IIM ग्रेजुएट की पोस्ट में प्लंबर ने 15 मिनट के काम के लिए कितने रुपये चार्ज किए थे? प्लंबर ने अपनी रोज़ और महीने की कमाई को लेकर क्या दावा किया? सोशल मीडिया पर कई लोगों ने प्लंबर की कमाई के आंकड़ों पर सवाल क्यों उठाए?

Plumber Income: IIM के एक ग्रेजुएट के X (पहले ट्विटर) पर किए गए एक पोस्ट ने सोशल मीडिया पर नई बहस छेड़ दी है। लोग अब स्किल्ड कारीगरों और कॉर्पोरेट कंपनियों में काम करने वाले प्रोफेशनल्स की सैलरी की तुलना कर रहे हैं। ये पूरी चर्चा तब शुरू हुई जब इस यूज़र ने दिल्ली के एक प्लंबर से अपनी बातचीत का ज़िक्र किया। प्लंबर ने अपनी जो कमाई बताई, उसे सुनकर कई लोगों को लगने लगा है कि कुछ स्किल्ड वर्कर शायद नौकरीपेशा लोगों के बराबर या उनसे ज़्यादा कमा रहे हैं।

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वायरल हुए इस पोस्ट के मुताबिक, यूज़र ने घर में नया नल लगवाने और शॉवर ठीक करने के लिए एक प्लंबर को बुलाया था। प्लंबर ने करीब 15 मिनट में काम खत्म कर दिया और इसके लिए 700 रुपये लिए। बातचीत के दौरान प्लंबर ने कथित तौर पर बताया कि वह हर दिन ऐसे 5-6 काम करता है, जिससे सिर्फ प्लंबिंग से ही उसकी रोज़ की कमाई 3,000 से 4,000 रुपये हो जाती है।

प्लंबर ने यह भी बताया कि वह प्लंबिंग के अलावा बिजली का काम और सीज़न में AC की सर्विसिंग और इंस्टॉलेशन का काम भी करता है। उसके मुताबिक, गर्मियों में वह हर दिन AC से जुड़े 2-3 काम कर लेता है और हर काम के लिए उसे 1,000 से 3,000 रुपये तक मिल जाते हैं।

इन आंकड़ों के आधार पर X यूज़र ने हिसाब लगाया कि प्लंबर हर दिन 7,000 से 10,000 रुपये कमा रहा है, यानी महीने के करीब 2 लाख से 3 लाख रुपये। यूज़र ने आगे यह भी लिखा कि प्लंबिंग, इलेक्ट्रिकल और AC रिपेयर जैसे कामों की वैल्यू बढ़ रही है और इन पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का भी कोई खतरा नहीं है।

यह पोस्ट वायरल होते ही कई लोगों ने कमाई के इन आंकड़ों की सच्चाई पर सवाल उठाए। बहुत से लोगों ने इन आंकड़ों को गलत बताते हुए कहा कि इसमें फ्रीलांस काम की अनिश्चितता को नज़रअंदाज़ किया गया है। एक यूज़र ने लिखा कि ये आंकड़े "पूरी तरह बकवास" हैं, क्योंकि ज़्यादातर प्लंबर महीने में 20,000 से 35,000 रुपये से ज़्यादा नहीं बचा पाते। उस यूज़र ने यह भी तर्क दिया कि एक कारीगर के लिए एक ही दिन में अलग-अलग जगहों पर जाकर कई काम निपटाना अक्सर मुमकिन नहीं होता और उन्हें रोज़ काम मिले, यह भी ज़रूरी नहीं है।

वहीं, कुछ लोगों ने इस बहस को टैक्स की तरफ मोड़ दिया। एक कमेंट में कहा गया कि कई नौकरीपेशा लोग इस बात से नाराज़ हैं कि बहुत से स्किल्ड कारीगर कैश में पेमेंट लेते हैं, जबकि व्हाइट-कॉलर यानी दफ्तर में काम करने वालों की सैलरी से सीधे टैक्स कट जाता है।