Ramayana Blouse costume Controversy: अब  फिल्म 'रामायण' में सीता के ब्लाउज पर विवाद गहराता जा रहा है, क्योंकि त्रेतायुग में सिले वस्त्र नहीं थे। इतिहासकारों के अनुसार, आधुनिक ब्लाउज 150 साल पुराना है। जानें क्या बोल रहे मेकर्स?

नितेश तिवारी की मेगा बजट फिल्म 'रामायण' का ट्रेलर रिलीज होते ही सोशल मीडिया पर इसकी स्टारकास्ट, वीएफएक्स और भव्यता की खूब चर्चा हुई। लेकिन इन सबके बीच एक ऐसी चीज़ ने सबसे ज्यादा बहस छेड़ दी जिसकी शायद किसी ने उम्मीद नहीं की थी—सीता माता का ब्लाउज। फिल्म में साई पल्लवी सीता की भूमिका निभा रही हैं। ट्रेलर में उनके लुक को देखकर सोशल मीडिया पर सवाल उठने लगे कि क्या त्रेतायुग में महिलाएं सिलाई वाला ब्लाउज पहनती थीं? कई लोगों ने फिल्म की कॉस्ट्यूम डिजाइन को ऐतिहासिक तथ्यों से जोड़कर सवाल उठाए, जबकि कुछ ने इसे सिर्फ फिल्मी प्रस्तुति और रचनात्मक स्वतंत्रता बताया।

ट्रेलर के बाद सोशल मीडिया पर शुरू हुई बहस

ट्रेलर सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ यूजर्स ने लिखा कि साई पल्लवी का लुक किसी आधुनिक दुल्हन जैसा लग रहा है, जबकि कुछ ने लारा दत्ता के कैकयी वाले लुक की तुलना टीवी सीरियल्स से कर दी। सबसे बड़ा सवाल यह उठा कि यदि रामायण त्रेतायुग की कहानी है, तो उसमें महिलाओं को आधुनिक शैली के सिले हुए ब्लाउज में क्यों दिखाया गया है?

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क्या त्रेतायुग में ब्लाउज पहनने का चलन था?

इतिहासकारों और फैशन विशेषज्ञों के अनुसार, आज जिस ब्लाउज को हम जानते हैं, उसका अस्तित्व प्राचीन भारत में नहीं था। प्राचीन भारत में महिलाओं के वस्त्र मुख्य रूप से बिना सिलाई वाले कपड़ों पर आधारित होते थे। वे अलग-अलग क्षेत्रों में अंतरिया (निचला वस्त्र), उत्तरीय (ऊपरी ओढ़नी) और स्तनपट्ट (वक्ष ढकने वाला कपड़ा) जैसे परिधान पहनती थीं। देश के कई हिस्सों, विशेषकर गर्म क्षेत्रों में, महिलाओं के ऊपरी शरीर को पूरी तरह ढकने की परंपरा भी नहीं थी। मंदिरों की मूर्तियां, प्राचीन चित्रकला और ऐतिहासिक प्रमाण इस बात की पुष्टि करते हैं।

मॉडर्न ब्लाउज भारत में कब आया?

फैशन इतिहासकारों के मुताबिक, आज का सिला हुआ ब्लाउज करीब 150 साल पहले भारतीय परिधान का हिस्सा बना। बताया जाता है कि 19वीं सदी में ज्ञानदानंदिनी देवी ने बंगाली साड़ी पहनने के पारंपरिक तरीके में बदलाव करते हुए पारसी और विक्टोरियन फैशन से प्रेरणा लेकर ब्लाउज और पेटीकोट को लोकप्रिय बनाया। उस दौर में ब्रिटिश समाज में बिना ब्लाउज के साड़ी पहनना स्वीकार्य नहीं माना जाता था। इसके बाद धीरे-धीरे ब्लाउज भारतीय महिलाओं की वेशभूषा का स्थायी हिस्सा बन गया। यही वजह है कि कई इतिहासकारों का मानना है कि त्रेतायुग की कथा में आधुनिक ब्लाउज दिखाना ऐतिहासिक रूप से सटीक नहीं माना जा सकता।

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कॉस्ट्यूम डिजाइनर्स ने क्या दी सफाई?

