दिल्ली सरकार ने Project Manobal लॉन्च किया। सरकारी स्कूलों में अब बच्चों को मेंटल हेल्थ, इमोशनल इंटेलिजेंस और लाइफ स्किल्स की व्यवस्थित शिक्षा दी जाएगी।

दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था में आज एक नई शुरुआत हुई। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने शालीमार बाग स्थित गवर्नमेंट गर्ल्स सीनियर सेकेंडरी स्कूल में 'प्रोजेक्ट मनोबल' का शुभारंभ किया। इसे सरकारी स्कूलों के लिए भारत का पहला मेंटल हेल्थ एजुकेशन प्रोग्राम बताया जा रहा है। अब तक स्कूलों में पढ़ाई का फोकस मुख्य रूप से अकादमिक विषयों तक सीमित था। लेकिन इस पहल का उद्देश्य बच्चों को उनकी भावनाओं को समझने, मानसिक रूप से मजबूत बनने और जीवन की चुनौतियों का बेहतर तरीके से सामना करने के लिए तैयार करना है।

क्या है Project Manobal? जानिए इस नई पहल का उद्देश्य

प्रोजेक्ट मनोबल लाडली फाउंडेशन की पहल है, जिसे द माइंड सिंक का शैक्षणिक और तकनीकी सहयोग मिला है। इस कार्यक्रम के जरिए सरकारी स्कूलों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों तक मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी व्यवस्थित शिक्षा पहुंचाई जाएगी। मकसद सिर्फ बच्चों की पढ़ाई बेहतर करना नहीं, बल्कि उनके मानसिक और भावनात्मक विकास को भी उतनी ही अहमियत देना है। यह पहली बार है जब किसी सरकारी स्कूल कार्यक्रम में मानसिक स्वास्थ्य को पाठ्यक्रम का नियमित हिस्सा बनाने की कोशिश की जा रही है।

हर सप्ताह होंगे साइकोलॉजिस्ट के सेशन, बच्चों की होगी नियमित मॉनिटरिंग

इस कार्यक्रम के तहत प्रशिक्षित साइकोलॉजिस्ट हर सप्ताह स्कूलों में बच्चों के साथ इंटरैक्टिव सेशन लेंगे। सिर्फ सेशन आयोजित करना ही इस योजना का हिस्सा नहीं है। बच्चों के सामाजिक और भावनात्मक विकास को लगातार ट्रैक भी किया जाएगा। ठीक उसी तरह जैसे स्कूल छात्रों के परीक्षा परिणाम और अकादमिक प्रदर्शन का रिकॉर्ड रखते हैं। इससे शिक्षकों और स्कूल प्रशासन को यह समझने में मदद मिलेगी कि किसी छात्र की भावनात्मक स्थिति कैसी है और उसे किस तरह की सहायता की जरूरत है।

हर छात्र को मिलेगी Project Manobal Kit

योजना के तहत प्रत्येक छात्र को 'प्रोजेक्ट मनोबल किट' उपलब्ध कराई जाएगी। इस किट में कक्षा के अनुसार तैयार की गई मेंटल हेल्थ एजुकेशन पुस्तकें, एक्टिविटी वर्कशीट, विभिन्न असेसमेंट मॉड्यूल, कोर्स पूरा होने पर प्रमाण पत्र और Maped की स्टेशनरी किट शामिल होगी। इन सभी संसाधनों का उद्देश्य बच्चों को सिर्फ पढ़ाना नहीं, बल्कि उन्हें गतिविधियों के माध्यम से सीखने का अवसर देना है।

शिक्षकों को भी मिलेगा विशेष प्रशिक्षण, क्लासरूम बनेगा भावनात्मक रूप से सुरक्षित

प्रोजेक्ट मनोबल केवल छात्रों तक सीमित नहीं है। इसमें शिक्षकों के लिए भी विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम रखे गए हैं। वर्कशॉप के माध्यम से शिक्षकों को यह समझाया जाएगा कि किसी बच्चे के व्यवहार में होने वाले बदलावों को कैसे पहचाना जाए और समय रहते उसकी मदद कैसे की जाए। इसके साथ ही उन्हें ऐसा क्लासरूम वातावरण तैयार करने का प्रशिक्षण भी मिलेगा, जहां बच्चे बिना डर और झिझक के अपनी बात कह सकें।

