मध्यप्रदेश ने एक साथ 12 उद्यानिकी फसलों को GI Tag दिलाकर नया इतिहास बनाया है। इससे किसानों की आय बढ़ने और प्रदेश की विशेष फसलों को वैश्विक पहचान मिलने का रास्ता मजबूत होगा।

भोपाल। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मध्यप्रदेश ने कृषि और उद्यानिकी क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल की है। प्रदेश को एक साथ 12 उद्यानिकी फसलों के लिए GI (Geographical Indication) Tag प्राप्त हुआ है। देश में पहली बार किसी राज्य को एक साथ इतनी अधिक फसलों के लिए GI Tag मिला है। इससे प्रदेश के किसानों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में नई पहचान मिलने के साथ बेहतर कीमत मिलने की संभावना भी बढ़ गई है।

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इन फसलों में गुना का धनिया, नरसिंहपुर के बरमान घाट का बैंगन, बैतूल का गजरिया आम, खरगोन की लाल मिर्च, मांडू की खुरासानी इमली, जबलपुर की मटर, सिवनी का सीताफल, मालवी आलू, मालवी गराडू, नरसिंहपुर का गुड़, जबलपुर का सिंघाड़ा, नूरजहां आम, बुरहानपुर का केला, इंदौरी जीरावन, रतलाम सैलाना बालम ककड़ी और छतरपुर का पान शामिल हैं।

GI Tag के लिए भेजे गए नए प्रस्ताव, और बढ़ेगी प्रदेश की पहचान

प्रदेश सरकार ने कई अन्य पारंपरिक उत्पादों को भी GI Tag दिलाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इनमें उज्जैन की इमली, आलीराजपुर का अचारी आम, मालवा का सफेद प्याज, झाबुआ का दाल पानिया, मंदसौर का देशी जीरा, बुरहानपुर की जलेबी और अशोकनगर की खिरनी शामिल हैं।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने किसानों से उद्यानिकी फसलों की खेती बढ़ाने की अपील की है ताकि उनकी आय में बढ़ोतरी हो सके। वर्तमान में प्रदेश में लगभग 28 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में उद्यानिकी फसलों की खेती हो रही है। सरकार ने वर्ष 2030 तक इसे बढ़ाकर 30 लाख हेक्टेयर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है।

कुम्भराज धनिया की खुशबू और स्वाद ने दिलाई अलग पहचान

गुना जिले का कुम्भराज धनिया पिछले लगभग 60 वर्षों से किसानों की प्रमुख फसल रहा है। यह फसल 85 से 90 दिनों में तैयार हो जाती है और प्रति हेक्टेयर लगभग 12 से 15 क्विंटल उत्पादन देती है। इसमें 0.40 से 0.50 प्रतिशत तक वाष्पशील तेल पाया जाता है, जिससे इसकी खुशबू और स्वाद अन्य धनिया किस्मों की तुलना में अधिक बेहतर होता है। इसका चमकीला हरा रंग और बेहतरीन गुणवत्ता इसे खास बनाते हैं। गुना से धनिया का निर्यात विदेशों तक किया जाता है। अकेले गुना जिले में हर वर्ष करीब 32 हजार मीट्रिक टन धनिया का उत्पादन होता है, जो देश के कुल उत्पादन का लगभग 20 से 25 प्रतिशत है।

बरमान घाट का बैंगन क्यों है सबसे अलग?

नरसिंहपुर के बरमान क्षेत्र में नर्मदा नदी के किनारे मौजूद बालुई मिट्टी में उगने वाला बैंगन अपने खास स्वाद के लिए प्रसिद्ध है। इसकी मांग स्थानीय मंडियों के साथ दूसरे राज्यों तक रहती है। विशेषज्ञों का मानना है कि नर्मदा किनारे का कम तापमान और मिट्टी की विशेषता इसके स्वाद को अलग बनाती है।

बैतूल का गजरिया आम बना विशेष पहचान

बैतूल के गजरिया आम का इतिहास कई सौ वर्षों पुराना माना जाता है। इस क्षेत्र में मौजूद प्राचीन किले इसकी ऐतिहासिक विरासत को दर्शाते हैं। यह आम स्वाद के साथ-साथ प्रसंस्करण के लिए भी काफी उपयोगी माना जाता है। इससे अचार, अमचूर, जूस, जैम, शरबत और अन्य कई उत्पाद तैयार किए जाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि वैज्ञानिक तरीके से खेती होने पर इसकी उत्पादकता और बढ़ सकती है।

