विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पाकिस्तान में आतंकवाद को 'खुला कारोबार' बताया, जिसका समर्थन सरकार और सेना करती है। उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर की सफलता पर भी ज़ोर दिया और कहा कि भारत ने आतंकियों को कड़ा संदेश दिया है।

Pakistan Terrorism Business: भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने कहा है कि पाकिस्तान में आतंकवाद बेहद खुला कारोबार है। सरकार और सेना इसे समर्थन और पैसे देती है। वे आतंकी संगठनों को तैयार करते और इनका इस्तेमाल करते हैं।

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जर्मनी में एक इंटरव्यू में जयशंकर ने कहा कि जो भी अंधा नहीं है वह देख सकता है कि पाकिस्तान के शहरों में खुलेआम आतंकी संगठन काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा, "यह कोई गुप्त बात नहीं है। UN Security Council की आतंकियों वाली लिस्ट पाकिस्तानी नाम और जगहों से भरी हुई है। ये वही स्थान हैं जिन्हें हमने टारगेट किया है। इसलिए कृपया यह नहीं सोचें कि कोई चीज सिर्फ सीन से पीछे हो रही है।"

आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा परमाणु हथियार मुद्दे पर सारा ध्यान

जयशंकर ने कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु हथियार मुद्दे पर सारा ध्यान केवल आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है। हाल ही में भारत-पाकिस्तान सैन्य संघर्ष के दौरान किसी भी बिंदु पर परमाणु स्तर तक नहीं पहुंचा गया।

उन्होंने कहा, "ऐसा कहा जाता है कि दुनिया के हमारे हिस्से में जो कुछ भी होता है, वह सीधे परमाणु समस्या की ओर ले जाता है। यह मुझे बहुत परेशान करता है। यह आतंकवाद जैसी भयानक गतिविधियों को बढ़ावा देता है। अगर कुछ है तो दुनिया के आपके हिस्से में परमाणु मुद्दे के साथ बहुत कुछ हो रहा है।"

ऑपरेशन सिंदूर से भारत ने आतंकियों को दिया साफ संदेश

विदेश मंत्री ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर से भारत ने आतंकियों को साफ संदेश दे दिया है कि पहलगाम जैसा हमला हुआ तो इसकी कीमत चुकानी होगी। भारत और पाकिस्तान के बीच पिछले दिनों हुए सैन्य संघर्ष पर उन्होंन कहा, "पाकिस्तानी सेना ने गोलीबारी शुरू की। हमने आत्मरक्षा में फायरिंग की। जब पाकिस्तानी समझ गए कि वे हानिकारक रास्ते पर चल पड़े हैं तो हम फायरिंग रोक सके।"

युद्ध विराम तक पहुंचने में अमेरिका की भूमिका के बारे में पूछे जाने पर जयशंकर ने कहा कि इसके लिए केवल भारतीय सेना को ही धन्यवाद दिया जा सकता है। उन्होंने कहा, "मैं भारतीय सेना को धन्यवाद देता हूं क्योंकि यह भारतीय सैन्य कार्रवाई ही थी जिसने पाकिस्तान को यह कहने पर मजबूर कर दिया कि हम रुकने के लिए तैयार हैं।"

अलग हैं यूरोप और एशिया की चिंताएं

रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर भारत और जर्मनी के बीच मतभेदों और मॉस्को के साथ भारत के संबंधों के बारे में पूछे जाने पर मंत्री ने कहा कि रिश्ते इसलिए विकसित नहीं होते क्योंकि एक भागीदार दूसरे की चिंताओं को अपनी चिंताओं के रूप में अपना लेता है। रिश्ते साझा आधार खोजने पर बनते हैं। यूरोप में आपके लिए जो चिंताएं हैं, एशिया में मेरे लिए दूसरी चिंताएं महत्वपूर्ण हैं। जब आप संघर्ष के बारे में सोचते हैं तो यूक्रेन के बारे में सोचते हैं। जब मैं संघर्ष के बारे में सोचता हूं तो मैं पाकिस्तान, आतंकवाद, चीन और हमारी सीमाओं के बारे में सोचता हूं। हमारा दृष्टिकोण समान नहीं हो सकता।"