FSSAI Action on Priyagold: प्रियागोल्ड और दो अन्य कंपनियों पर बिस्कुट में जानवरों का चारा (कैटल फीड ब्रान) मिलाने के आरोप लगे हैं। इस मामले के बाद फूड सेफ्टी और क्वालिटी पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं। वहीं, त्योहारी सीजन को देखते हुए FSSAI ने भी अपनी जांच तेज कर दी है।
Priyagold Biscuit Controversy: जब भी हल्की भूख लगती है, तो सबसे पहले बिस्कुट की याद आती है। बच्चों के लंच बॉक्स से लेकर ऑफिस के बैग तक, बिस्कुट हर जगह मौजूद रहता है। कई लोग तो अपने दिन की शुरुआत ही चाय और बिस्कुट (फूड) के साथ करते हैं। लेकिन जरा सोचिए, अगर रोज खाए जाने वाले इसी बिस्कुट की क्वालिटी पर सवाल उठने लगें, तो क्या होगा?
फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) की कानूनी कार्रवाई के बाद प्रियागोल्ड जांच के घेरे में आ गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, दो अन्य कंपनियों पर भी एक्शन लिया गया है। यह पूरा मामला बिस्कुट में जानवरों को खिलाए जाने वाले चोकर (कैटल-फीड ब्रान) के कथित इस्तेमाल से जुड़ा है। इसके बाद से फूड इंग्रेडिएंट्स, मैन्युफैक्चरिंग स्टैंडर्ड और ग्राहकों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं。
हालांकि, अभी तक इस कार्रवाई की सटीक वजह, बाकी दो कंपनियों के नाम और केस के मौजूदा स्टेटस की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो पाई है। इसलिए, इन आरोपों को अभी खाने में मिलावट का पक्का सबूत नहीं माना जाना चाहिए।
बिस्कुट में कैटल-फीड ब्रान मिलने पर बवाल क्यों?
ब्रान यानी चोकर अनाज की बाहरी परत होती है, जिसे पिसाई के दौरान अलग किया जाता है। गेहूं के चोकर का इस्तेमाल आमतौर पर जानवरों के चारे में होता है। लेकिन क्वालिटी और फूड स्टैंडर्ड्स के हिसाब से इसे इंसानों के खाने वाली चीजों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
इसलिए 'कैटल-फीड ब्रान' शब्द को थोड़ा ध्यान से समझने की जरूरत है। अगर कोई चोकर जानवरों को खिलाया जाता है, तो इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि वह इंसानों के लिए खतरनाक है। यह पूरी तरह से चोकर के सोर्स, उसकी क्वालिटी, रखरखाव और फूड स्टैंडर्ड्स के नियमों पर निर्भर करता है।
यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि बिस्कुट में जिस चोकर के इस्तेमाल का आरोप लगा है, क्या वह इंसानों के खाने लायक था? क्या कानूनी तौर पर इसकी इजाजत थी? अगर सिर्फ जानवरों के लिए बने चारे का इस्तेमाल किसी फूड प्रोडक्ट में हुआ है, तो रेगुलेटर्स को कोई भी फैसला लेने से पहले मैन्युफैक्चरिंग रिकॉर्ड और लैब रिपोर्ट की बारीकी से जांच करनी होगी।
प्रियागोल्ड के लिए FSSAI की कार्रवाई का क्या मतलब है?
FSSAI भारत का राष्ट्रीय फूड रेगुलेटर है। यह संस्था वैज्ञानिक आधार पर फूड सेफ्टी के नियम तय करती है। साथ ही, यह सुनिश्चित करती है कि फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट, 2006 और इससे जुड़े नियमों का सही से पालन हो।
हालात के हिसाब से रेगुलेटरी कार्रवाई में इंस्पेक्शन, सैंपलिंग, नोटिस, जांच या कानूनी प्रक्रिया शामिल हो सकती है। लेकिन सिर्फ कार्रवाई होने का मतलब यह नहीं है कि कंपनी को नियमों के उल्लंघन का दोषी मान लिया गया है।
प्रियागोल्ड के मामले में भी किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले कई चीजों की पुष्टि होना बाकी है। जैसे- कंपनी को क्या नोटिस मिला है, किन बिस्कुट प्रोडक्ट्स पर सवाल उठे हैं और किन कानूनी धाराओं के तहत कार्रवाई हुई है। यही बात उन दो अन्य कंपनियों पर भी लागू होती है, जिनका नाम इस मामले में सामने आ रहा है।
ग्राहकों के नजरिए से देखें, तो यह मामला पैकेटबंद खाने की जांच और उसमें इस्तेमाल होने वाली चीजों की सही जानकारी होने की अहमियत को बताता है। कंपनियों से यह उम्मीद की जाती है कि वे अपने प्रोडक्ट्स में इस्तेमाल होने वाले इंग्रेडिएंट्स की सेफ्टी और क्वालिटी के नियमों का सख्ती से पालन करें।
FSSAI ने फूड सेफ्टी को लेकर जांच तेज की
बिस्कुट से जुड़ी यह कार्रवाई ऐसे समय में सामने आई है, जब भारत में फूड सेफ्टी के नियमों को सख्त करने की कोशिशें तेज हो गई हैं।
29 सितंबर 2026 को FSSAI ने अपनी ऑफिशियल एडवाइजरी में त्योहारी सीजन के लिए एक स्पेशल ड्राइव की जानकारी दी थी। इसका मकसद फूड सेफ्टी, क्वालिटी बनाए रखना और मिलावट को रोकना था। 6 अक्टूबर को हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट में बताया गया कि रेगुलेटर ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की फूड सेफ्टी अथॉरिटीज को त्योहारी सीजन से पहले निगरानी बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। इसके तहत बड़े बाजारों में फूड टेस्टिंग के लिए 'फूड सेफ्टी ऑन व्हील्स' मोबाइल लैब भी तैनात की गई हैं।
इसके अलावा, 17 मार्च 2026 को प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) द्वारा जारी केंद्र सरकार के एक जवाब में बताया गया कि 2022-23 से 2024-25 के बीच 5,18,559 फूड सैंपल्स की जांच की गई। इसी दौरान 88,192 मामलों में जुर्माना लगाया गया, 3,614 मामलों में सजा हुई और 1,161 लाइसेंस रद्द किए गए।
ये आंकड़े बताते हैं कि देश में फूड सेफ्टी को लेकर कितने बड़े स्तर पर काम हो रहा है। हालांकि, इनसे बिस्कुट वाले मामले का कोई सीधा नतीजा नहीं निकलता। असली सवाल अभी भी यही है कि क्या प्रोडक्ट्स में इस्तेमाल हुआ सामान फूड स्टैंडर्ड्स के खिलाफ था? और संबंधित अथॉरिटीज की जांच में आखिर क्या निकलकर सामने आता है।






