Khalifa Review: पृथ्वीराज सुकुमारन की दमदार स्क्रीन प्रेजेंस और एक्शन के बावजूद फिल्म कहानी में कमजोर पड़ती है। जानें 'खलीफा' की 5 बड़ी कमियां, जो दर्शकों को कर सकती हैं निराश।
साउथ सुपरस्टार पृथ्वीराज सुकुमारन की मच अवेटेड फिल्म 'खलीफा' (Khalifa) 20 अगस्त 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज हो गई। वैसाख के डायरेक्शन में बनी यह एक्शन-थ्रिलर फिल्म सोने की तस्करी, गैंगस्टर वर्ल्ड, परिवार और बदले की कहानी को सामने रखती है। फिल्म में पृथ्वीराज सुकुमारन के साथ नील नितिन मुकेश, मालविका शर्मा, संजू शिवराम और शम्मी थिलकन जैसे कलाकार हैं। मोहनलाल की मौजूदगी ने भी फिल्म को लेकर दर्शकों की उत्सुकता बढ़ाई थी। लेकिन बॉक्स ऑफिस पर फिल्म पहले दिन कुछ खास कमाल नहीं दिखा पाई। कहानी और किरदारों के लेबल पर फिल्म कई जगह कमजोर पड़ती है। रेडिफ की समीक्षा में भी फिल्म की सबसे बड़ी समस्या इसकी स्क्रिप्ट को बताया गया है।
क्या है 'खलीफा' की कहानी?
फिल्म की कहानी आमिर अली यानी पृथ्वीराज सुकुमारन के इर्द-गिर्द घूमती है। आमिर शुरुआत में एक सामान्य जिंदगी जीने वाला युवक है, लेकिन उसके पिता को सोने की तस्करी के मामले में फंसा दिया जाता है। इसके बाद परिवार को बचाने और दुश्मनों से बदला लेने के लिए आमिर धीरे-धीरे अपराध की दुनिया में उतरता है। कहानी में आमिर के दादा मम्बरक्कल अहमद अली की विरासत भी अहम है। फिल्म लगातार उनके प्रभावशाली अतीत की झलक देती है और इसी के जरिए आगे बनने वाले सिनेमाई यूनिवर्स की जमीन तैयार करती है।
पृथ्वीराज सुकुमारन हैं फिल्म की सबसे बड़ी ताकत
'खलीफा' की सबसे मजबूत कड़ी पृथ्वीराज सुकुमारन हैं। एक्टर ने आमिर अली के किरदार को स्टाइल और कॉन्फिडेंस के साथ निभाया है। एक्शन सीक्वेंस हों, इमोशनल पल हों या बड़े पर्दे वाला मास अवतार पृथ्वीराज हर जगह अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं। रेडिफ की समीक्षा भी उन्हें फिल्म की सबसे बड़ी ताकत मानती है फिल्म के विजुअल्स और बैकग्राउंड म्यूजिक भी कई जगह माहौल को मजबूत करते हैं। खासकर लंदन वाला शुरुआती एक्शन, ब्रिज अटैक और सेकंड हाफ में आमिर के घर पर होने वाला हमला फिल्म के बेहतर हिस्सों में शामिल हैं।
लेकिन ये हैं 'खलीफा' की 5 बड़ी कमजोरियां
कहानी में नयापन नहीं
फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी कहानी है। गैंगस्टर, सोने की तस्करी, परिवार के साथ अन्याय और बदला लेने के लिए अपराध की दुनिया में उतरने वाला हीरो इनमें से ज्यादातर चीजें दर्शक पहले भी कई फिल्मों में देख चुके हैं। रेडिफ के मुताबिक, फिल्म की पटकथा मलयालम सिनेमा की कई पुरानी गैंगस्टर फिल्मों की याद दिलाती है और अपनी अलग पहचान बनाने में ज्यादा सफल नहीं होती।
विलेन उतने खतरनाक नहीं लगे
फिल्म में नील नितिन मुकेश अहम विरोधी की भूमिका में हैं, लेकिन उनका किरदार वह डर और खतरा पैदा नहीं कर पाता जिसकी एक मास एक्शन फिल्म में उम्मीद होती है। उनके किरदार की बदले की योजनाएं भी कई जगह कमजोर लगती हैं। शम्मी थिलकन और शिवजीत के किरदार भी कहानी में मजबूत चुनौती खड़ी नहीं कर पाते। यानी हीरो जितना प्रभावशाली नजर आता है, उसके मुकाबले विलेन उतने दमदार नहीं बन पाए।
सपोर्टिंग किरदारों को ज्यादा स्पेस नहीं
फिल्म का फोकस पृथ्वीराज के किरदार को बड़ा और स्टाइलिश बनाने पर इतना ज्यादा है कि बाकी किरदार पीछे छूट जाते हैं। मालविका शर्मा का किरदार खास प्रभाव नहीं छोड़ पाता, जबकि संजू शिवराम को भी शुरुआत के बाद ज्यादा मजबूत भूमिका नहीं मिलती। रेडिफ की समीक्षा के अनुसार, कई कलाकारों की क्षमता का पूरा इस्तेमाल नहीं किया गया है।
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फ्रेंचाइजी बनाने की कोशिश कहानी पर भारी पड़ी
'खलीफा' सिर्फ एक फिल्म की तरह नहीं, बल्कि एक बड़े यूनिवर्स की शुरुआत के तौर पर भी बनाई गई है। फिल्म लगातार मम्बरक्कल अहमद अली की विरासत के बारे में संकेत देती है और अंत में मोहनलाल की मौजूदगी से अगली कहानी का रास्ता खोलती है। समस्या यह है कि फिल्म अपनी मौजूदा कहानी को पूरी तरह मजबूत करने से पहले ही भविष्य की कहानी का माहौल बनाने लगती है। रेडिफ ने भी इसे फिल्म की बड़ी कमियों में गिना है।

जरूरत से ज्यादा स्लो-मोशन और कमजोर नैरेशन
फिल्म को स्टाइलिश बनाने की कोशिश कई जगह जरूरत से ज्यादा महसूस होती है। स्लो-मोशन वॉकिंग शॉट्स का इस्तेमाल इतना अधिक है कि कई दृश्यों की रफ्तार प्रभावित होती है। शुरुआती हिस्से में दिलचस्पी पैदा होने के बावजूद कहानी आगे बढ़ते-बढ़ते अपनी पकड़ खो देती है।
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