बिहार के सारण के 24 वर्षीय किशु सिंह ने 14 प्रयासों के बाद CDS और SSB में सफलता हासिल कर भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट बनने का सपना पूरा किया। 2011 में ‘Border’ फिल्म से प्रेरित हुए किशु ने असफलताओं के बावजूद तैयारी जारी रखी।
कभी क्रिकेट विश्व कप की जीत ने दिल में देशभक्ति जगाई, फिर एक फिल्म ने उस सपने को दिशा दे दी। लेकिन बिहार के सारण जिले के 24 वर्षीय किशु सिंह के लिए भारतीय सेना में अफसर बनने का सपना सिर्फ जुनून की कहानी नहीं, बल्कि 14 कोशिशों, लगातार असफलताओं और परिवार के अटूट भरोसे की परीक्षा बन गया।
किशु ने NDA समेत डिफेंस फोर्सेज में प्रवेश के लिए कई परीक्षाएं दीं। कई बार लिखित परीक्षा के बाद SSB के स्तर पर उन्हें असफलता मिली। उम्र सीमा पार होने के बाद उन्होंने CDS और AFCAT पर फोकस किया। आखिरकार मई में CDS परीक्षा और उसके बाद SSB प्रक्रिया में सफलता हासिल कर वह इस साल भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट बने।
2011 में देखा था सेना में जाने का सपना
किशु के मन में सेना में जाने का सपना साल 2011 में आया। उस वक्त वह सिर्फ नौ साल के थे और भारत ने घरेलू मैदान पर क्रिकेट विश्व कप जीता था। इस जीत ने उनके भीतर देश के लिए कुछ करने की इच्छा पैदा की। इसके करीब चार महीने बाद स्वतंत्रता दिवस के आसपास उन्होंने टीवी पर फिल्म 'Border' देखी। फिल्म में अक्षय खन्ना द्वारा निभाए गए सेकेंड लेफ्टिनेंट धर्मवीर के किरदार ने किशु को खास तौर पर प्रभावित किया। उन्होंने बताया कि उसी समय उन्होंने तय कर लिया था कि वह भारतीय सेना में अधिकारी बनेंगे। बचपन में लिया गया यह फैसला आगे चलकर उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा लक्ष्य बन गया।
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NDA में कई बार असफलता, फिर CDS की राह
इसके साथ उन्होंने Air Force Common Admission Test (AFCAT) की भी तैयारी की। उनकी सबसे बड़ी चुनौती लिखित परीक्षा से ज्यादा SSB इंटरव्यू रही। इसी चरण में उन्हें बार-बार असफलता मिली। किशु के मुताबिक, हर असफलता के बाद उन्होंने खुद से सवाल किया कि कमी कहां रह गई। उन्होंने अपनी गलतियों पर विचार किया और हर प्रयास में खुद को बेहतर करने की कोशिश की।
SSB में 14वीं कोशिश में मिली सफलता
किशु की कहानी का सबसे बड़ा मोड़ उनका 14वां प्रयास रहा। SSB इंटरव्यू में कई बार असफल होने के बाद उन्होंने अपने व्यक्तित्व और इंटरव्यू के तरीके पर गंभीरता से काम किया। उनके अनुसार, उन्होंने खुद को किसी बनावटी तरीके से पेश करने के बजाय अपनी खूबियों और कमजोरियों को ईमानदारी से समझना शुरू किया। उनका मानना है कि इंटरव्यू के दौरान अधिक स्वाभाविक और ईमानदार रहने से उन्हें सफलता मिली। आखिरकार मई में CDS परीक्षा पास करने के बाद चयन प्रक्रिया पूरी की और भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट बनने का सपना पूरा किया।
सुबह 5-6 घंटे मैथ्स, फिर अंग्रेजी और बाकी विषय
किशु की तैयारी भी उतनी ही अनुशासित रही। लिखित परीक्षा के दौरान वह सुबह करीब 5 से 6 घंटे गणित को देते थे। इसके बाद लगभग दो घंटे अंग्रेजी और फिर 4 से 5 घंटे अन्य विषयों की तैयारी करते थे। पढ़ाई के साथ उन्होंने शारीरिक अभ्यास भी जारी रखा। उनके लिए तैयारी का मतलब सिर्फ किताबों तक सीमित रहना नहीं था। लिखित परीक्षा के साथ SSB की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए उन्होंने खुद को लगातार तैयार किया।
हर असफलता के बाद परिवार ने बढ़ाया हौसला
किशु की सफलता में उनके परिवार की भूमिका भी खास रही। उनके पिता और बड़े भाई कारोबार से जुड़े हैं। किशु के मुताबिक, परिवार ने उन्हें सिखाया कि चुनौती कितनी भी बड़ी क्यों न हो, उसका सामना शांत दिमाग से करना चाहिए और हार नहीं माननी चाहिए। SSB में असफल होने के बाद जब वह घर लौटते थे, तब भी परिवार ने उनका मनोबल गिरने नहीं दिया।
किशु ने बताया कि हर बार उनके पिता ट्रेन के बजाय फ्लाइट से लौटने के लिए कहते थे। एयरपोर्ट पर परिवार मिठाई लेकर उनका स्वागत करता था, ताकि असफलता का असर उनके हौसले पर न पड़े। यही समर्थन किशु के लिए उस दौर में ताकत बना, जब लगातार कोशिशों के बावजूद मंजिल दूर नजर आ रही थी।
सफलता मिली तो भी परिवार ने नहीं मनाया बड़ा जश्न
CDS और SSB में सफलता मिलने के बाद परिवार ने तुरंत बड़ा जश्न नहीं मनाया। किशु के चयन के बाद मेडिकल परीक्षा और अन्य औपचारिक प्रक्रियाएं बाकी थीं। इसलिए परिवार ने अंतिम प्रक्रिया पूरी होने तक इंतजार करना बेहतर समझा। आज किशु सिंह की कहानी उन युवाओं के लिए मिसाल है, जो प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार असफल होने के बाद खुद पर शक करने लगते हैं।
14 प्रयासों के बाद मिली सफलता यह दिखाती है कि हर असफलता अंत नहीं होती। कभी-कभी वही असफलताएं यह समझने का मौका देती हैं कि कमी कहां है और अगली कोशिश में क्या बदलना चाहिए। किशु के लिए 2011 में देखा गया सपना 14 साल बाद पूरा हुआ। क्रिकेट विश्व कप की जीत और एक फिल्म से शुरू हुआ सपना आखिरकार भारतीय सेना की वर्दी तक पहुंच गया।
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