PM CARES फंड में जमा ₹8,452 करोड़ का रहस्य क्या है? बैंक में पड़े अरबों रुपये और FCRA की छूट के पीछे आखिर क्या है पर्दे के पीछे का पूरा सच? अभिजीत डिपके और विपक्ष के निशाने पर आया फंड-क्या है पूरी कहानी? जानिए क्यों मची है सियासत में खलबली!
PM CARES Fund: कोरोना महामारी के दौर में आपात स्थितियों से निपटने के लिए बनाया गया PM CARES फंड एक बार फिर देश की राजनीति के केंद्र में आ गया है। हाल ही में सामने आए ऑडिट आंकड़ों के मुताबिक, मार्च 2025 तक इस ट्रस्ट का फंड बढ़कर लगभग 8,452 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। इतनी भारी-भरकम राशि के बैंक में जमा रहने और विकास कार्यों में इसके कम इस्तेमाल को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और विपक्षी दलों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
₹8,452 करोड़ का बैलेंस…और सवाल यहीं से शुरू हुआ
PM CARES फंड को लेकर ताजा बहस तब तेज हुई जब CJP के फाउंडर अभिजीत डिपके ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो के जरिए फंड में जमा रकम के इस्तेमाल पर सवाल उठाया। डिपके ने करीब ₹8,452 करोड़ के क्लोजिंग बैलेंस का हवाला देते हुए कहा कि इस राशि का इस्तेमाल सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं सुधारने के लिए किया जा सकता है। उन्होंने खराब सड़क, स्कूलों में बेंच और पीने के पानी जैसी समस्याओं का जिक्र करते हुए पूछा कि नागरिकों से मिले इस पैसे का लाभ बच्चों और आम लोगों तक क्यों नहीं पहुंचना चाहिए। उनके तर्क के मुताबिक, यदि एक मॉडल स्कूल तैयार करने में करीब ₹8 करोड़ खर्च होते हैं, तो सैद्धांतिक रूप से इस राशि से 1,000 से अधिक स्कूलों को सहायता दी जा सकती है। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि PM CARES का घोषित उद्देश्य सामान्य स्कूल इंफ्रास्ट्रक्चर फंडिंग नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल, आपदा और संकट के समय राहत एवं सहायता देना है।
विपक्ष ने उठाया बैलेंस शीट और ऑडिट का मुद्दा
डिपके के सवाल के बाद विपक्षी नेताओं ने भी PM CARES की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाए। TMC सांसद महुआ मोइत्रा ने फंड की बैलेंस शीट, ऑडिट और CAG, RTI तथा संसदीय जांच से जुड़े मुद्दे उठाए। वहीं UP कांग्रेस के प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने कोविड काल में जुटाई गई रकम और फंड में बड़े कॉरपोरेट दान को लेकर आरोप लगाए। उन्होंने PM CARES को लेकर FCRA व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए और फंड में योगदान देने वाली कंपनियों को सरकारी टेंडर मिलने के आरोपों की जांच की मांग की। इन आरोपों को आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए; उपलब्ध सामग्री में इनके आधार पर किसी निष्कर्ष या दोषसिद्धि की बात नहीं है।
आखिर PM CARES फंड है क्या?
PM CARES की स्थापना 27 मार्च 2020 को कोविड-19 महामारी के दौरान हुई थी। इसे एक पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट के रूप में स्थापित किया गया था। इसके घोषित उद्देश्यों में सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल और अन्य आपदाओं या संकट की परिस्थितियों में राहत देना शामिल है। इसके तहत स्वास्थ्य ढांचे, फार्मास्युटिकल सुविधाओं, रिसर्च और प्रभावित लोगों को आर्थिक सहायता जैसी गतिविधियां भी आती हैं। प्रधानमंत्री इसके पदेन चेयरमैन हैं। रक्षा, गृह और वित्त मंत्री पदेन ट्रस्टी हैं। इसके अलावा प्रधानमंत्री द्वारा नामित ट्रस्टी भी ट्रस्ट का हिस्सा हैं। फंड का कहना है कि इसे स्वैच्छिक योगदान मिलता है और इसे सरकारी बजट से वित्तीय सहायता नहीं मिलती।
₹10,990 करोड़ से ₹8,452 करोड़ तक...रकम का सफर
PM CARES की वित्तीय स्थिति भी मौजूदा बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वित्त वर्ष 2020-21 में नए योगदान और ब्याज समेत फंड की कुल प्राप्तियां करीब ₹10,990.17 करोड़ बताई गई थीं। मार्च 2025 तक क्लोजिंग बैलेंस करीब ₹8,452.06 करोड़ बताया गया। यही आंकड़ा अब सवालों के घेरे में है-आलोचक पूछ रहे हैं कि इतनी बड़ी राशि उपलब्ध होने के बावजूद इसे तेजी से खर्च क्यों नहीं किया जा रहा। लेकिन फंड में मौजूद पूरी राशि को तत्काल खर्च किया जाना जरूरी है या नहीं, यह उसके ट्रस्ट डीड, निर्धारित उद्देश्यों और भविष्य की आपात जरूरतों से जुड़ा सवाल भी है।
कोविड में कहां खर्च हुआ था पैसा?
