शाकाहारी लोगों के लिए विज्ञान की दुनिया से एक बड़ी खबर है। अमेरिका की 17 साल की स्कूली छात्रा गैब्रिएला रोथबर्ग ने जेनेटिक तरीके से एक ऐसा टमाटर तैयार किया है, जिसे खाने पर बिल्कुल मीट जैसा स्वाद आएगा।

शाकाहारी लोगों को मीट का स्वाद चखाने के लिए विज्ञान की दुनिया में एक अनोखा प्रयोग हुआ है। अमेरिका की 17 साल की स्कूली छात्रा गैब्रिएला रोथबर्ग ने जेनेटिक रूप से मॉडिफाइड एक नया टमाटर तैयार किया है। मियामी के 'रैनसम एवरग्लेड्स' स्कूल में पढ़ने वाली गैब्रिएला एक ऐसे टमाटर पर काम कर रही हैं, जो 'हीम' (Heme) नाम का मॉलिक्यूल बना सकता है। यह वही आयरन वाला तत्व है जो मीट को उसका खास स्वाद देता है।

इस प्रयोग में पौधों के जीन में बदलाव किया गया है, ताकि मीट के स्वाद वाले तत्व सीधे पौधे के अंदर ही बन सकें। शाकाहारी लोगों के लिए मीट जैसा स्वाद देने वाले इस नए विकल्प को तैयार करने में गैब्रिएला का यह प्रोजेक्ट काफी सुर्खियां बटोर रहा है।

15 साल की उम्र में आया आइडिया

गैब्रिएला को यह आइडिया तब आया जब वह सिर्फ 15 साल की थीं। एक दिन वह अपने पिता के लिए सैंडविच बना रही थीं। तभी उन्होंने सोचा कि प्लांट-बेस्ड मीट का इस्तेमाल करने के बजाय, क्यों न सीधे टमाटर में ही मीट का स्वाद डाल दिया जाए। इसी सोच से 'इम्पॉसिबल वाइन्स' (Impossible Vines) नाम के बायोटेक प्रोजेक्ट की शुरुआत हुई। इस प्रोजेक्ट में उन्होंने अपने पिता और बायोटेक बिजनेसमैन जोनाथन रोथबर्ग के साथ-साथ मियामी यूनिवर्सिटी की रिसर्चर मैडिसन मार्शल के साथ मिलकर काम किया है।

टमाटर के सेल्स में जरूरी जेनेटिक मटेरियल डालने के लिए 'एग्रोबैक्टीरियम' (Agrobacterium) नाम के बैक्टीरिया का इस्तेमाल किया गया। इस प्रोसेस के जरिए टमाटर के पौधों को 'हीम' बनाने के लायक बनाया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस तकनीक को जून 2026 में अमेरिका में पेटेंट भी मिल गया है। इसका पेटेंट नंबर 12668806 है।

अभी किस स्टेज पर है यह प्रयोग और क्या हैं चुनौतियां?

यह प्रोजेक्ट अभी शुरुआती स्टेज में है। इन खास टमाटरों के स्वाद को अभी तक टेस्ट नहीं किया गया है और न ही इनका कमर्शियल प्रोडक्शन शुरू हुआ है। शुरुआत में पौधे ठीक से नहीं बढ़ रहे थे, जिससे रिसर्चर्स को परेशानी हुई। बाद में पता चला कि पौधों को उगाने वाले मीडियम में विटामिन की मात्रा में दिक्कत थी। इसे ठीक करने के बाद पौधों की ग्रोथ अच्छी हो गई। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि इस प्रोजेक्ट के लिए जरूरी जीन मॉडल बनाने और पेटेंट के कागज तैयार करने में AI टूल्स की मदद ली गई है।

क्या इससे आयरन की कमी दूर होगी?

इस आविष्कार का मकसद सिर्फ मीट जैसा स्वाद देना नहीं है, बल्कि पोषण देना भी है। जिन इलाकों में मीट बहुत महंगा है या आसानी से नहीं मिलता, वहां यह टमाटर एक बेहतरीन विकल्प बन सकता है। उम्मीद है कि भविष्य में यह गर्भवती महिलाओं में आयरन की कमी को दूर करने में भी मदद करेगा। हालांकि, इन टमाटरों में कितना आयरन होगा, इन्हें खाने से शरीर को कितना पोषण मिलेगा और ये आयरन की कमी रोकने में कितने असरदार होंगे, यह साबित करने के लिए अभी और रिसर्च की जरूरत है।