MANN Workshop: किशोरों को सिखाए जाएंगे जीवनभर काम आने वाले कौशल

सीनियर कक्षाओं के विद्यार्थियों के लिए 'MANN Workshop' इस कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इन वर्कशॉप्स में छात्रों को केवल लेक्चर नहीं दिए जाएंगे, बल्कि वास्तविक परिस्थितियों पर आधारित गतिविधियों और लाइव एक्सरसाइज के जरिए उन्हें खुद को समझने का अवसर मिलेगा। इस प्रक्रिया से बच्चों में इमोशनल इंटेलिजेंस, मानसिक लचीलापन, आत्मविश्वास और अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने जैसी महत्वपूर्ण क्षमताओं का विकास होगा। यही कौशल आगे चलकर उनके व्यक्तिगत, सामाजिक और पेशेवर जीवन में भी मददगार साबित होंगे।

द माइंड सिंक के संस्थापक मानस दुबे ने बताया कार्यक्रम का विजन

द माइंड सिंक के संस्थापक मानस दुबे का कहना है कि वे ऐसे सरकारी स्कूलों की कल्पना करते हैं जहां बच्चे सिर्फ गणित, विज्ञान या इतिहास ही नहीं पढ़ें, बल्कि अपनी भावनाओं को समझना और उन्हें सही तरीके से संभालना भी सीखें। उनके अनुसार, प्रोजेक्ट मनोबल एक व्यवस्थित मेंटल हेल्थ एजुकेशन प्रोग्राम है, जिसे प्रशिक्षित साइकोलॉजिस्ट इंटरैक्टिव गतिविधियों, व्यक्तिगत मार्गदर्शन और नियमित सपोर्ट के जरिए बच्चों तक पहुंचाएंगे। उन्होंने कहा कि इस पहल का सबसे बड़ा उद्देश्य हर बच्चे में इमोशनल इंटेलिजेंस विकसित करना है। मानस दुबे के मुताबिक, लाडली फाउंडेशन और द माइंड सिंक की साझेदारी उन लाखों बच्चों तक भावनात्मक शिक्षा पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, जिन्हें अब तक मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सहायता बहुत कम मिल पाई है।

Manobal Lab: स्कूलों में शुरू होगी भारत की पहली इमोशनल इंटेलिजेंस लैब

प्रोजेक्ट मनोबल की सबसे खास पहल 'मनोबल लैब' है। इसे स्कूलों के लिए भारत की पहली इमोशनल इंटेलिजेंस लैब के रूप में विकसित किया गया है। यह कोई पारंपरिक क्लासरूम नहीं होगा। यहां बच्चे सिर्फ किताबों से नहीं सीखेंगे, बल्कि अपनी भावनाओं को महसूस करेंगे, समझेंगे और उन्हें संभालने का अभ्यास भी करेंगे। इस लैब में रेगुलेशन जोन, माइंडफुलनेस एक्सपीरियंस, न्यूरोसाइंस आधारित गतिविधियां और रिफ्लेक्शन कॉर्नर जैसी सुविधाएं होंगी। इसका उद्देश्य भावनात्मक शिक्षा को केवल सिद्धांत तक सीमित न रखकर व्यवहार में उतारना है।

लाडली फाउंडेशन: शिक्षा और सामाजिक विकास के क्षेत्र में लगातार सक्रिय

प्रोजेक्ट मनोबल की शुरुआत करने वाली लाडली फाउंडेशन पिछले कई वर्षों से शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, डिजिटल समावेशन, स्वास्थ्य और सामुदायिक विकास जैसे क्षेत्रों में लगातार काम कर रही है। फाउंडेशन के संस्थापक देवेंद्र कुमार के नेतृत्व में संगठन ने देशभर में कई सामाजिक पहल शुरू की हैं। महिलाओं और बालिकाओं के सशक्तिकरण के लिए किए गए उनके कार्यों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया है। उन्हें पद्मश्री के लिए भी नामांकित किया जा चुका है। इतना ही नहीं, संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी उनके योगदान को मान्यता देते हुए उन्हें आमंत्रित किया था।

