कर्नाटक हाईकोर्ट ने फर्जी पासपोर्ट रिन्यू करने के आरोपी ट्रैवल एजेंट को राहत देने से इनकार कर दिया है। आरोपी पर एक आतंकी संदिग्ध का भी पासपोर्ट बनवाने का आरोप है। कोर्ट ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मामला बताते हुए मुकदमा चलाने का निर्देश दिया है।
ट्रैवल एजेंट को HC से राहत नहीं, याचिका खारिज
कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक ट्रैवल एजेंट के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया है। उस पर फर्जी तरीके से पासपोर्ट रिन्यू कराने में मदद करने का आरोप है, जिसमें एक ऐसा व्यक्ति भी शामिल है जो कथित तौर पर आंध्र प्रदेश एंटी-टेररिस्ट स्क्वाड (एटीएस) द्वारा वांटेड है।

18 जून को दिए गए एक फैसले में, जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के तहत दायर आपराधिक याचिका संख्या 12734/2023 को खारिज कर दिया। याचिकाकर्ता ने यह दावा करते हुए आपराधिक मामले को रद्द करने की मांग की थी कि वह एक वास्तविक ट्रैवल एजेंट है और उसने अपनी शारीरिक विकलांगता का भी हवाला दिया था।
'आरोप राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े, विकलांगता बचाव का आधार नहीं'
हाईकोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता केवल यह कहकर कि वह एक वैध ट्रैवल एजेंट है या विकलांगता के आधार पर मुकदमे से नहीं बच सकता। कोर्ट ने पाया कि उसके खिलाफ आरोप यह थे कि उसने कथित तौर पर कई पासपोर्ट आवेदनों में मनगढ़ंत आवासीय विवरणों का इस्तेमाल किया, जिसके परिणामस्वरूप पुलिस वेरिफिकेशन हुआ और बाद में पासपोर्ट रिन्यू किए गए।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि इनमें से एक पासपोर्ट ऐसे व्यक्ति के लिए रिन्यू किया गया था जो कथित तौर पर आंध्र प्रदेश एटीएस द्वारा वांटेड है। कोर्ट ने कहा कि अगर मुकदमे के दौरान आरोप साबित हो जाते हैं, तो वे "सामान्य आपराधिक कदाचार से परे" होंगे और देश की सुरक्षा और संप्रभुता के लिए हानिकारक कृत्यों से संबंधित होंगे।
जस्टिस नागप्रसन्ना ने कानूनी लिपिकीय कार्य करने वाले ट्रैवल एजेंट और कथित तौर पर मनगढ़ंत दस्तावेजों के उपयोग की सुविधा देने वाले एजेंट के बीच अंतर स्पष्ट किया। कोर्ट ने कहा कि एजेंट ने जानबूझकर ऐसा किया या लापरवाही से, यह मुकदमे के दौरान तय किया जाने वाला मामला है, न कि कार्यवाही रद्द करने की याचिका पर विचार करने के चरण में।
हाईकोर्ट ने आगे कहा कि जहां आरोप राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित हों, वहां विकलांगता या व्यक्तिगत कठिनाई आपराधिक मुकदमे को समाप्त करने का आधार नहीं हो सकती।
पुलिसकर्मी की भूमिका पर भी कोर्ट सख्त
फैसले में एक पुलिस कांस्टेबल की भूमिका का भी उल्लेख किया गया, जिसने कथित तौर पर झूठे पतों के आधार पर कई पासपोर्ट आवेदनों के लिए वेरिफिकेशन को मंजूरी दी थी। कोर्ट ने राज्य को याद दिलाया कि संबंधित अधिकारी पर मुकदमा चलाने के लिए तुरंत मंजूरी देने पर विचार किया जाए।
कोर्ट ने टिप्पणी की, "कोई भी व्यक्ति, चाहे वह निजी नागरिक हो, मध्यस्थ हो या लोक सेवक, जो राष्ट्रीय हित के खिलाफ कृत्यों में मदद करता है या लापरवाही से उन्हें संभव बनाता है, उसे कानून के दायरे में लाया जाना चाहिए।"
कानून के मुताबिक चलेगा मुकदमा
याचिका को खारिज करते हुए, हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि आपराधिक मुकदमा कानून के अनुसार आगे बढ़ेगा और यह भी स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियां केवल मामले को रद्द करने की याचिका पर निर्णय लेने तक ही सीमित हैं और मामले का गुण-दोष के आधार पर फैसला करते समय ट्रायल कोर्ट को प्रभावित नहीं करेंगी।
यह मामला पासपोर्ट से संबंधित धोखाधड़ी पर न्यायिक जोर को रेखांकित करता है, खासकर जहां राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कथित लिंक शामिल हों।
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