छत्तीसगढ़ के मंत्री टंक राम वर्मा ने वीआईपी कल्चर खत्म करने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए अपने दौरों में पायलट और फॉलो वाहनों का उपयोग बंद कर दिया है। उन्होंने इसे ऊर्जा बचत, ईंधन संरक्षण और सरकारी खर्च कम करने की पहल बताया।

​रायपुर। छत्तीसगढ़ सरकार में उच्च शिक्षा, राजस्व एवं आपदा प्रबंधन मंत्री टंक राम वर्मा ने वीआईपी संस्कृति और प्रशासनिक दिखावे से दूरी बनाते हुए एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। प्रधानमंत्री Narendra Modi के ऊर्जा संरक्षण और संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग के संदेश से प्रेरित होकर मंत्री वर्मा ने अपने सरकारी दौरों में इस्तेमाल होने वाले ‘पायलट’ और ‘फॉलो’ वाहनों को तत्काल प्रभाव से बंद करने का फैसला किया है।

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अब मंत्री वर्मा अपने स्टाफ के साथ सीमित संख्या में वाहनों के काफिले के जरिए ही यात्रा करेंगे। उनके इस फैसले को राज्य में सादगी, जवाबदेही और संसाधनों के बेहतर उपयोग की दिशा में एक सकारात्मक पहल माना जा रहा है।

मंत्री टंक राम वर्मा बोले- जनप्रतिनिधियों को खुद पेश करनी चाहिए मिसाल

अपने फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए मंत्री टंक राम वर्मा ने कहा कि देश वर्तमान समय में कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे दौर में देशहित से जुड़े कार्यों की शुरुआत जनप्रतिनिधियों को स्वयं से करनी चाहिए ताकि समाज के सामने एक बेहतर उदाहरण प्रस्तुत किया जा सके।

उन्होंने कहा कि पायलट और फॉलो वाहनों का उपयोग बंद करने से सरकारी खर्चों में कमी आएगी। साथ ही लोगों के बीच ईंधन संरक्षण और ऊर्जा बचत को लेकर जागरूकता भी बढ़ेगी। मंत्री वर्मा का मानना है कि छोटी-छोटी बचत भी देशहित में बड़ी भूमिका निभा सकती है।

ईंधन संरक्षण और सरकारी खर्च में कमी पर जोर

मंत्री वर्मा के इस निर्णय को प्रशासनिक खर्च कम करने और सरकारी संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है। आमतौर पर वीआईपी मूवमेंट के दौरान बड़ी संख्या में सरकारी वाहनों का उपयोग किया जाता है, जिससे ईंधन और अन्य संसाधनों पर अतिरिक्त खर्च होता है। ऐसे में उनका यह फैसला न केवल खर्च कम करने में मदद करेगा बल्कि सरकारी कार्यप्रणाली में सादगी का संदेश भी देगा।

जनता और सामाजिक संगठनों ने फैसले का किया स्वागत

मंत्री टंक राम वर्मा के इस फैसले की विभिन्न सामाजिक संगठनों, प्रबुद्ध नागरिकों और आम लोगों ने सराहना की है। लोगों का कहना है कि नेताओं द्वारा फिजूलखर्ची रोकने और सरकारी संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग की दिशा में उठाया गया यह कदम प्रेरणादायी है। कई लोगों ने इसे जमीन से जुड़े जनप्रतिनिधि की पहचान बताते हुए कहा कि इस तरह की पहल अन्य नेताओं के लिए भी उदाहरण बन सकती है।