दिल्ली के सरकारी स्कूलों में लाडली फाउंडेशन ने अब तक 250 से अधिक कंप्यूटर लैब, एआई इंटीग्रेटेड स्मार्ट टॉयलेट, स्मार्ट क्लासरूम और STEM लैब स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई है। इसके अलावा संस्था जरूरतमंद विद्यार्थियों के बीच डिजिटल लिटरेसी बढ़ाने और कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (CUET) की तैयारी में भी सहयोग कर रही है। अब इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए प्रोजेक्ट मनोबल के जरिए बच्चों को इमोशनल इंटेलिजेंस और लाइफ स्किल्स से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।

The Mind Sync: भारत का पहला मेंटल हेल्थ एजुकेशन करिकुलम

प्रोजेक्ट मनोबल को मजबूती देने का काम द माइंड सिंक कर रहा है। इसे स्कूलों के लिए भारत का पहला मेंटल हेल्थ एजुकेशन करिकुलम माना जाता है। इसकी स्थापना मानस दुबे और हार्वर्ड से प्रशिक्षित मनोचिकित्सक डॉ. शिवम दुबे ने की है। दोनों का मानना है कि मानसिक स्वास्थ्य को केवल संकट आने के बाद नहीं, बल्कि बचपन से ही शिक्षा का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। इसी सोच के साथ उन्होंने ऐसा करिकुलम तैयार किया जिसमें इमोशनल इंटेलिजेंस और सोशल-इमोशनल लर्निंग (SEL) को रोजमर्रा की पढ़ाई से जोड़ा गया। आज यह मॉडल देश के कई स्कूलों में लागू किया जा चुका है और अब तक एक लाख से अधिक छात्रों तथा 1,500 से ज्यादा शिक्षकों पर इसका सकारात्मक प्रभाव देखने को मिला है।

बच्चों की मानसिक सेहत को लेकर बढ़ती चिंता के बीच बड़ी पहल

आज के समय में छात्रों के बीच मानसिक तनाव, परीक्षा का दबाव, अकेलापन और भावनात्मक चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे माहौल में प्रोजेक्ट मनोबल केवल एक नया कार्यक्रम नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में एक जरूरी बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। इस पहल का उद्देश्य बच्चों के मानसिक रूप से टूटने का इंतजार करना नहीं है, बल्कि उन्हें शुरुआत से ही ऐसे कौशल देना है, जिससे वे जीवन की कठिन परिस्थितियों का आत्मविश्वास के साथ सामना कर सकें।

'विकसित भारत 2047' के विजन से जुड़ता है प्रोजेक्ट मनोबल

यह कार्यक्रम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'विकसित भारत 2047' के विजन के अनुरूप भी माना जा रहा है। इस पहल के जरिए बच्चों में कम उम्र से ही आत्मविश्वास, सहानुभूति, निर्णय लेने की क्षमता, भावनात्मक संतुलन और नेतृत्व कौशल विकसित करने पर जोर दिया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य की सफलता केवल अच्छे अंकों से तय नहीं होगी, बल्कि यह भी मायने रखेगा कि कोई छात्र मानसिक रूप से कितना मजबूत और भावनात्मक रूप से कितना संतुलित है।

अब सिर्फ परीक्षा नहीं, जिंदगी के लिए भी होंगे तैयार छात्र

अगर पिछली सदी को साक्षरता की सदी कहा गया, तो आने वाले समय में इमोशनल इंटेलिजेंस भी शिक्षा का उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है। प्रोजेक्ट मनोबल इसी दिशा में उठाया गया एक बड़ा कदम है। इसका मकसद ऐसे छात्रों को तैयार करना है जो सिर्फ पढ़ाई में अच्छे न हों, बल्कि जीवन की चुनौतियों का सामना करने में भी सक्षम हों। यह कार्यक्रम बच्चों में आत्मविश्वास, संवेदनशीलता, मानसिक मजबूती और नेतृत्व क्षमता विकसित करने पर जोर देता है, ताकि वे भविष्य की हर चुनौती के लिए तैयार रह सकें।