14 वर्षीय रेम्या जोस ने घरेलू समस्या के समाधान हेतु साइकिल से बिना बिजली की वॉशिंग मशीन बनाई। ₹2,000 की लागत वाली यह मशीन पैडल चलाने से कपड़े धोती और सुखाती है। इस सरल आविष्कार को राष्ट्रीय पहचान भी मिली।
कुछ बड़े आविष्कार हाई-टेक लैब में नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की मुश्किलों के आसान हल खोजने वाले दिमाग में जन्म लेते हैं। केरल की रेम्या जोस की कहानी इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। सिर्फ 14 साल की उम्र में उन्होंने एक आम साइकिल की मदद से बिना बिजली के चलने वाली सस्ती वॉशिंग मशीन बना दी थी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसे बनाने में सिर्फ करीब ₹2,000 का खर्च आया।
घर का काम बना आविष्कार की वजह
10वीं में पढ़ने वाली रेम्या के परिवार में उस समय काफी मुश्किलें थीं। उनकी मां बीमार थीं और पिता का कैंसर का इलाज चल रहा था। उन्हें स्कूल आने-जाने के लिए भी रोज़ लंबा सफ़र करना पड़ता था। इन सबके बीच, उन्हें अपनी जुड़वां बहन सौम्या के साथ घर के कपड़े धोने की ज़िम्मेदारी भी निभानी पड़ती थी। कपड़े धोने में बहुत ज़्यादा समय लगता था। इसी दौरान रेम्या ने ध्यान दिया कि बिजली वाली वॉशिंग मशीन का ड्रम कैसे घूमता है। उनके दिमाग में ख्याल आया कि क्या इसी तरह की हरकत साइकिल के पैडल से भी पैदा की जा सकती है?
साइकिल से वॉशिंग मशीन तक का सफर
साइकिल के पैडल, चेन और गियर इंसान की ताकत को घूमने वाली एनर्जी में बदलते हैं। इसी सिद्धांत का इस्तेमाल करके रेम्या ने कपड़े धोने का सिस्टम सोचा। उनके डिज़ाइन में एक मेटल की जाली वाला सिलेंडर, एक एल्यूमीनियम का बाहरी कवर और साइकिल जैसी सीट-पैडल की व्यवस्था थी। अपने पिता की मदद से उन्होंने एक लोकल ऑटोमोबाइल वर्कशॉप में इसके पार्ट्स बनवाए। खास बात यह है कि यह मशीन किसी लैब में नहीं, बल्कि एक आम मैकेनिक की दुकान पर बनी।
बस कुछ मिनट पैडल चलाओ और कपड़े साफ!
कपड़ों को ड्रम में डालकर पानी और वॉशिंग पाउडर मिलाया जाता था। फिर करीब 10 मिनट तक उन्हें भीगने के लिए छोड़ दिया जाता था। इसके बाद रेम्या लगभग 3 से 4 मिनट तक साइकिल के पैडल चलाती थीं। पैडल चलाने से ड्रम तेज़ी से घूमता था और कपड़े साबुन के पानी में अच्छी तरह धुल जाते थे। धोने के बाद गंदे पानी को निकालकर, साफ पानी भरकर कपड़ों को खंगाला भी जा सकता था। आखिर में, ड्रम को तेज़ी से घुमाकर कपड़ों का ज़्यादातर पानी निचोड़ा जा सकता था। रिपोर्ट के मुताबिक, कपड़े लगभग 80% तक सूखे हुए बाहर आते थे।
बिना बिजली वाले घरों के लिए एक बेहतरीन आइडिया
इस आविष्कार की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि इसमें मोटर, बिजली कनेक्शन या किसी मुश्किल इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम की ज़रूरत नहीं थी। नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन के रिकॉर्ड के मुताबिक, करीब ₹2,000 की लागत वाली इस मशीन को आसानी से कहीं भी ले जाया जा सकता था। साथ ही, पैडल चलाने से कसरत का फायदा भी मिलता था।
'नन्ही साइंटिस्ट' को मिली राष्ट्रीय पहचान
रेम्या का यह आविष्कार सिर्फ स्थानीय स्तर तक ही सीमित नहीं रहा। नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन ने इसे अपने रिकॉर्ड में शामिल किया। साल 2003 में “Washing Cum Exercise Machine” नाम से इसके लिए पेटेंट अर्जी भी दी गई। उनके इस आविष्कार को मीडिया में भी काफी सराहा गया।
समस्या पर रोने की बजाय, हल ढूंढ निकाला
रेम्या की कहानी सिर्फ इसलिए खास नहीं है कि उन्होंने कम उम्र में एक मशीन बनाई, बल्कि इसलिए है कि उन्होंने घर की एक समस्या को देखकर, अपने आसपास मौजूद एक आम सी चीज़ में उसका हल ढूंढ लिया। एक साइकिल के पैडल उनके लिए सिर्फ आने-जाने का ज़रिया नहीं थे, बल्कि उन्होंने दिखाया कि वही ताकत कपड़े धोने वाली मशीन भी चला सकती है। यह कहानी बताती है कि ज़रूरत, जिज्ञासा और सरल सोच मिल जाए तो बड़े आविष्कार हो सकते हैं।
