Saudi Arabia Crisis: लाल सागर में हूती संकट गहराने और पाकिस्तान से झटका मिलने के बाद सऊदी अरब मुश्किल में है। तेल निर्यात ठप होने के डर से अब 'दुश्मन' से मदद मांगी है।
Saudi Arabia Houthi Conflict: मिडिल ईस्ट में भू-राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। यमन के हूती विद्रोहियों ने लाल सागर के बड़े तटीय हिस्से और रणनीतिक रूप से अहम बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य पर कब्जा कर लिया है। इस अचानक हुए हमले ने दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातक देश सऊदी अरब के सामने गहरा आर्थिक और सुरक्षा संकट खड़ा कर दिया है। इस मुश्किल घड़ी में सऊदी अरब को अपने पारंपरिक सहयोगियों खासकर पाकिस्तान से बड़ा झटका लगा है। जिसके बाद रियाद को उस इजरायल से मदद मांगनी पड़ी, जिसे वह एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता तक नहीं देता है। जानिए क्या है पूरा मामला...
सऊदी पर संकट आया, तो पाकिस्तान पीछे हटा
सऊदी अरब को सबसे ज्यादा उम्मीद इस्लामाबाद से थी। पाकिस्तान न सिर्फ तुर्की और सऊदी अरब के बीच बने 'मक्का डिफेंस अलायंस' का हिस्सा है, बल्कि दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय रक्षा समझौता भी है। इसके बावजूद पाकिस्तान ने यमन में हूतियों के खिलाफ अपनी सेना या सैन्य संसाधन तैनात करने से साफ मना कर दिया। इस्लामाबाद ने स्पष्ट रुख अपनाया कि उसकी सेना सिर्फ सऊदी अरब की अपनी सीमा की रक्षा के लिए इस्तेमाल हो सकती है, किसी विदेशी जमीन पर जाकर युद्ध लड़ने के लिए नहीं।
अमेरिका के जरिए इजरायल से सीक्रेट संपर्क
पाकिस्तान, मिस्र और अन्य खाड़ी देशों से अपेक्षित सैन्य समर्थन न मिलने के बाद सऊदी क्राउन प्रिंस और प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने एक बड़ा कूटनीतिक दांव चला। तेल अवीव के प्रमुख अखबार द यरुशलम पोस्ट के अनुसार, अमेरिकी सेंट्रल कमांड (Centcom) की मध्यस्थता में सऊदी अरब और इजरायल के बीच गोपनीय बातचीत हुई। इजरायल ह्योम की रिपोर्ट बताती है कि सऊदी अरब ने बाब अल-मंडेब क्षेत्र में हूती खतरे से निपटने के लिए इजरायल से सीधे सैन्य मदद के बजाय 'इंटेलिजेंस सहायता' (खुफिया इनपुट) मांगी है। अमेरिका और ब्रिटेन ने भी यमन में जमीनी या बड़े हवाई हमलों से बचते हुए केवल मिलिट्री एडवाइजर और बेसिक खुफिया मदद तक ही खुद को सीमित रखा है।
सऊदी के तेल निर्यात पर क्यों लटकी तलवार?
हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर कई ड्रोन और मिसाइल हमलों के बाद जमीन पर तेज अभियान चलाया और सऊदी समर्थित 'नेशनल रेजिस्टेंस फ्रंट' को पीछे धकेल दिया। हूतियों ने बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य और उसके द्वीपों पर कब्जा जमा लिया है। इसे 'गेट ऑफ टीयर्स' (Gate of Tears) भी कहा जाता है। हूतियों ने साफ किया है कि लाल सागर से अन्य देशों और अमेरिकी जहाजों को सुरक्षित निकलने दिया जाएगा, लेकिन सऊदी जहाजों पर लगी पाबंदी सख्ती से जारी रहेगी। सऊदी अरब फारस की खाड़ी में ईरानी खतरे से बचने के लिए लाल सागर के इसी रूट का इस्तेमाल करता था। पाइपलाइनों पर हमले और इस समुद्री रास्ते के बंद होने से उसका कच्चा तेल निर्यात पूरी तरह ठप होने की कगार पर पहुंच गया है।
इजरायल का रुख क्या है?
2023 से लाल सागर में अपने जहाजों पर हूती हमलों का सामना कर चुका इजरायल मदद देने को लेकर बेहद सतर्क है। इजरायल अपनी भूमिका को सिर्फ खुफिया जानकारी तक सीमित रख सकता है, ताकि हूती विद्रोही इजरायली शहरों को अपनी मिसाइलों का निशाना न बनाने लगें। इजरायली अखबार हारेत्ज के अनुसार, इजरायली रक्षा बलों (IDF) ने सलाह दी है कि हूतियों के खिलाफ कोई भी सीधी कार्रवाई अकेले करने के बजाय एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय गठबंधन के तहत ही होनी चाहिए।


