बेंगलुरु की आईटी नौकरी छोड़कर चेतन शेट्टी ने अपनी पुश्तैनी ज़मीन पर आधुनिक खेती शुरू की। सुपारी के साथ-साथ रैंबुतान और मैंगोस्टीन जैसे विदेशी फल उगाकर और स्मार्ट मार्केटिंग से वे सालाना लाखों रुपये कमा रहे हैं।

शहर की भागदौड़ और कॉर्पोरेट की चिक-चिक से दूर, प्रकृति के बीच सुकून की ज़िंदगी जीने का सपना कई लोग देखते हैं। लेकिन अच्छी-खासी सैलरी वाली नौकरी छोड़कर पूरी तरह से खेती में हाथ आज़माने की हिम्मत कुछ ही लोग कर पाते हैं। चेतन शेट्टी ऐसे ही दिलेर लोगों में से एक हैं। बेंगलुरु की एक आईटी कंपनी में करीब आठ साल तक सफल नौकरी करने के बाद, चेतन ने 2017 में अपनी कॉर्पोरेट ज़िंदगी को अलविदा कह दिया। वह दक्षिण कन्नड़ ज़िले के सुलिया तालुक में अपने गाँव बेल्लारे लौट आए और अपनी 11 एकड़ की पुश्तैनी ज़मीन को नए तरीके से विकसित करने का फैसला किया।

जब चेतन ने अपनी सुरक्षित नौकरी छोड़कर अनिश्चितताओं से भरे खेती के मैदान में कदम रखा, तो दोस्तों, रिश्तेदारों और यहाँ तक कि माता-पिता ने भी इसका खूब विरोध किया। उन्हें 'वापस गाँव आकर ज़िंदगी बर्बाद कर रहे हो? तुमसे बेटी की शादी कौन करेगा?' जैसी बातें सुननी पड़ीं। सबने यही सोचा था कि वह एक साल में ही हार मानकर वापस शहर भाग जाएँगे। लेकिन, चेतन का इरादा पक्का था।

कॉर्पोरेट जॉब के दौरान ही, उन्होंने अपने शौक के लिए बेंगलुरु में किराए के घर की रसोई में मशरूम उगाकर स्थानीय होटलों को बेचा था। इसके अलावा, गाँव की ज़मीन पर प्रयोग के तौर पर हल्दी उगाकर 3,000 किलो की पैदावार भी हासिल की थी। इन छोटे-छोटे सफल प्रयोगों ने उन्हें खेती में पूरी तरह उतरने का आत्मविश्वास दिया।

आधुनिक खेती और फसलों में वैरायटी

चेतन ने सिर्फ पारंपरिक खेती तक सीमित न रहकर, अपने खेत को आधुनिक बनाने और फसलों में वैरायटी लाने के लिए करीब 18 लाख रुपये का निवेश किया। सुपारी के बाग से सालाना लगभग 12 लाख रुपये की स्थिर आमदनी तो हो ही रही थी, लेकिन कमाई को और बढ़ाने के लिए उन्होंने प्रीमियम और विदेशी फल उगाना शुरू किया।

आज, 'अवे मंजण्णा शेट्टी फैमिली फार्म्स' में 2,500 से ज़्यादा सुपारी के पेड़, 650 रैंबुतान के पेड़, 300 नारियल के पेड़, 100 से ज़्यादा मैंगोस्टीन के पेड़ और 800 काली मिर्च की बेलें हैं। इनके साथ-साथ जायफल, एवोकैडो (बटर फ्रूट), हल्दी और सब्ज़ियाँ भी उगाई जाती हैं।

महंगे विदेशी फलों से मोटी कमाई

चेतन के इस नए कृषि मॉडल में अलग-अलग तरह के विदेशी फल कमाई का मुख्य ज़रिया बन गए। बाज़ार में रैंबुतान 200 से 400 रुपये प्रति किलो तक बिकता है, जबकि मैंगोस्टीन की कीमत पीक सीज़न में 750 रुपये प्रति किलो तक पहुँच जाती है। चेतन गर्व से बताते हैं, "रैंबुतान की बिक्री से हुई कमाई से ही हमने गाँव में अपना नया घर बनाया है।" रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनके खेत का सालाना कुल टर्नओवर 25 लाख से 60 लाख रुपये के बीच रहता है, और सालाना शुद्ध मुनाफा करीब 15 लाख रुपये तक पहुँच जाता है।

मौसम की मार और उसका समाधान

चेतन का खेती का यह सफर आसान नहीं था। हाल के वर्षों में मौसम में आए बदलाव के कारण रैंबुतान की पैदावार में भारी गिरावट आई। 2022 में जहाँ 5,500 किलो रैंबुतान का उत्पादन हुआ था, वहीं 2024 तक यह घटकर सिर्फ 400 किलो रह गया। इसके बावजूद, चेतन ने हिम्मत नहीं हारी और अपनी खेती की योजनाओं को फिर से व्यवस्थित किया और मौसम के हिसाब से फसल प्रबंधन के तरीकों में बदलाव किया।

नेटवर्क और मार्केट की सुविधा

चेतन ने सिर्फ खेती पर ही नहीं, बल्कि एक मज़बूत लॉजिस्टिक्स और डिस्ट्रिब्यूशन नेटवर्क बनाने पर भी ध्यान दिया। वह अपने खेत के उत्पादों को मंगलुरु से ट्रेन, बस और सड़क परिवहन के ज़रिए बेंगलुरु, मुंबई, पुणे, दिल्ली, अमृतसर और हैदराबाद जैसे बड़े शहरों के थोक और खुदरा व्यापारियों तक पहुँचाते हैं।

इसके अलावा, उन्होंने स्थानीय किसानों को भी बाज़ार तक पहुँच दिलाने के लिए Zepto और Farmizen जैसे एग्री-टेक स्टार्टअप्स के साथ पार्टनरशिप की है। मज़दूरों की कमी के कारण, फसल की कटाई, छँटाई और पैकिंग का काम चेतन और उनका परिवार खुद ही संभालता है।

35 साल के यह सफल किसान-उद्यमी कहते हैं, "यह सिर्फ पैसे की बात नहीं है, बल्कि अपने काम से मिलने वाले सुकून की बात है। 2017 में लिए गए उस एक फैसले की वजह से आज मैं बहुत खुश हूँ।"

सही योजना, टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल और स्मार्ट मार्केटिंग की रणनीति अपनाकर खेती को एक लाभदायक और टिकाऊ पेशा बनाया जा सकता है, चेतन शेट्टी का यह सफर इसका जीता-जागता उदाहरण है।