधर भटकने लगी। तब एक दिन रानी को ऋषि वसिष्ठ के दर्शन हुए। रानी ने उन्हें पूरी बात बता दी। तब ऋषि वसिष्ठ के कहने पर रानी पद्मावती ने महालक्ष्मी व्रत किया, जिससे उनका मन निर्मल एवं शान्त हो गया। एक दिन राजा फिर उस वन में शिकार खेलने आए और ऋषि वसिष्ठ के आश्रम तक पहुंचकर रानी पद्मावती को देखा।
यहां ऋषि वसिष्ठ ने राजा को बताया कि महालक्ष्मी व्रत करने से रानी का मन शांत और पवित्र हो गया है। ऋषि वसिष्ठ के कहने पर राजा मंगलार्ण रानी पद्मावती को पुन: अपने साथ महल ले आए और सुखपूर्वक रहने लगे। इस तरह जो भक्त महालक्ष्मी व्रत करता है, उसके जीवन में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है। देवी लक्ष्मी भी अपने भक्तों पर सदैव कृपा बनाए रखती है।