PM CARES ने कोविड संकट के दौरान बड़े स्तर पर फंड आवंटित किया था। मई 2020 में करीब ₹3,100 करोड़ के आवंटन की घोषणा की गई थी। इसमें लगभग ₹2,000 करोड़ 50,000 मेड-इन-इंडिया वेंटिलेटर्स के लिए, ₹1,000 करोड़ प्रवासी मजदूरों की सहायता और ₹100 करोड़ वैक्सीन विकास के लिए निर्धारित किए गए थे। बाद में फंड से वेंटिलेटर, वैक्सीन, ऑक्सीजन प्लांट, अस्थायी अस्पतालों और लैब इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे कोविड संबंधी कार्यों पर खर्च किया गया।
अब FCRA ने क्यों बढ़ाई राजनीतिक गर्मी?
PM CARES विवाद का सबसे अहम और तकनीकी पहलू FCRA यानी Foreign Contribution Regulation Act है। PM CARES की वेबसाइट के अनुसार, फंड को FCRA के तहत छूट प्राप्त है और इसके जरिए विदेशों में रहने वाले लोगों तथा संस्थाओं से विदेशी योगदान प्राप्त किया जा सकता है। यही व्यवस्था अब व्यापक FCRA बहस से जुड़ गई है।
FCRA संशोधन बिल ने बढ़ाया विवाद
मार्च 2026 में पेश किया गया Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026 भी विपक्ष के विरोध के बीच चर्चा में आया। 12 अगस्त को लोकसभा ने इसे 31 सदस्यों वाली संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेज दिया। प्रस्तावित बदलावों में एक ‘Designation Authority’ बनाने की बात है। इसका उद्देश्य उन संस्थाओं की विदेशी चंदे से खरीदी गई संपत्तियों से संबंधित व्यवस्था तय करना है, जिनका FCRA रजिस्ट्रेशन समाप्त हो जाता है, वापस लिया जाता है या नवीनीकृत नहीं होता। विपक्ष का तर्क है कि प्रस्तावित व्यवस्था से सरकार को विदेशी फंड हासिल करने वाली संस्थाओं की संपत्तियों पर व्यापक अधिकार मिल सकते हैं। वहीं सरकार का कहना है कि विदेशी फंड के दुरुपयोग को रोकने और ऐसी संपत्तियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए बदलाव जरूरी हैं। महत्वपूर्ण बात: यह बिल अभी कानून नहीं बना है; इसकी जांच JPC कर रही है।
पैसा कितना है नहीं, जवाबदेही कितनी है?
PM CARES को लेकर मौजूदा विवाद सिर्फ ₹8,452 करोड़ के बैलेंस का सवाल नहीं है। इसके पीछे तीन बड़े मुद्दे हैं-फंड का इस्तेमाल, वित्तीय पारदर्शिता और FCRA के तहत विदेशी योगदान की व्यवस्था। आलोचक ज्यादा पारदर्शिता और सार्वजनिक जांच की मांग कर रहे हैं, जबकि फंड की व्यवस्था उसके घोषित उद्देश्यों और ट्रस्ट संरचना के तहत चलती है। इसलिए आने वाले समय में बहस का सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि PM CARES में जमा हजारों करोड़ रुपये का कितना हिस्सा कब और किन उद्देश्यों पर खर्च होता है-और उस खर्च की सार्वजनिक जवाबदेही किस स्तर तक सुनिश्चित की जाती है?


