Santan Saptami 2026: हिंदू धर्म में संतान सप्तमी के व्रत का खास महत्व माना जाता है। यह व्रत संतान की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना से रखा जाता है।
Santan Saptami Vrat Katha In Hindi: इस साल संतान सप्तमी का व्रत 17 सितंबर, गुरुवार को है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने के साथ संतान सप्तमी की कथा सुनने की भी परंपरा है। मान्यता है कि इस व्रत की कथा सुनने और श्रद्धा के साथ पूजा करने से संतान पर भगवान शिव-पार्वती की कृपा बनी रहती है। आगे पढ़िए संतान सप्तमी की कथा…
संतान सप्तमी व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार राजा युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि ऐसा कौन-सा व्रत है, जिसे करने से सांसारिक परेशानियां दूर हों और संतान सुख की प्राप्ति हो। तब श्रीकृष्ण ने उन्हें संतान सप्तमी व्रत की कथा सुनाई।
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श्रीकृष्ण ने बताया कि ‘राजा नहुष की पत्नी रानी चंद्रमुखी और एक ब्राह्मण की पत्नी भद्रमुखी के बहुत अच्छी सहेलियां थीं। एक दिन वे सरयू नदी में स्नान करने गईं। वहां उन्होंने कुछ महिलाओं को भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करते हुए देखा। महिलाओं ने बताया कि वे संतान सप्तमी का व्रत कर रही हैं और संतान सुख की कामना से शिव-पार्वती की पूजा करती हैं।
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यह देखकर चंद्रमुखी और भद्रमुखी ने भी व्रत करने का संकल्प लिया। भद्रमुखी ने इस व्रत को पूरी श्रद्धा और नियम के साथ किया, लेकिन चंद्रमुखी ने राजसी सुख-सुविधाओं के कारण कभी व्रत किया और कभी छोड़ दिया। कुछ समय बाद दोनों की मृत्यु हो गई और अगले जन्म में चंद्रमुखी ने बंदरिया तथा भद्रमुखी ने मुर्गी का जन्म लिया।
इसके बाद दोनों ने फिर मनुष्य जन्म लिया। भद्रमुखी ने भूषणदेवी नाम की कन्या के रूप में जन्म लिया। विवाह के बाद उसे आठ गुणवान पुत्र हुए। दूसरी ओर चंद्रमुखी को संतान सुख नहीं मिला। वृद्धावस्था में उसे एक पुत्र हुआ, लेकिन वह भी अल्पायु था और नौ वर्ष की उम्र में उसकी मृत्यु हो गई। इससे रानी बहुत दुखी रहने लगी।
एक दिन भूषणदेवी अपने आठों पुत्रों के साथ रानी से मिलने पहुंची। रानी उसके सुखी परिवार को देखकर ईर्ष्या करने लगी। उसने भूषणदेवी के पुत्रों को मारने के लिए लड्डुओं में विष मिला दिया, लेकिन भगवान शिव की कृपा से सभी बच्चे सुरक्षित रहे।
रानी को यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ। उसने भूषणदेवी से इसका कारण पूछा। तब भूषणदेवी ने उसे पिछले जन्म की पूरी बात बताई और कहा कि उसने संतान सप्तमी व्रत को पूरी श्रद्धा से किया था, जबकि रानी ने इस व्रत का नियमपूर्वक पालन नहीं किया था।
अपनी गलती का एहसास होने पर रानी ने पश्चाताप किया और भगवान शिव-माता पार्वती की आराधना करते हुए संतान सप्तमी का व्रत विधि-विधान से शुरू किया। मान्यता है कि व्रत के प्रभाव से उसे संतान सुख मिला और उसके जीवन के दुख दूर हुए।
इस कथा के अनुसार, संतान सप्तमी व्रत श्रद्धा और नियम के साथ करने से संतान सुख, परिवार की खुशहाली और भगवान शिव-पार्वती की कृपा प्राप्त होती है।
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