Shocking Gwalior Tragedy: 5 दिन तक घर में पड़ा रहा मां का शव, मानसिक रूप से कमजोर बेटे-बेटी समझ ही नहीं पाए कि उनकी दुनिया खत्म हो चुकी है। पुलिस जांच में सामने आई दर्दनाक पारिवारिक कहानी। क्या अकेलापन और सामाजिक दूरी बनी इस दर्दनाक घटना की असली वजह?
Gwalior Tragedy News: मध्यप्रदेश के ग्वालियर शहर से एक ऐसी दर्दनाक घटना सामने आई है, जिसने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया है। यह मामला सिर्फ एक मां की मौत का नहीं है, बल्कि यह मानसिक दिव्यांग बच्चों, सामाजिक दूरी और अकेलेपन की भी कहानी है। पांच दिन तक एक मां का शव घर के कमरे में पड़ा रहा, लेकिन उसके बेटे-बेटी को यह समझ ही नहीं आया कि उनकी मां अब इस दुनिया में नहीं रहीं।
कौन थीं उर्मिला भदौरिया?
उर्मिला भदौरिया, जो कभी ग्वालियर के टोपी बाजार में गाना गाकर परिवार चलाती थीं, ने जिंदगी में बहुत संघर्ष देखा। करीब 45 साल पहले उनकी शादी सुरेंद्र सिंह भदौरिया से हुई थी। परिवार में बेटा अखंड प्रताप सिंह (40) और बेटी रितु भदौरिया (38) हैं। बेटा एमटेक तक पढ़ा और बेटी ने बीएससी की पढ़ाई की। लेकिन पिता की मौत का गहरा असर दोनों बच्चों के मन पर पड़ा। धीरे-धीरे वे मानसिक रूप से कमजोर होते चले गए।
5 दिन तक घर में सड़ता रहा शव, किसी को खबर क्यों नहीं लगी?
कुछ दिन पहले उर्मिला की तबीयत बिगड़ी। घर में उनकी देखभाल करने वाला कोई और नहीं था। बीमारी के दौरान ही करीब 5 दिन पहले उनका निधन हो गया। लेकिन मानसिक रूप से कमजोर बेटे और बेटी यह समझ नहीं पाए कि उनकी मां की सांसें थम चुकी हैं। वे पांच दिन तक उसी घर में, उसी कमरे में मां के निर्जीव शरीर के पास घूमते रहे। घर से तेज दुर्गंध आने लगी तो आसपास के लोगों को शक हुआ। पुलिस को सूचना दी गई। पुलिस जब मौके पर पहुंची तो करीब 50 मीटर दूर से ही बदबू महसूस हो रही थी। पुलिसकर्मियों को मास्क लगाकर घर में प्रवेश करना पड़ा। कमरे का दृश्य देखकर सभी की आंखें नम हो गईं। शव में कीड़े पड़ चुके थे।

5 दिन तक घर में सड़ता रहा शव, किसी को खबर क्यों नहीं लगी?
कुछ दिन पहले उर्मिला की तबीयत बिगड़ी और करीब 5 दिन पहले उनका निधन हो गया। लेकिन मानसिक रूप से कमजोर बेटा-बेटी यह समझ ही नहीं पाए कि उनकी मां अब नहीं रही। पांच दिन तक मां का शव कमरे में पड़ा रहा। हालत इतनी खराब हो गई कि शव में कीड़े पड़ गए। बच्चे उसी कमरे में इधर-उधर घूमते रहे, रोते रहे, लेकिन किसी को सूचना नहीं दी। जब मोहल्ले में तेज बदबू फैलने लगी तो पुलिस को खबर दी गई। पुलिस जब मौके पर पहुंची तो मास्क लगाकर घर में दाखिल हुई। कमरे का दृश्य देखकर सबकी आंखें नम हो गईं।
पिता की मौत के बाद क्यों टूट गया परिवार?
साल 2010 में पिता सुरेंद्र सिंह का निधन हुआ था। इस घटना ने बच्चों को गहरा सदमा दिया। कहा जाता है कि उसी के बाद दोनों मानसिक रूप से अस्थिर हो गए। उर्मिला को अनुकंपा नियुक्ति पर शिक्षा विभाग में क्लर्क की नौकरी मिली। उन्होंने अकेले ही घर की आर्थिक और भावनात्मक जिम्मेदारी उठाई। लेकिन समाज के तानों और हालात ने परिवार को धीरे-धीरे लोगों से दूर कर दिया।
क्या समाज की दूरी और मदद की कमी इस त्रासदी की वजह बनी?
यह घटना कई सवाल खड़े करती है। क्या परिवार को समय पर मानसिक सहारा मिला होता तो हालात ऐसे होते? क्या पड़ोस या समाज का थोड़ा ध्यान इस दर्दनाक स्थिति को टाल सकता था? उर्मिला ने पूरी जिंदगी अपने बच्चों के लिए संघर्ष किया, लेकिन आखिर में वे अकेली पड़ गईं। यह मामला सिर्फ एक ग्वालियर दर्दनाक घटना नहीं है, बल्कि यह मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक जागरूकता और पारिवारिक सहयोग की अहमियत को भी सामने लाता है। जरूरत है कि ऐसे परिवारों पर समाज और प्रशासन दोनों संवेदनशील नजर रखें, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं दोहराई न जाएं।


