कौन थे जसपाल राणा? भारतीय शूटिंग के दिग्गज और मनु भाकर के कोच की अनकही कहानी
क्या फ्लाइट में बिगड़ी तबीयत ने भारतीय शूटिंग के सबसे बड़े सितारे को हमसे छीन लिया? आखिर कौन थे जसपाल राणा, जिन्होंने 23 अंतरराष्ट्रीय मेडल जीतकर इतिहास रचा? 49 साल में अचानक निधन से क्या भारतीय शूटिंग एक ऐसी विरासत खो बैठी जिसकी भरपाई मुश्किल है?

Jaspal Rana Death: भारतीय खेल जगत गुरुवार रात उस खबर से स्तब्ध रह गया, जिसने करोड़ों खेल प्रेमियों को गहरे शोक में डाल दिया। भारतीय शूटिंग के दिग्गज, ओलंपिक सितारों के मार्गदर्शक और देश के सबसे सफल पिस्टल शूटरों में गिने जाने वाले Jaspal Rana का 49 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके अचानक चले जाने से न सिर्फ शूटिंग समुदाय, बल्कि पूरे भारतीय खेल जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।

म्यूनिख से लौटते वक्त फ्लाइट में क्या हुआ?
जसपाल राणा म्यूनिख में आयोजित ISSF वर्ल्ड कप में भारतीय टीम के साथ थे। वहां से भारत लौटते समय आसमान में, हजारों फीट की ऊंचाई पर कुछ ऐसा हुआ जिसने सब कुछ बदल दिया। खबरों के मुताबिक, फ्लाइट के दौरान उन्हें अचानक एक गंभीर मेडिकल इमरजेंसी का सामना करना पड़ा। विमान में मौजूद क्रू और मेडिकल स्टाफ ने स्थिति को संभालने की कोशिश की, लेकिन हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी।
दिल्ली पहुंचने के बाद जसपला राणा की कैसी थी हालत?
जैसे ही नई दिल्ली के आईजीआई एयरपोर्ट पर फ्लाइट लैंड हुई, उन्हें तुरंत दिल्ली के एक प्रतिष्ठित अस्पताल में ले जाया गया। डॉक्टरों की पूरी टीम ने उन्हें बचाने की हर मुमकिन कोशिश की, लेकिन गुरुवार की रात इस चैंपियन शूटर ने हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद लीं। नेशनल राइफल एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया (NRAI) के प्रेसिडेंट कलिकेश नारायण सिंह देव ने भारी मन से इस दुखद खबर की पुष्टि की।
वो सीक्रेट फॉर्मूला: जिसने मनु भाकर को फर्श से अर्श पर पहुंचाया
जसपाल राणा सिर्फ एक महान शूटर ही नहीं थे, बल्कि वे पर्दे के पीछे रहकर देश के लिए 'सोना' तराशने वाले जौहरी थे। उनकी कोचिंग का तरीका जितना सख्त था, उतना ही रहस्यमयी और कारगर भी था। जब पेरिस ओलंपिक 2024 से पहले स्टार शूटर मनु भाकर पूरी तरह टूट चुकी थीं और खेल छोड़ने का मन बना रही थीं, तब जसपाल राणा ने एक बार फिर उनके मेंटर की भूमिका संभाली। उन्होंने मनु के लिए एक ऐसा सीक्रेट और कड़ा ट्रेनिंग शेड्यूल तैयार किया, जिसने मनु को मानसिक और शारीरिक रूप से अजेय बना दिया। नतीजा यह हुआ कि मनु भाकर ने पेरिस में दो ऐतिहासिक ब्रॉन्ज़ मेडल जीतकर इतिहास रच दिया। मनु की इस अविश्वसनीय सफलता के पीछे राणा का वो कड़ा अनुशासन था, जिसे खेल जगत हमेशा याद रखेगा।
12 साल की उम्र में मिला पहला मेडल, यहीं से शुरू हुई थी दास्तान
1976 में उत्तराखंड के एक फौजी परिवार में जन्मे जसपाल राणा ने महज 12 साल की उम्र में ही यह साबित कर दिया था कि वे इतिहास रचने के लिए पैदा हुए हैं। उनके पिता ने उन्हें निशानेबाजी की शुरुआती बारीकियां सिखाईं। इसके बाद राणा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। महज 12 वर्ष की आयु में राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतकर राणा ने यह संकेत दे दिया था कि वह भविष्य में भारतीय शूटिंग का बड़ा नाम बनने वाले हैं। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और लगातार राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का नाम रोशन किया।
9 गोल्ड और 15 मेडल: कॉमनवेल्थ गेम्स का वो अनसुना रिकॉर्ड
1990 और 2000 के दशक में इंटरनेशनल शूटिंग रेंज पर सिर्फ एक ही नाम गूंजता था-जसपाल राणा। कॉमनवेल्थ गेम्स में उनका रिकॉर्ड आज भी किसी चमत्कार से कम नहीं लगता। उन्होंने इन खेलों में कुल 15 मेडल जीते, जिनमें से 9 सिर्फ गोल्ड मेडल थे। इसके अलावा एशियन गेम्स में भी उन्होंने 4 गोल्ड समेत 8 मेडल अपने नाम किए थे। 2006 के दोहा एशियन गेम्स में तो उन्होंने पुरुषों के सेंटर-फायर पिस्टल इवेंट में वर्ल्ड रिकॉर्ड की बराबरी करके पूरी दुनिया को दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर कर दिया था।
एक अधूरा मिशन: जो हमेशा के लिए राज बन गया
जसपाल राणा के शानदार योगदान के लिए सरकार ने उन्हें अर्जुन अवॉर्ड, पद्म श्री और साल 2020 में प्रतिष्ठित द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया था। खेल से संन्यास लेने के बाद भी उनका मिशन थमा नहीं था। हाल ही में, नेशनल राइफल एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया ने उन्हें 25-मीटर पिस्टल इवेंट के लिए हाई-परफॉर्मेंस कोच नियुक्त किया था। वे भारतीय शूटिंग को एक नए मुकाम पर ले जाने के लिए एक बड़े और सीक्रेट प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे। वे भारत में नए शूटरों की एक ऐसी फौज तैयार करना चाहते थे जो आने वाले ओलंपिक में दुनिया पर राज करे। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। उनका यह मिशन अब अधूरा रह गया है, और उनके जाने से भारतीय खेलों का एक स्वर्णिम अध्याय हमेशा के लिए बंद हो गया है।
एक विरासत जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी
कोच के रूप में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें 2020 में प्रतिष्ठित Dronacharya Award से सम्मानित किया गया। हाल ही में उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर 25 मीटर पिस्टल स्पर्धा के हाई-परफॉर्मेंस कोच की जिम्मेदारी भी सौंपी गई थी। जसपाल राणा सिर्फ एक खिलाड़ी नहीं थे; वे भारतीय शूटिंग की एक पूरी पीढ़ी के निर्माता थे। उनके रिकॉर्ड, उनके शिष्य और उनकी उपलब्धियां आने वाले वर्षों तक भारतीय खेल इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी रहेंगी। उनका जाना एक ऐसा खालीपन छोड़ गया है जिसे भर पाना बेहद कठिन होगा, लेकिन उनकी विरासत हमेशा नए खिलाड़ियों को लक्ष्य भेदने की प्रेरणा देती रहेगी।
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