Sonam Wangchuk Interesting Facts: जानिए सोनम वांगचुक के लाइफ की इंटरेस्टिंग बातें। 9 साल तक स्कूल न जाने वाले बच्चे से मशहूर इनोवेटर बनने तक का सफर, Ice Stupa समेत 10 रोचक फैक्ट।

Sonam Wangchuk Success Story: लद्दाख के मशहूर इंजीनियर, शिक्षा सुधारक और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक इन दिनों लगातार चर्चा में हैं। अनशन के 21वें दिन उनकी तबीयत बिगड़ने के बाद पुलिस उन्हें अस्पताल ले गई। इस बीच उनकी जिंदगी और काम को लेकर लोगों की दिलचस्पी भी बढ़ गई है। आइए जानते हैं सोनम वांगचुक की जिंदगी से जुड़ी 10 ऐसी बातें, जिन्होंने उन्हें सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर में अलग पहचान दिलाई।

9 साल तक स्कूल नहीं जा सके थे सोनम वांगचुक

सोनम वांगचुक का जन्म 1 सितंबर 1966 को लद्दाख के उलेटोकपो गांव में हुआ। उस समय गांव में स्कूल नहीं था, इसलिए उनकी शुरुआती पढ़ाई उनकी मां ने घर पर ही कराई। बाद में श्रीनगर के स्कूल पहुंचने पर भाषा की वजह से उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा।

बचपन का संघर्ष बना सबसे बड़ी ताकत

स्कूल में भाषा और शिक्षा प्रणाली से जुड़ी परेशानियों ने उन्हें यह समझाया कि हर बच्चे की सीखने की जरूरत अलग होती है। यही अनुभव आगे चलकर शिक्षा सुधार के उनके मिशन की नींव बना।

इंजीनियरिंग के बाद नौकरी नहीं, बदलाव का रास्ता चुना

उन्होंने एनआईटी श्रीनगर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। अच्छी नौकरी करने के बजाय उन्होंने समाज और शिक्षा के क्षेत्र में काम करने का फैसला किया।

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SECMOL से बदली हजारों छात्रों की जिंदगी

1988 में उन्होंने SECMOL (Students' Educational and Cultural Movement of Ladakh) की शुरुआत की। यहां बच्चों को सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रखा जाता, बल्कि खेती, सौर ऊर्जा, उद्यमिता और जीवन से जुड़ी व्यावहारिक शिक्षा भी दी जाती है।

आइस स्तूप से पानी की समस्या का समाधान

लद्दाख में गर्मियों में पानी की कमी दूर करने के लिए उन्होंने आइस स्तूप तकनीक विकसित की। सर्दियों में जमा की गई बर्फ गर्मियों में धीरे-धीरे पिघलती है और किसानों को सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराती है।

पर्यावरण संरक्षण बना सबसे बड़ा मिशन

सोनम वांगचुक का मानना है कि हिमालय सुरक्षित रहेगा तो करोड़ों लोगों का जल स्रोत भी सुरक्षित रहेगा। इसी सोच के साथ वे लंबे समय से ग्लेशियर और पर्यावरण संरक्षण पर काम कर रहे हैं।

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सौर ऊर्जा पर लगातार कर रहे हैं प्रयोग

उन्होंने ऊर्जा बचाने वाली इमारतों और सोलर टेक्नोलॉजी पर कई प्रयोग किए हैं। भारतीय सेना के लिए सोलर पावर से गर्म रहने वाले टेंट तैयार करने में भी उनका योगदान रहा है।

पत्नी भी हैं शिक्षा और समाज सेवा से जुड़ी

उनकी पत्नी गीतांजलि जे. अंग्मो सोशल एंटरप्रेन्योर और शिक्षाविद हैं। वे हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव्स, लद्दाख (HIAL) की सह-संस्थापक हैं और शिक्षा के नए मॉडल पर काम करती हैं।

देश-दुनिया में मिला सम्मान

सोनम वांगचुक को 2018 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें रोलेक्स अवॉर्ड फॉर एंटरप्राइज समेत कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिल चुके हैं।

अनुभव से सीखने वाली शिक्षा के समर्थक

सोनम वांगचुक हमेशा रटकर पढ़ने के बजाय प्रयोग और अनुभव के जरिए सीखने पर जोर देते हैं। उनका मानना है कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो बच्चों को जीवन की वास्तविक चुनौतियों के लिए तैयार करे।

सोनम वांगचुक की पहचान सिर्फ एक इंजीनियर या शिक्षा सुधारक की नहीं है, बल्कि ऐसे इनोवेटर की है जिन्होंने लद्दाख जैसी कठिन परिस्थितियों में भी नए समाधान खोजकर दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा। शिक्षा, जल संरक्षण, सौर ऊर्जा और पर्यावरण जैसे क्षेत्रों में उनके प्रयास आज भी लाखों लोगों के लिए प्रेरणा बने हुए हैं। वहीं, अनशन के दौरान उनकी तबीयत बिगड़ने की खबर के बीच उनके जीवन और योगदान को लेकर चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है।