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Success Story: कॉलेज के समय घटी अजीब घटना से मिली प्रेरणा, नतीजा- तीसरे प्रयास में UPSC-2020 में टॉपर बने वासु

वासु जैन कहते हैं कि यूपीएसी की जर्नी उनके लिए रोलर कोस्टर की तरह थी। Asianetnews Hindi संघ लोक सेवा आयोग (UPSC 2020) में सिलेक्ट हुए 100 कैंडिडेट्स की सक्सेज जर्नी (Success Journey) पर एक सीरीज चला रहा है। इसी कड़ी में हमने वासु से बातचीत की।

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New Delhi, First Published Dec 8, 2021, 6:11 PM IST
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करियर डेस्क. गुजरात नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (Gujarat National Law University) से ग्रेजुएट वासु जैन (Vasu Jain) को संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) परीक्षा में 67वीं रैंक मिली है। फरवरी में ही उनका सीआरपीएफ (CRPF) में असिस्टेंट कमांडेंट के पद पर भी चयन हो गया था। दिसम्बर में ज्वाइनिंग लेटर आने की उम्मीद थी। उसके पहले यूपीएससी के नतीजे आ गए। 12वीं तक की पढ़ाई लवली पब्लिक सीनियर सेकेंड्री स्कूल, दिल्ली से हुई। कुछ समय तक उन्होंने काम भी किया फिर यूपीएससी की तैयारी में लग गए। वर्ष 2018 में उन्होंने पहला अटेम्पट दिया था। जिसमें उनका प्रीलिम्स नहीं निकल सका था। वर्ष 2019 में वह इंटरव्यू तक पहुंचे पर मेरिट लिस्ट में जगह नहीं बना सके थे। संघ लोक सेवा आयोग (UPSC 2020) के नतीजे 24 सितंबर, 2021 को जारी किए गए। फाइनल रिजल्ट (Final Result) में कुल 761 कैंडिडेट्स को चुना गया। Asianetnews Hindi संघ लोक सेवा आयोग (UPSC 2020) में सिलेक्ट हुए 100 कैंडिडेट्स की सक्सेज जर्नी (Success Journey) पर एक सीरीज चला रहा है। इसी कड़ी में हमने वासु से बातचीत की। आइए जानते हैं कैसे हैं उनकी सक्सेज जर्नी।

रोलर कोस्टर की तरह थी यूपीएससी जर्नी
वासु जैन कहते हैं कि यूपीएसी की जर्नी उनके लिए रोलर कोस्टर की तरह थी। कभी-कभी बहुत अच्छी चीजें थी और कभी-कभी बहुत दिक्क्तें भी आईं। वह बस चलते गए, परिश्रम करते रहें, गाड़ी आगे बढ़ती गई। तैयारी के दौरान ज्ञान बढ़ा। समझ आया कि दूसरों से कैसा बर्ताव करते हैं। सोसाइटी में लोगों से कैसे बर्ताव करते हैं। यह समझ डेवलप हुई। परीक्षा के बाद चयन नहीं होता है तो असुरक्षा की भावना रहती है कि आगे चयन होगा या नहीं होगा। दूसरी ओर हमारे बैचमेट लाखों रुपये प्रति वर्ष के पैकेज पर काम कर रहे थे और हमने अभी तक कमाना नहीं शुरू किया पर लोगों का सपोर्ट था तो यूपीएससी निकल गया।

कॉलेज के समय घटा अजीब वाकया
वासु जैन के साथ कॉलेज के समय एक अजीब वाकया घटा था। जिसका जवाब किसी के पास नहीं था। वासु की पूरे कॉलेज में दूसरी रैंक थी। प्लेसमेंट के लिए कम्पनियां कॉलेज में आयी थी। वह प्लेसमेंट के लिए जितनी जगह बैठे, तो उनका नाम इंटरव्यू के लिए शार्टलिस्ट हुआ पर उनका किसी भी कम्पनी में सिलेक्शन नहीं हुआ। हैरानी की बात यह है कि सात जगह पर उनका इंटरव्यू के लिए नाम आया था। पर सातों जगहों पर उनका चयन नहीं हुआ। उसकी वजह उनके टीचर्स व दोस्तों को भी समझ नहीं आई कि उनका सिलेक्शन क्यों नहीं हुआ। वासु कहते हैं कि सातों जगहों से रिजेक्शन होना बड़ी अजीब बात थी। अब समझ में आता है कि वहां पर रिजेक्शन इसलिए हुआ कि यहां पर सिलेक्शन होना था।

