Sahibzada Diwas Celebration: गोरखपुर में सीएम योगी आदित्यनाथ ने सिख गुरुओं के बलिदान और परंपरा को याद किया। पंच तख्त यात्रा योजना और गुरुद्वाराओं के विकास से सिख समुदाय के गौरव और सनातन संस्कृति को नई पहचान मिली।

Yogi Adityanath on Sikh Gurus:गोरखपुर के पैडलेगंज स्थित गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा रविवार को खासा रोशन दिखा। मौका था मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आगमन का। यहां पहुंचकर उन्होंने सिख गुरुओं की विरासत, उनके शौर्य और बलिदान को याद किया। योगी ने न केवल श्रद्धा से शीश नवाया, बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि सिख परंपरा, सनातन संस्कृति की उसी जीवंत धारा का हिस्सा है, जो धर्म और राष्ट्र की रक्षा के लिए बलिदान को सर्वोच्च मानती है।

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क्यों हो रही है सिख परंपरा पर इतनी चर्चा?

बीते साढ़े आठ वर्षों में यूपी सरकार ने सिखों के सम्मान और उनके धार्मिक स्थलों के विकास की दिशा में कई ठोस कदम उठाए हैं।

  • गुरुद्वारों के आधुनिकीकरण से लेकर नए भवन और सुविधाओं का विस्तार किया गया।
  • पहली बार यूपी के स्कूलों के पाठ्यक्रम में सिख गुरुओं का इतिहास शामिल हुआ।
  • लखनऊ में “खालसा चौक” और सरकारी स्तर पर “साहिबजादा दिवस” की शुरुआत हुई।

इन पहलों ने यह साफ कर दिया कि अब सिख परंपरा को केवल श्रद्धा नहीं, बल्कि शिक्षा और समाज दोनों में वह स्थान मिल रहा है, जिसकी वह अधिकारी है।

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पंच तख्त यात्रा योजना क्या है और क्यों खास है?

हाल ही में शुरू की गई “पंच तख्त यात्रा योजना” को मुख्यमंत्री योगी के विज़न की सबसे बड़ी मिसाल माना जा रहा है। इस योजना के तहत यूपी के श्रद्धालुओं को सिख पंथ के पांचों तख्त साहिबों- श्री आनंदपुर साहिब, श्री अकाल तख्त साहिब, श्री दमदमा साहिब (पंजाब), श्री हजूर साहिब (नांदेड़, महाराष्ट्र) और श्री हरमंदिर जी साहिब (पटना, बिहार) के दर्शन कराने का प्रावधान है।

सिर्फ इतना ही नहीं, हर श्रद्धालु को ₹10,000 तक की आर्थिक सहायता भी दी जाएगी। यह कदम सरकार की उस प्रतिबद्धता को दिखाता है, जो केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं, बल्कि आस्था को सुविधाओं से जोड़ने पर केंद्रित है।

सिख और नाथ परंपरा का ऐतिहासिक रिश्ता

योगी आदित्यनाथ अक्सर इस बात पर जोर देते हैं कि सिख गुरुओं और नाथ परंपरा की धारा एक ही है, दोनों का मूल राष्ट्रभक्ति और बलिदान में है। गुरु नानक देव जी और गोरखनाथ संप्रदाय के बीच का रिश्ता केवल आध्यात्मिक संवाद नहीं था, बल्कि साझा सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी था। इसी कारण जब मुख्यमंत्री गुरुद्वारों में मत्था टेकते हैं, तो वह महज एक औपचारिकता नहीं, बल्कि इस रिश्ते को आगे बढ़ाने का प्रयास होता है।

पिछली सरकारों से क्या है फर्क?

यह वही उत्तर प्रदेश है, जहां पिछली सरकारें तुष्टिकरण की राजनीति में उलझी रहीं। सिख गुरुओं के बलिदान को पाठ्यक्रमों और सार्वजनिक जीवन में स्थान नहीं मिला। लेकिन योगी आदित्यनाथ ने यह दृष्टिकोण बदला। अब न केवल उनका बलिदान याद किया जा रहा है, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा भी बन चुका है।

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