गलवान के खूनी संघर्ष के बाद क्या बदलने जा रहा है इतिहास? सितंबर में नई दिल्ली की धरती पर कदम रख सकते हैं शी जिनपिंग। क्या परदे के पीछे से तय हो चुका है कोई गुप्त कूटनीतिक चक्रव्यूह?
नई दिल्ली: वैश्विक कूटनीति और भारत-चीन संबंधों के लिहाज से एक ऐसी सनसनीखेज खबर सामने आ रही है, जिसने पूरी दुनिया के भू-राजनीतिक (Geopolitical) गलियारों में हलचल तेज कर दी है। साल 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प और लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) पर लंबे समय से जारी भारी मिलिट्री तनाव के बाद, पहली बार कोई ऐसी खबर आई है जो दोनों देशों के रिश्तों की दिशा बदल सकती है। एक रिपोर्ट के अनुसार, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग आगामी सितंबर महीने में ब्रिक्स (BRICS) समिट में हिस्सा लेने के लिए भारत आ सकते हैं। अगर यह दौरा हकीकत में बदलता है, तो इसे इस दशक की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक कूटनीतिक घटना माना जाएगा।
द सीक्रेट एजेंडा: क्या नई दिल्ली में पिघलेगी छह साल पुरानी बर्फ?
News18 इंडिया की एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के अनुसार इस बेहद संवेदनशील और हाई-प्रोफाइल दौरे की अंदरूनी जानकारी रखने वाले सूत्रों ने साफ संकेत दिए हैं कि चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग के भारत आने की प्रबल संभावना है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि चीन ने भारत की लीडरशिप में होने जा रही ब्रिक्स की अध्यक्षता का खुलकर समर्थन किया है। नई दिल्ली में आगामी 12 और 13 सितंबर को ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का आयोजन होने जा रहा है, जिसके लिए भारत ने पहले ही चीनी राष्ट्रपति को आधिकारिक न्योता भेज दिया है। हालांकि, इस ऐतिहासिक यात्रा पर अभी दोनों देशों की ओर से अंतिम आधिकारिक मुहर लगना बाकी है, लेकिन राजनयिक हलकों में इसे लेकर तैयारियां और कयासों का बाजार बेहद गर्म है।
अक्टूबर 2019 का वो आखिरी मंज़र और फिर... रिश्तों में आया खूनी मोड़!
अगर शी जिनपिंग का यह दौरा योजना के मुताबिक सफल रहता है, तो अक्टूबर 2019 के बाद यह उनकी पहली भारत यात्रा होगी। उनकी आखिरी भारत यात्रा 11-12 अक्टूबर 2019 को हुई थी, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तमिलनाडु के महाबलीपुरम में एक बेहद भव्य और अनौपचारिक समिट (Informal Summit) में उनकी मेजबानी की थी। नारियल पानी पीते और ऐतिहासिक रथों के बीच घूमते दोनों नेताओं की तस्वीरें तब दुनिया भर में छा गई थीं। लेकिन उस खुशनुमा मुलाक़ात के ठीक छह महीने बाद, साल 2020 की गर्मियों में लद्दाख सेक्टर में चीनी सेना की अचानक हुई घुसपैठ और गलवान घाटी के खूनी संघर्ष ने दोनों देशों के संबंधों को पिछले छह दशकों के सबसे निचले स्तर पर धकेल दिया। तब से लेकर अब तक दोनों देशों की सीमा पर बंदूकें तनी हुई हैं।
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कज़ान से तियानजिन तक: बैक चैनल डिप्लोमेसी का वो सीक्रेट चक्रव्यूह
भले ही 2019 के बाद से शी जिनपिंग ने भारत का दौरा न किया हो, लेकिन दोनों देशों के बीच परदे के पीछे से रिश्ते सुधारने की कवायद लगातार जारी रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच पिछले साल अक्टूबर 2024 में रूस के कज़ान में एक बेहद अहम द्विपक्षीय बैठक हुई थी, जो सीमा पर सैन्य गतिरोध सुलझाने की सहमति के ठीक बाद आयोजित की गई थी। इसके बाद, पिछले ही साल अगस्त 2025 में पीएम मोदी ने खुद तियानजिन (चीन) में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में भाग लिया, जो लगभग सात वर्षों में उनकी पहली चीन यात्रा थी। वहीं पर दोनों नेताओं के बीच सबसे हालिया बातचीत हुई थी। अब जब चीन खुद प्राइवेट वेंचर कैपिटल पर निर्भर रहने के बजाय अपनी सरकार के दम पर नई 'ब्रेकथ्रू कंपनियां' बनाने का एक अलग आर्थिक मॉडल अपना रहा है, ऐसे में भारत के साथ उसके आर्थिक और रणनीतिक रिश्ते किस करवट बैठेंगे, इसका फैसला इस सितंबर में नई दिल्ली की धरती पर होने की पूरी उम्मीद है। पूरी दुनिया की नजरें अब 12 सितंबर की उस तारीख पर टिकी हैं!
SCO और BRICS के मंच पर जारी रही बातचीत
सीमा विवाद के बावजूद दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच संवाद पूरी तरह बंद नहीं हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने BRICS, G20 और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) जैसे बहुपक्षीय मंचों पर लगातार मुलाकातें कीं। अक्टूबर 2024 में रूस के कज़ान में दोनों नेताओं की द्विपक्षीय बैठक हुई थी। इसके बाद अगस्त 2025 में चीन के तियानजिन में आयोजित SCO सम्मेलन के दौरान भी दोनों नेताओं के बीच बातचीत हुई थी। इन बैठकों को सीमा विवाद के बाद रिश्तों में धीरे-धीरे सुधार की दिशा में अहम माना गया।
BRICS समिट में क्या हो सकती है बड़ी बातचीत?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शी जिनपिंग भारत आते हैं तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके बीच सीमा विवाद, व्यापार, निवेश, आपूर्ति श्रृंखला, क्षेत्रीय सुरक्षा और वैश्विक भू-राजनीतिक मुद्दों पर विस्तृत चर्चा हो सकती है। इसके अलावा BRICS के विस्तार, वैश्विक आर्थिक सहयोग और विकासशील देशों के साझा एजेंडे पर भी दोनों नेताओं के बीच महत्वपूर्ण वार्ता होने की संभावना है।
आधिकारिक घोषणा का इंतजार
फिलहाल चीन या भारत की ओर से इस यात्रा की औपचारिक पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन यदि बीजिंग अंतिम मंजूरी देता है, तो सितंबर में नई दिल्ली में होने वाला BRICS सम्मेलन केवल एक बहुपक्षीय बैठक नहीं रहेगा, बल्कि भारत-चीन संबंधों के भविष्य की दिशा तय करने वाला एक ऐतिहासिक कूटनीतिक क्षण भी बन सकता है। दुनिया की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या गलवान के बाद जमी बर्फ वास्तव में पिघलने वाली है, या फिर यह सिर्फ एक रणनीतिक कूटनीतिक पहल साबित होगी।
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