कुछ नंबरों से चूक गया था पहला प्रयास
वासु कहते हैं कि पिछले साल इंटरव्यू दिया, इंटरव्यू अच्छा हुआ तो लगा कि कुछ अच्छा हो सकता है, लेकिन लिस्ट में नाम नहीं आया। जब मार्क्स देखा तो यही पता चला था कि लिस्ट में नाम आने के बहुत करीब था। कुछ नम्बर से ही चूक गया था। उस समय निराशा की बात यही थी कि चयन नहीं हुआ है। फिर प्रीलिम्स से शुरू करना पड़ेगा। उस समय पर पॉजिटीव एटीट्यूड था। सोचता था कि थोड़े से नम्बर से ही रह गया। थोड़ी सी मेहनत करनी है। लिस्ट में नाम तो आ ही जाएगा। मम्मी-पापा ने भी सपोर्ट किया। दोस्तों ने कहा कि कुछ सपोर्ट चाहिए तो हम लोग करेंगे। सबने अपना-अपना योगदान दिया। पॉजिटिव माइंडसेट से आगे बढ़े तो इस साल हो गया। मतलब उनका जो निगेटिव फेज था, जिसमें कम नम्बरों के अंतर से सफलता दूर हो गयी थी। थोड़े नंबर और चाहिए। थोड़ी मेहनत और की जाए तो लिस्ट में नाम आ जाएगा। इस सोच के साथ आगे बढ़ा।

मां से मिली प्रेरणा, अफसर के काम का प्रभाव देख हुए थे प्रभावित
वासु जैन को सिविल सर्विस ज्वाइन करने की प्रेरणा अपनी मां से मिली। वह खुद सिविल सर्विस की परीक्षा में शामिल हुई थीं पर सफल नहीं हो सकीं। उनका कहना है कि उनकी मां बचपन में उन्हें सिविल सर्विसेज से जुड़ी अच्छी कहानियां सुनाती थीं। उन कहानियों का भी असर हुआ। जब वह कॉलेज में थे, तब उस समय वह कॉलेज की लीगल सर्विस कमेटी में थे। पास के गांव में एक पाठशाला बनावानी थी। उन्होंने अन्य लोगों के साथ संबंधित से सम्पर्क किया पर दो महीने तक कुछ हुआ नहीं। फिर किसी मीट के लिए कॉलेज में एक आईपीएस ऑफिसर आए। उन्होंने उनके साथ इस मामले की चर्चा की और पूर्व में किए गए अपने प्रयासों के बारे में बताया। हालांकि वह इलाका उन ऑफिसर के कार्यक्षेत्र में नहीं आता था। फिर भी एक हफ्ते के अंदर पाठशाला का निर्माण शुरू हो गया तो उन्होंने जमीनी स्तर पर एक ऑफिसर के काम का प्रभाव देखा। गांव को तुरंत उसका फायदा हुआ। यह देखकर वह सिविल सर्विस को लेकर गंभीर हुए और उन्होंने सिविल सर्विस परीक्षा देने का फैसला लिया।

परिवार और दोस्तों के देते हैं श्रेय
पूर्वी दिल्ली, गांधी नगर के रहने वाले वासु सफलता का श्रेय अपनी मां बबिता जैन, पिता दीपक जैन, दादाजी सुभाषचंद जैन, बहन तान्या जैन व भाई नमन जैन समेत पूरे परिवार को देते हैं। उनका कहना है कि उनकी मां ने उन्हें इस काबिल बनाया कि वह यहां तक पहुंचे। आत्मविश्वास बढ़ाया, सपोर्ट किया, मोटिवेट किया, समय दिया। जब चयन नहीं हुआ तो कोई निगेटिव बात नहीं की। उस समय भी पूरा परिवार साथ था। उनका संयुक्त परिवार है। परिवार में करीब 22 सदस्य हैं। ताऊ विपिन जैन, चाचा श्रवण जैन व सतीश जैन समेत सभी लोगों ने कुछ न कुछ सपोर्ट किया। करीबी मित्रों में अमनदीप, मनोज, साकेत, दृष्टि, अंशिका ने यूपीएससी परीक्षा की तैयारी में काफी मदद की। दोस्तों ने परीक्षा का सेलेबस पूरा कराने में सहायता की। वासु अपनी परीक्षा की तैयारी के लिए दोस्तों और ओवरऑल आगे बढाने में परिवार को श्रेय देते हैं। उनके पिता का गांधी नगर में कपड़ों का व्यवसाय है।

