शराब दिमाग के 'रिवॉर्ड सिस्टम' को सक्रिय कर खुशी का एहसास देती है। इसी इनाम को दोबारा पाने की चाहत धीरे-धीरे लत बन जाती है। यह सिर्फ इच्छाशक्ति की कमी नहीं, बल्कि एक जटिल दिमागी प्रक्रिया है, जिससे सनी देओल जैसे कुछ लोग बच जाते हैं।

मुंबईः बॉलीवुड के एक्शन हीरो सनी देओल ने एक बार खुलासा किया था कि उन्होंने 'फिट इन' करने के लिए, यानी माहौल में घुलने-मिलने के लिए शराब ट्राई की थी। लेकिन खास बात ये है कि उन्होंने शराब को कभी अपनी आदत नहीं बनने दिया और उन्हें इसकी लत नहीं लगी। सनी देओल का यह अनुभव एक बड़े सवाल को जन्म देता है - आखिर क्यों कुछ लोग शराब के आदी हो जाते हैं और कुछ लोग इससे दूर रहने में कामयाब रहते हैं?

यह सवाल अक्सर हमारे मन में आता है कि जब कोई चीज़ इतनी बुरी है तो लोग उसके चंगुल में फंसते ही क्यों हैं। दरअसल, इसकी जड़ हमारे दिमाग के काम करने के तरीके में छिपी है। हर किसी का शरीर और दिमाग नशे को लेकर अलग-अलग तरह से प्रतिक्रिया देता है।

दिमाग का 'रिवॉर्ड सिस्टम' और लत का कनेक्शन

वैज्ञानिकों के अनुसार, जब कोई व्यक्ति शराब पीता है, तो यह सीधे दिमाग के 'रिवॉर्ड सिस्टम' को एक्टिवेट कर देती है। यह दिमाग का वह हिस्सा है जो हमें अच्छा महसूस कराता है। शराब पीने से दिमाग में ऐसे केमिकल रिलीज होते हैं, जिससे व्यक्ति को अस्थायी तौर पर खुशी, शांति या उत्साह का अनुभव होता है।

कुछ लोग शराब पीकर सामाजिक रूप से ज़्यादा सहज महसूस करने लगते हैं, जैसा कि सनी देओल ने 'फिट इन' करने के लिए महसूस किया होगा। यही 'अच्छा महसूस' करने वाली फीलिंग दिमाग को बार-बार शराब पीने के लिए उकसाती है। दिमाग को यह एक इनाम जैसा लगता है और वह फिर से उसी अनुभव को दोहराना चाहता है।

इसी साइकल के कारण धीरे-धीरे व्यक्ति शराब पर निर्भर होने लगता है और यह निर्भरता लत में बदल जाती है। तो अगली बार जब आप सुनें कि कोई शराब की लत नहीं छोड़ पा रहा है, तो समझिए कि यह सिर्फ इच्छाशक्ति की कमी नहीं, बल्कि दिमाग का एक जटिल केमिकल खेल भी है, जिससे बाहर निकलना हर किसी के लिए आसान नहीं होता।