क्या ट्रंप की ईरान युद्ध रणनीति पर उनकी अपनी पार्टी में बगावत शुरू हो गई है, जो 4 रिपब्लिकन डेमोक्रेट्स के साथ खड़े हो गए? क्या 90-दिन की कानूनी सीमा पार होने के बाद व्हाइट हाउस संवैधानिक संकट की ओर बढ़ रहा है? क्या बढ़ती गैस कीमतें और युद्ध की लागत अमेरिकी जनता को ट्रंप के खिलाफ कर सकती हैं?
US House Vote Iran Conflict: अमेरिकी राजनीति और वैश्विक कूटनीति के गलियारों में बुधवार को एक ऐसा सियासी भूचाल आया, जिसने व्हाइट हाउस की रातों की नींद उड़ा दी है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा (US House of Representatives) ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सैन्य शक्तियों को चुनौती देते हुए एक ऐतिहासिक 'युद्ध शक्ति प्रस्ताव' (War Powers Resolution) पास कर दिया है। 215 के मुकाबले 208 वोटों से पारित हुए इस प्रस्ताव का असली मकसद ईरान संघर्ष पर कांग्रेस (अमेरिकी संसद) के संवैधानिक अधिकार को फिर से स्थापित करना है। लेकिन इस वोटिंग ने जो सबसे बड़ा सस्पेंस खड़ा किया है, वह है ट्रंप की अपनी ही पार्टी में लगी 'बगावत की आग'।

आधी रात की बगावत: जब ट्रंप के अपने चार सिपहसालार ही छोड़ गए साथ
रिपब्लिकन पार्टी के भीतर सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है, और इस वोट ने इस कड़वे सच को दुनिया के सामने ला दिया। इस ऐतिहासिक प्रस्ताव को पास कराने के लिए सभी डेमोक्रेट्स एक सुर में खड़े थे, लेकिन सस्पेंस तब और गहरा गया जब चार रिपब्लिकन सांसदों ने अपनी ही पार्टी की लाइन और राष्ट्रपति ट्रंप के खिलाफ जाकर इस प्रस्ताव के समर्थन में वोट दे दिया।
मिशिगन के टॉम बैरेट, ओहियो के वॉरेन डेविडसन, पेंसिल्वेनिया के ब्रायन फिट्ज़पैट्रिक और केंटकी के थॉमस मैसी-ये वो चार नाम हैं जिन्होंने खुलेआम बगावत का बिगुल फूंका। हालांकि बाकी 208 रिपब्लिकन ट्रंप के साथ चट्टान की तरह खड़े रहे, लेकिन इन चार वोटों ने यह साबित कर दिया कि ईरान युद्ध को लेकर रिपब्लिकन कुनबे के भीतर एक बहुत बड़ी बेचैनी और असंतोष जन्म ले चुका है, जो आगामी मध्यावधि चुनावों में पूरी बाजी पलट सकता है।
वो 90 दिनों की 'डेथलाइन': क्या कानून की लक्ष्मण रेखा लांघ चुके हैं राष्ट्रपति?
यह चौथी बार था जब हाउस ने ईरान युद्ध शक्तियों से जुड़े किसी प्रस्ताव पर वोट किया, लेकिन इस बार का तनाव पिछले तीन वोटों से कहीं अधिक भयावह है। दरअसल, यह संघर्ष अब 90 दिनों की उस कानूनी सीमा को पार कर चुका है, जो अमेरिकी संविधान में बेहद संवेदनशील मानी जाती है। 1973 के ऐतिहासिक 'युद्ध शक्तियां अधिनियम' (War Powers Act) के तहत, राष्ट्रपति को 90 दिनों के बाद हर हाल में सैन्य कार्रवाई रोकनी होती है, बशर्ते कांग्रेस खुद युद्ध की घोषणा न कर दे या संघर्ष जारी रखने की औपचारिक अनुमति न दे।
ट्रंप ने ईरान पर पहला हमला तीन महीने से भी पहले किया था। अब व्हाइट हाउस एक अजीबोगरीब तर्क दे रहा है कि 'युद्धविराम' के लागू होने से यह 90 दिनों का काउंटडाउन रुक गया था। लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है-युद्धविराम के दावों के बीच भी दोनों तरफ से इस हफ्ते की शुरुआत तक ताबड़तोड़ हमले जारी रहे। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या राष्ट्रपति ने वाकई कानून की लक्ष्मण रेखा लांघ दी है?
गैस की बढ़ती कीमतें और जनता का गुस्सा: क्या बदल रही है हवा?
इस पूरे सैन्य तनाव का सीधा और सबसे घातक असर अब अमेरिकी नागरिकों की जेब पर पड़ने लगा है। ईरान संघर्ष की वजह से अमेरिका में गैस की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिससे आम जनता के बीच हाहाकार और सांसदों के बीच डर का माहौल है। सैन्य कार्रवाई जितनी लंबी खिंचेगी, अर्थव्यवस्था उतनी ही रसातल में जाएगी। सांसदों को अब इस बात का गहराई से अहसास हो चुका है कि युद्ध के इस आर्थिक बोझ से भड़की जनता का गुस्सा उनके राजनीतिक भविष्य को राख कर सकता है। यही वजह है कि जो रिपब्लिकन पहले युद्ध के नारे लगा रहे थे, अब वही कांग्रेस की सख्त निगरानी और युद्ध से बाहर निकलने की स्पष्ट रणनीति (Exit Strategy) की मांग कर रहे हैं।
परदे के पीछे का खेल: क्या यह सिर्फ एक प्रतीकात्मक झटका है?
इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक बेहद चौंकाने वाला सच यह भी है कि इस प्रस्ताव पर मूल रूप से दो हफ्ते पहले, 'मेमोरियल डे' की छुट्टियों से ठीक पहले वोट होना था। लेकिन रिपब्लिकन नेताओं ने आखिरी मिनट में भांप लिया था कि बगावत होने वाली है और यह प्रस्ताव पास हो जाएगा, इसलिए उन्होंने इसे सदन के पटल से ही हटवा दिया था। हालांकि, वे इस सच को ज्यादा दिनों तक दबा नहीं पाए और इस हफ्ते यह दोबारा सदन में आया और पास हो गया।
तो क्या अब ट्रंप के हाथ बंध जाएंगे?
कानूनी जानकारों की मानें तो कहानी में अभी एक और बड़ा ट्विस्ट बाकी है। हाउस से पास होने के बावजूद इस प्रस्ताव को कानून बनने के लिए सीनेट से पास होना होगा और फिर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर की जरूरत होगी-जिसे वाशिंगटन में कोई भी व्यावहारिक नहीं मान रहा है। अगर ट्रंप इस पर 'वीटो' (अस्वीकृति) लगा देते हैं, तो डेमोक्रेट्स के पास उस वीटो को पलटने के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत से लगभग 60 वोट कम हैं। इसलिए, व्यावहारिक रूप से यह वोट भले ही ट्रंप को सीधे न रोके, लेकिन इसने दुनिया के सबसे शक्तिशाली नेता की कूटनीतिक स्थिति और उनकी पार्टी की एकजुटता को एक ऐसा गहरा जख्म दे दिया है, जिसकी गूंज लंबे समय तक सुनाई देगी।