खरगोन की लाल मिर्च की विदेशों तक मांग

खरगोन जिले में लाल मिर्च की खेती लगातार बढ़ रही है। जिले के बेदिया स्थित मिर्च मंडी देश की प्रमुख मंडियों में गिनी जाती है। निमाड़ और मालवा क्षेत्र की लाल मिर्च चीन, पाकिस्तान, मलेशिया और सऊदी अरब जैसे देशों तक निर्यात की जाती है। बेहतर गुणवत्ता के कारण इसकी बाजार में अलग पहचान बनी हुई है।

मांडू की खुरासानी इमली का अनोखा इतिहास

मांडू की प्रसिद्ध खुरासानी इमली वास्तव में बाओबाब वृक्ष का फल है। माना जाता है कि इसे 14वीं शताब्दी में महमूद खिलजी के शासनकाल में अफ्रीका से लाया गया था। इस पेड़ की सबसे बड़ी विशेषता इसका उल्टा दिखाई देने वाला स्वरूप है। इसकी शाखाएं और तना इसे सामान्य पेड़ों से अलग पहचान देते हैं। इसे मांडवी इमली के नाम से भी जाना जाता है।

सिवनी का जंबो सीताफल बना किसानों की पहचान

सिवनी जिले में लगभग 656 हेक्टेयर क्षेत्र में सीताफल की खेती होती है और सालाना 6500 मीट्रिक टन से अधिक उत्पादन होता है। यहां मिलने वाले जंबो सीताफल का वजन 600 से 700 ग्राम तक होता है। अपने बड़े आकार और मीठे स्वाद की वजह से इसकी प्रदेश और देशभर में अच्छी मांग रहती है।

मालवी आलू की गुणवत्ता अंतरराष्ट्रीय स्तर की

मालवा क्षेत्र का आलू आकार, गुणवत्ता, रंग और रोग प्रतिरोधक क्षमता के कारण अलग पहचान रखता है। मध्यप्रदेश देश का पांचवां सबसे बड़ा आलू उत्पादक राज्य है। राज्य के कुल आलू उत्पादन में मालवा क्षेत्र का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है।

जबलपुर की हरी मटर बनी प्रमुख रबी फसल

जबलपुर की हरी मटर यहां की सबसे लोकप्रिय रबी फसलों में शामिल है। यह प्रोटीन, फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होती है। इसकी फसल 40 से 60 दिनों में तैयार हो जाती है। वर्ष 2018-19 में जिले में लगभग 31,360 हेक्टेयर क्षेत्र में इसकी खेती की गई थी और करीब 52,500 टन उत्पादन दर्ज किया गया था।

मालवा का गराडू क्यों है खास?

गराडू मालवा क्षेत्र की पारंपरिक और महत्वपूर्ण फसल है। यह रतालू की एक विशेष प्रजाति है, जिसे बैंगनी रतालू भी कहा जाता है। मालवा क्षेत्र में इसकी नियमित खेती होती है और स्थानीय भोजन में इसका विशेष स्थान है।

नरसिंहपुर का गुड़ देशभर में प्रसिद्ध

मध्यप्रदेश में गुड़ उत्पादन के लिए नरसिंहपुर जिला सबसे प्रमुख माना जाता है। जिले की काली कपास मिट्टी और अधिक जल धारण क्षमता गन्ने की खेती के लिए अनुकूल है। प्रदेश के कुल गन्ना क्षेत्र का लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा नरसिंहपुर में है। यही कारण है कि इसे मध्यप्रदेश का 'चीनी का कटोरा' भी कहा जाता है। यहां के किसान अब गुड़ उत्पादन को बड़े स्तर पर बढ़ा रहे हैं।

जबलपुर का सिंघाड़ा भी बना खास पहचान

सिंघाड़े की खेती में लगभग सात महीने का समय लगता है। पहले छोटे जलाशयों में पौधे तैयार किए जाते हैं और बाद में बड़े तालाबों में रोपाई की जाती है। जबलपुर, सतना और आसपास के क्षेत्रों के करीब 4500 किसान इसकी खेती करते हैं। यहां का ताजा सिंघाड़ा उच्च जल मात्रा, स्टार्च और पोषक तत्वों के कारण काफी पसंद किया जाता है।

नूरजहां आम की विशालकाय पहचान

कट्टीवाड़ा क्षेत्र का नूरजहां आम अपने असाधारण आकार के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। इसका वजन सामान्यतः 3 से 3.5 किलोग्राम तक होता है और इसकी लंबाई लगभग एक फुट तक पहुंच सकती है। माना जाता है कि यह किस्म कई सौ वर्ष पहले अफगानिस्तान से गुजरात होते हुए मध्यप्रदेश पहुंची थी। आज यह प्रदेश की सबसे अनोखी आम किस्मों में गिनी जाती है।