फिल्म के कॉस्ट्यूम डिजाइनर रिंपल और हरप्रीत नरूला ने इस विवाद पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि रामायण काल के वस्त्रों का कोई एक निश्चित दृश्य प्रमाण मौजूद नहीं है, इसलिए अलग-अलग व्याख्याएं संभव हैं। उनके अनुसार, फिल्म का उद्देश्य इतिहास की हूबहू नकल करना नहीं, बल्कि ऐसा विजुअल तैयार करना था जो भारतीय संस्कृति से जुड़ा महसूस हो और साथ ही बड़े पर्दे की भव्यता के अनुरूप भी लगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि सीता को ब्लाउज पहनाने का फैसला उन्हें आधुनिक दिखाने के लिए नहीं लिया गया। बल्कि हर किरदार के व्यक्तित्व, भाव-भंगिमा, वातावरण और कहानी की जरूरत को ध्यान में रखकर कॉस्ट्यूम तैयार किए गए। डिजाइनर्स का कहना है कि सीता के लुक में उन्होंने सादगी, गरिमा और पवित्रता को सबसे ज्यादा महत्व दिया।

सिर्फ सीता नहीं, शूर्पणखा के लुक पर भी उठे सवाल

फिल्म में रकुल प्रीत सिंह शूर्पणखा की भूमिका निभा रही हैं। जहां सीता को पूरी तरह ढके हुए पारंपरिक परिधान में दिखाया गया है, वहीं शूर्पणखा का लुक अधिक बोल्ड और खुले कंधों वाले परिधान में नजर आता है। इस अंतर को लेकर भी सोशल मीडिया पर बहस शुरू हो गई। कई लोगों का कहना है कि फिल्मों में अक्सर "अच्छी" महिला को पूरी तरह ढके कपड़ों में और "नकारात्मक" महिला को ज्यादा ग्लैमरस या बोल्ड कपड़ों में दिखाने की पुरानी सोच दोहराई जाती है। हालांकि कॉस्ट्यूम डिजाइनर्स का कहना है कि यह फैसला नैतिकता दिखाने के लिए नहीं, बल्कि दोनों किरदारों की अलग-अलग पहचान और व्यक्तित्व को विजुअली दर्शाने के लिए लिया गया है।

फैशन एक्सपर्ट की अलग राय

फैशन विशेषज्ञों का मानना है कि किसी किरदार का व्यक्तित्व दिखाने के लिए केवल कपड़ों की लंबाई या शरीर का कितना हिस्सा दिख रहा है, यही एक तरीका नहीं होना चाहिए। उनके अनुसार, रंग, आभूषण, कपड़े की बनावट, ड्रेपिंग और पहनावे की शैली के जरिए भी किसी पात्र की पहचान और स्वभाव को प्रभावी ढंग से दिखाया जा सकता है। 

इतिहास, आस्था और सिनेमाई प्रस्तुति के बीच फंसी बहस

'रामायण' के ट्रेलर ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि पौराणिक कथाओं पर आधारित फिल्मों में ऐतिहासिक सटीकता को कितना महत्व दिया जाना चाहिए और रचनात्मक स्वतंत्रता की सीमा क्या होनी चाहिए। फिलहाल यह स्पष्ट है कि ब्लाउज को लेकर शुरू हुई बहस सिर्फ एक परिधान तक सीमित नहीं है। इसमें इतिहास, संस्कृति, आस्था, फैशन और सिनेमा—सभी जुड़े हुए हैं। आने वाले समय में फिल्म रिलीज होने के बाद यह चर्चा और भी तेज हो सकती है कि पौराणिक पात्रों को आधुनिक दर्शकों के सामने किस रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए।