BSP प्रमुख मायावती ने आकाश आनंद को फिर अपरिपक्व बताते हुए बीएसपी में साइडलाइन कर दिया है। यूपी में 2027 चुनाव से पहले अकेले दम पर चुनाव लड़ने की घोषणा और पारिवारिक कलह के बीच जानिए पार्टी का पूरा हाल।
Mayawati Action on Aakash Anand: बहुजन समाज पार्टी (BSP) के भीतर शक्ति संतुलन और उत्तराधिकार की जंग एक बार फिर बेहद दिलचस्प मोड़ पर आ पहुंची है। विदेश से MBA कर लौटे और कभी बसपा की अगली उम्मीद माने जाने वाले 31 वर्षीय आकाश आनंद की राजनीतिक स्थिति पर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं। 3 सितंबर को लखनऊ में हुई पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारियों की उच्चस्तरीय बैठक के बाद बसपा प्रमुख मायावती के एक बड़े बयान ने राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है। मायावती ने स्पष्ट कर दिया कि आकाश को फिलहाल पार्टी में कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं सौंपी जाएगी क्योंकि उन्हें अभी 'राजनीतिक परिपक्वता' हासिल करने की जरूरत है। पिछले तीन वर्षों में यह तीसरी बार है जब आकाश आनंद को शीर्ष भूमिका की चौखट से पीछे धकेला गया है। अगर आप बीएसपी की वेबसाइट खोलेंगे तो मायावती की मुस्कुराती तस्वीर के साथ 'चीफ नेशनल कोऑर्डिनेटर' के रूप में आकाश आनंद का नाम दिखेगा। थंबनेल्स में भी वही छाए रहते हैं। लेकिन ज़मीन पर कहानी कुछ और ही चल रही है। बैठक में आकाश खुद मौजूद नहीं थे, बल्कि उनके छोटे भाई ईशान आनंद को वहां देखा गया।

BSP Leadership: पार्टी की कमान मायावती के हाथ, आकाश पर फिर क्यों उठे सवाल?
BSP की आधिकारिक वेबसाइट पर पार्टी के नेतृत्व की तस्वीर काफी स्पष्ट है। मायावती अध्यक्ष हैं, उनके भाई आनंद कुमार उपाध्यक्ष हैं और आनंद कुमार के बेटे आकाश आनंद को ‘चीफ नेशनल कोऑर्डिनेटर’ के तौर पर दिखाया गया है। पिछले कुछ वर्षों में आकाश पार्टी के सबसे प्रमुख युवा चेहरों में शामिल रहे हैं। यही वजह है कि उनकी भूमिका में होने वाला हर बदलाव सिर्फ पारिवारिक मामला नहीं, बल्कि BSP के भविष्य और उत्तराधिकार की राजनीति से जोड़कर देखा जाता है। 3 सितंबर की बैठक में आकाश आनंद मौजूद नहीं थे, जबकि उनके छोटे भाई ईशान आनंद वहां मौजूद रहे। इस एक तस्वीर ने भी पार्टी के अगले नेतृत्व को लेकर चर्चाओं को हवा दे दी है।

लखनऊ बैठक से मायावती का बड़ा संदेश: 2027 चुनाव अकेले लड़ेगी बीएसपी
70 साल की मायावती ने साफ कर दिया कि पार्टी अब देश भर में किसी के साथ गठबंधन नहीं करेगी। यूपी में कुछ ही महीनों में उप-चुनाव और आगे विधानसभा चुनाव हैं। पंजाब में भी चुनाव होने हैं जहां 32% दलित आबादी है। इस समय बीएसपी की हालत यह है कि यूपी में उसका एक भी विधायक नहीं है और लोकसभा में शून्य सीटें हैं, बस राज्यसभा में एक सांसद (रामजी गौतम) हैं। मायावती ने स्पष्ट किया कि 2027 के यूपी चुनाव में उम्मीदवारों के चयन से लेकर फंड और कैंपेनिंग की पूरी कमान वह खुद संभालेंगी। उन्होंने कांशीराम का उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे साहब कांशीराम अपने परिवार को काम करने देते थे लेकिन पद या चुनाव लड़ने से दूर रखते थे, वही सिद्धांत वे भी अपना रही हैं।

उत्तराधिकार के चक्रव्यूह में उलझा भविष्य
यह पूरा घटनाक्रम केवल पद छीनने या देने तक सीमित नहीं दिखता, बल्कि इसके पीछे गहरा सियासी सस्पेंस और पारिवारिक ताना-बाना नजर आ रहा है। बैठक के दौरान आकाश आनंद की अनुपस्थिति और उनके छोटे भाई ईशान आनंद की मौजूदगी ने नए कयासों को जन्म दे दिया है। जनवरी 2025 में मायावती के जन्मदिन पर पार्टी की गतिविधियों से जुड़ने वाले ईशान को अब भविष्य के एक नए विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। कांशीराम की मूल नीति-'रिश्तेदारों को चुनाव न लड़ाने और सीधे सत्ता पद न देने'-का हवाला देकर मायावती ने संकेत दिया है कि पार्टी का नेतृत्व किसी के लिए भी पक्का नहीं है।

Akash Anand Controversy: आकाश आनंद का बार-बार बाहर होना और वापसी का सिलसिला
2017 से राजनीति में उतरे आकाश आनंद को 2019 में नेशनल कोऑर्डिनेटर और 2023 में आधिकारिक उत्तराधिकारी बनाया गया था। लेकिन मई 2024 के लोकसभा चुनाव प्रचार में बीजेपी सरकार को "आतंकवादी और तालिबानी" कहने पर जब एफआईआर दर्ज हुई, तो मायावती ने उन्हें तुरंत पद से हटा दिया। आरोप यह भी लगे कि आकाश अपने ससुर (पूर्व बीएसपी नेता अशोक सिद्धार्थ) के असर में आकर पार्टी हित से ऊपर पारिवारिक हित रख रहे थे। चुनाव बीते, तो आकाश की वापसी हुई। लेकिन मार्च 2025 में फिर शो-कॉज़ नोटिस जारी कर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया और उन्हें "स्वार्थी और अहंकारी" तक कह दिया गया। हालांकि, X (ट्विटर) पर माफ़ी माँगने के बाद अप्रैल 2025 में वे फिर वापस आए और 'चीफ नेशनल कोऑर्डिनेटर' बनाए गए। हाल में उन्होंने रैलियों में बिना पढ़े जोशीले भाषण दिए, महंगाई पर सरकार को घेरा और युवाओं को जोड़ने की कोशिश की। पर अब फिर से उन पर ब्रेक लगा दिया गया है।

Dalit Vote in UP: BSP के सामने चंद्रशेखर और अखिलेश की चुनौती
मायावती की इस अंदरूनी खींचतान का असर पार्टी के वोट बैंक पर साफ़ दिख रहा है। चंद्रशेखर आज़ाद (ASP) युवाओं और आक्रामक दलित राजनीति के दम पर नगीना सीट जीतकर मजबूत विकल्प बन चुके हैं। वहीं अखिलेश यादव का PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूला और कांग्रेस का "आरक्षण बचाओ" का नारा बीएसपी के गैर-जाटव दलित वोटों में सेंध लगा रहा है। 2007 में बहुमत से सरकार बनाने वाली बीएसपी 2022 के यूपी चुनाव में सिर्फ 13% वोट और 1 सीट पर सिमट गई थी। 2024 के लोकसभा चुनाव में उसे यूपी में सिर्फ 9% वोट मिले। मायावती अब पुराने दलित-ब्राह्मण समीकरण को साधने के लिए सतीश चंद्र मिश्रा को आगे कर रही हैं, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि सवर्ण वोट बैंक का बड़ा हिस्सा बीजेपी के साथ है।

Mayawati Succession Plan: आकाश के बाद ईशान आनंद की चर्चा क्यों?
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ध्यान खींचने वाली बात आकाश आनंद के छोटे भाई ईशान आनंद की मौजूदगी है। जनवरी 2025 में मायावती के जन्मदिन पर राजनीति में कदम रखने वाले ईशान को भले ही अभी कोई बड़ा पद न मिला हो, लेकिन आकाश की गैर-मौजूदगी में उनका दिखना बड़े राजनीतिक बदलाव की ओर इशारा कर रहा है। फिलहाल, आधिकारिक रिकॉर्ड में आकाश आनंद बीएसपी के "युवा और दूरदर्शी नेता" बने हुए हैं, लेकिन मायावती के इस ताज़ा फैसले ने बीएसपी के कार्यकर्ताओं और राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर सस्पेंस बढ़ा दिया है।


