Varuthini Ekadashi Vrat Katha: वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को वरुथिनी एकादशी कहते हैं। इस एकादशी का महत्व अनेक धर्म ग्रंथों में बताया गया है। इस एकादशी से जुड़ी एक कथा भी है जिसे सुने बिना इस व्रत का पूरा फल नहीं मिलता।

Varuthini Ekadashi Vrat Katha In Hindi: हिंदू धर्म में एकादशी तिथि को बहुत ही पवित्र माना गया है। हर मास के दोनों पक्षों (शुक्ल व कृष्ण) में एकादशी व्रत किया जाता है। हर एकादशी व्रत का अलग नाम, महत्व और कथा धर्म ग्रंथों में बताई गई है। इनमें से वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को वरुथिनी एकादशी कहते हैं। इस एकादशी से जुड़ी एक रोचक कथा भी है। व्रत का पूरा फल पाने के लिए इस कथा को सुनना जरूरी है। आगे पढ़ें वरुथिनी एकादशी व्रत की रोचक कथा…

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वरूथिनी एकादशी व्रत कथा | Varuthini Ekadashi Story In Hindi

प्राचीन समय में मांधाता नाम के एक पराक्रमी राजा थे। उनके राज्य में सभी सुखी थे। वृद्ध होने पर उन्होंने अपना राज-पाठ त्याग दिया और तपस्या करने जंगल में चले गए। एक दिन जब वे तपस्या कर रहे थे, तभी एक भालू ने उन पर हमला कर दिया। तपस्यारत होने के कारण राजा मांधाता कुछ भी करने में असमर्थ थे।

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भालू उनका एक पैर पकड़कर घसीटने लगा, लेकिन फिर भी राजा मांधाता ने अपनी तपस्या नहीं छोड़ी और वे मन ही मन भगवान विष्णु का स्मरण करने लगे। जब भालू राजा मांधाता का वध करने वाला था, तभी वहां भगवान विष्णु प्रकट हुए और उन्होंने भालू से उनके प्राण बचाए। ये देख राजा मांधाता बहुत प्रसन्न हुए।

राजा मांधाता ने पूछा ‘मैंने इस जन्म में कोई पाप नहीं किया तो मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ?’ भगवान विष्णु ने कहा ‘ये तुम्हारे पिछले जन्मों का फल है। तुम वैशाख मास की वरुथिनी एकादशी का व्रत करो। ऐसा करने से तुम्हारे पूर्व जन्मों के सभी पाप नष्ट हो जाएंगे और भालू द्वारा खाया गया तुम्हारा पैर भी तुम्हें मिल जाएगा।’

भगवान विष्णु के कहने पर राजा मांधाता ने पूरी भक्ति से वरुथिनी एकादशी का व्रत किया। जिसके प्रभाव से उनका पैर पूरी तरह से ठीक हो गया और मृत्यु के बाद उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति हुई। इस प्रकार जो भी वरुथिनी एकादशी का व्रत करता है, उस पर भगवान विष्णु की कृपा बनी रहती है और उसे मोक्ष मिलता है।


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