Punjab Assembly E20: पंजाब विधानसभा ने E20 पेट्रोल के खिलाफ प्रस्ताव पास किया है। इस बीच किसान और मक्का का मुद्दा भी अहम हो गया है। जानिए क्या है पूरा मामला...

Punjab E20 Resolution: पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाने की केंद्र की नीति को लेकर पंजाब में सियासत गर्म है। पंजाब विधानसभा ने E20 पेट्रोल की अनिवार्य व्यवस्था के खिलाफ प्रस्ताव पास किया है। मुख्यमंत्री भगवंत मान की अगुआई वाली सरकार ने इस नीति को लेकर गाड़ियों के माइलेज, इंजन और वाहन मालिकों की चिंता सामने रखी है। लेकिन इस पूरे विवाद का एक दूसरा पहलू भी है, जो पंजाब के किसानों, मक्का, गन्ना, MSP और ग्रामीण बाजार से जुड़ा है। ऐसे में सवाल ये है कि अगर E20 के खिलाफ पंजाब का विरोध आगे बढ़ता है, तो क्या इसका असर उन किसानों पर भी पड़ सकता है, जो एथेनॉल इंडस्ट्री के लिए फसल तैयार कर रहे हैं?

पंजाब में E20 को लेकर विवाद आखिर है क्या?

E20 का मतलब ऐसा पेट्रोल जिसमें 20% एथेनॉल मिलाया जाता है। केंद्र सरकार पेट्रोल में एथेनॉल की हिस्सेदारी बढ़ाने की नीति पर काम कर रही है। इसका मकसद कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना, घरेलू स्तर पर तैयार फ्यूल का इस्तेमाल बढ़ाना और एथेनॉल के लिए एक बड़ा बाजार तैयार करना है। पंजाब सरकार और आम आदमी पार्टी ने इस नीति पर सवाल उठाए हैं। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने E20 ब्लेंडिंग को लेकर चिंता जताई है। पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने भी केंद्र की नीति पर सवाल उठाते हुए उपभोक्ताओं, वाहन मालिकों और राज्य के हितों को लेकर चिंता जाहिर की है।

आम आदमी पार्टी का तर्क क्या है?

AAP की तरफ से यह तर्क दिया जा रहा है कि E20 से वाहनों के माइलेज और इंजन पर असर पड़ सकता है और इसे लेकर वाहन मालिकों की चिंताओं को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन इसी बहस में एक दूसरा सवाल भी खड़ा होता है कि अगर एथेनॉल की मांग कम होती है तो उन किसानों का क्या होगा जिनकी फसल इस इंडस्ट्री के लिए बाजार तैयार करती है?

E20 का किसान से क्या कनेक्शन है?

एथेनॉल बनाने के लिए कृषि क्षेत्र से मिलने वाले कई कच्चे माल का इस्तेमाल किया जाता है। इनमें मक्का और गन्ना प्रमुख हैं। जब देश में एथेनॉल की मांग बढ़ती है तो इन फसलों के लिए एक अतिरिक्त बाजार तैयार होता है। इसका मतलब है कि किसान के पास अपनी उपज बेचने का एक और रास्ता मौजूद रहता है। पंजाब के लिए यह बात इसलिए ज्यादा अहम है, क्योंकि राज्य लंबे समय से धान और गेहूं के चक्र से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा है। मक्का जैसी फसल को बढ़ावा देने से खेती का पैटर्न बदलने की उम्मीद की जाती रही है। और यही वह जगह है जहां E20 नीति को लेकर राजनीतिक बहस और जमीन पर किसान की जरूरतें एक-दूसरे से टकराती नजर आती हैं।

पंजाब को धान-गेहूं के चक्र से बाहर निकलने की जरूरत क्यों है?

पंजाब की खेती में धान और गेहूं का बड़ा रोल है। खासकर धान की खेती में पानी की जरूरत काफी ज्यादा होती है। लंबे समय से कृषि एक्सपर्ट पंजाब में ऐसी फसलों को बढ़ाने की बात करते रहे हैं जिनमें पानी की जरूरत कम हो और किसान को बाजार भी मिले। मक्का इस दिशा में एक विकल्प माना जाता है। लेकिन किसान सिर्फ यह देखकर फसल नहीं बदल सकता कि कोई फसल पानी कम लेती है। उसके सामने सबसे बड़ा सवाल होता है, फसल कहां और किस कीमत पर बिकेगी? यहीं पर एथेनॉल इंडस्ट्री की मांग अहम हो जाती है। अगर मक्का की मांग बनी रहती है तो किसान के लिए धान से अलग फसल चुनना थोड़ा आसान हो सकता है। लेकिन अगर बाजार अचानक कमजोर हो जाए तो किसान के लिए फसल बदलने का फैसला घाटे का सौदा बन सकता है।

मक्का की कीमत को लेकर क्यों जताई जा रही चिंता?