बहन कर सकती है इतनी मेहनत तो मैं क्यों नहीं
उनका कहना है कि उनकी बहन तान्या जैन ने भी तैयारी शुरू की थी। उससे भी इंस्पायर हुआ कि और पढूं क्योंकि वह तैयारी तो करती ही थी पर घर के और काम भी करती थी। सारी चीजें अच्छे से करती। मैं घर का काम नहीं करता था। सिर्फ पढ़ता था। वह बाकि चीजें संभालती थी। उससे मोटिवेशन मिला कि वह बाकि चीजें संभालती है और पढ़ती भी है। यह चीज मोटिवेटिंग लगती थी कि मेरी बहन इतनी मेहनत कर सकती है फिर मैं क्यों नहीं कर सकता हूं। जब कभी मैंने रिस्पांसिबिलिटी लेना छोड़ दिया। हॉस्टल चला गया तो उसने एक बड़े भाई की तरह जिम्मेदारी निभायी।

इंटरव्यू एक और परीक्षा की तरह
इंटरव्यू के दिन शांत ही था क्योंकि इंटरव्यू एक और परीक्षा की तरह है। बस यह था कि पिछली बार के मुकाबले अच्छा जाना चाहिए। पिछली बार चिंता और उत्सुकता थी। इस बार इंटरव्यू में शांत था। प्रैक्टिस अच्छे से हो गयी थी। उनका इंटरव्यू 30 से 35 मिनट तक चला था। वासु जैन कहते हैं कि इस तरह की चीजों पर विश्वास मत करो। जैसे हमें पता है कि एक बुक पढ़नी है। उस एक हजार पेज की बुक को कई लोग कहते हैं कि हम उसे दो हफ्ते में खत्म कर देंगे। पर हमें वह बुक मजे के लिए नहीं पढ़ना है। हमें याद करना है। दो हफ्ते में पढ़ लोगे तो कितना कम याद रहेगा। इन पर विश्वास मत करो। ध्यान रखो कि हमें बुक खत्म नहीं करनी है बल्कि याद करनी है।

इस तरह की प्रक्रिया पर विश्वास मत करें
यूपीएससी पहले अटेम्पट में क्रैक नहीं हो रहा है तो छोड़ो। इस प्रक्रिया में विश्वास मत करो। असफल होने के बाद खुद का विश्लेषण करो कि आपको क्या लग रहा है कि आप क्या कर पाओगे। आपका पहला अटेम्पट कैसा रहा। उस आधार पर निर्णय लो। सिर्फ यह नहीं कि पहला अटेम्पट हुआ तो ठीक नहीं हुआ तो नहीं हुआ। वासु कहते हैं कि वह भी यही सोचकर आए थे कि पहला अटेम्पट ही दूंगा। यदि नहीं हुआ तो जॉब पर चला जाऊंगा। जब उन्होंने पहला अटेम्पट दिया तो लगा कि पहला प्रयास किया पर प्रीलिम्स नहीं निकला पर खुद को लगा कि बढ़िया प्रयास किया। अगली बार यूपीएससी क्रैक कर लूंगा। दोबारा फिर अटेम्पट दिया इंटरव्यू तक गया तो लगा कि इतने पास पहुंच गए हैं, अब बस थोड़े प्रयास में हो जाएगा। बस थोड़ी और मेहनत कर लें, तो थोड़ा टाइम लेकर आओ। 

मेहनत की है तो रिजल्ट मिलेगा
उनका कहना है कि सबकी स्ट्रेटजी अलग-अलग होती है। खुद पर विश्वास करो कि यदि आपने मेहनत किया तो रिजल्ट मिलेगा। उनका इसी वर्ष सीआरपीएफ में असिस्टेंट कमांडेंट के पद पर सलेक्शन हो गया था। वासु कहते हैं कि यदि कुछ त्याग करना पड़े, चाहे वह मोबाइल का हो या दोस्तों का हो, वह त्याग करना पड़ेगा। आप अपनी डेली, वीकली या मंथली योजना बनाइए, योजना सबसे जरूरी है। ऐसी योजना बनाइए कि उसके बीच में बफर जोन भी हो। उस प्लान को बदलिए मत और सैक्रिफाइस के लिए तैयार रहो। कंसिस्टेंसी से जितनी चीजें करेंगे तो अच्छा रहेगा, उससे विश्वास बढ़ेगा कि मैंने कुछ किया है। उनका कहना है कि हमें अपना टाइम टेबल कुछ इस तरह बनाना चाहिए कि हमारा ब्रेक कुछ ज्यादा बड़ा हो। हर घंटे बाद 5 से 10 मिनट तक का ब्रेक लेता था। हफ्ते में संडे को टारगेट न रखिए। मतलब कि संडे को जो पढ़ना हो पढेंगे, आराम करेंगे, तो उस दिन मस्ती भी होती थी। ऐसा नहीं कि कुछ चीजों से अछूते रह गए।

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