पंजाब में ट्रेड से जुड़े कुछ संगठनों ने E20 और एथेनॉल की मांग को लेकर चिंता जताई है। अमृतसर आढ़ती एसोसिएशन और क्षेत्र के कुछ ग्रेन मिलर्स से जुड़े दावों के मुताबिक, अगर एथेनॉल उत्पादन से मिलने वाली नियमित मांग कमजोर होती है तो मक्का की कीमत पर दबाव आ सकता है। इन दावों के अनुसार फिलहाल मक्का की कीमत करीब ₹2,100 से ₹2,200 प्रति क्विंटल के आसपास बताई जा रही है। आशंका जताई गई है कि मांग कमजोर होने पर यह कीमत करीब ₹1,500 प्रति क्विंटल तक गिर सकती है। अगर ऐसा होता है तो उन किसानों पर सीधा असर पड़ेगा जिन्होंने गेहूं और धान के बजाय मक्का जैसी फसल की तरफ कदम बढ़ाया है। हालांकि यह कीमतों का अनुमान है, निश्चित भविष्यवाणी नहीं। असली कीमत बाजार की मांग, उत्पादन, सरकारी नीति और दूसरी परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।

क्या E20 किसानों के लिए एक नया बाजार बना रहा है?

यही E20 नीति का सबसे अहम आर्थिक पहलू है। किसान के लिए सिर्फ MSP का ऐलान काफी नहीं होता। उसे अपनी फसल बेचने के लिए मजबूत और लगातार मांग भी चाहिए। अगर एथेनॉल प्लांट बड़ी मात्रा में मक्का खरीदते हैं तो यह मांग किसान को बाजार का भरोसा दे सकती है। इसे आप ऐसे समझिए कि फसल बदलने के लिए किसान को पानी की बचत के साथ बाजार की गारंटी भी चाहिए। अगर मक्का उगाने के बाद उसे बेचने वाला खरीदार नहीं मिला तो किसान दोबारा धान या गेहूं की तरफ लौट सकता है। इसलिए एथेनॉल सेक्टर को कुछ लोग फसल Diversification यानी खेती में बदलाव के लिए एक संभावित बाजार के तौर पर देखते हैं।

MSP और एथेनॉल की मांग में क्या कनेक्शन है?

MSP (Minimum Support Price) किसान के लिए एक तय न्यूनतम कीमत का सिस्टम है, लेकिन हर फसल में सरकारी खरीद का अनुभव एक जैसा नहीं होता है। मक्का जैसे विकल्पों में बाजार की मांग बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। अगर एथेनॉल इंडस्ट्री मक्का की खरीद बढ़ाती है तो किसानों को खुले बाजार में भी खरीदार मिल सकते हैं। इससे MSP के आसपास कीमत बनाए रखने में मदद मिल सकती है। लेकिन अगर बड़ी मात्रा में औद्योगिक मांग हट जाती है तो बाजार में उपलब्ध मक्का बढ़ सकता है और कीमत पर दबाव बन सकता है। यही कारण है कि E20 को लेकर हो रही बहस में MSP से आगे बढ़कर assured demand यानी पक्की बाजार मांग को भी समझना जरूरी है।

AAP का E20 विरोध और किसानों का सवाल

AAP ने E20 को लेकर केंद्र सरकार पर राजनीतिक हमला तेज किया है। पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भी इस मुद्दे को उठाया है और E20 नीति को लेकर प्रधानमंत्री को हस्ताक्षर अभियान तथा विरोध प्रदर्शन जैसे कदमों के जरिए घेरने की कोशिश की है। AAP का तर्क मुख्य रूप से उपभोक्ताओं और वाहन मालिकों की चिंता पर केंद्रित है। वहीं आलोचकों का सवाल है कि अगर E20 का विरोध किया जा रहा है तो उसके साथ किसानों के लिए वैकल्पिक बाजार की योजना क्या होगी? यानी बहस अब सिर्फ यह नहीं रह जाती कि E20 सही है या गलत। सवाल यह भी है कि अगर एथेनॉल की मांग कम होती है तो मक्का और दूसरी फसलों के किसानों को बाजार कौन देगा?